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गुरुवार, 26 अक्तूबर, 2006 को 16:24 GMT तक के समाचार
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'अपने काम से सदाबहार कहलाता हूँ'

मुझे लोग सदाबहार कहते हैं. वे ऐसा इसलिए नहीं कहते कि मैं जवान बना हुआ हूँ. इसका कोई शारीरिक प्रतीक नहीं है. मैं अपने काम से सदाबहार कहलाता हूँ.

लेकिन सदाबहार होना अपने आपमें एक यौवन भरा अनुभव है. एक ऐसा अनुभव है जिसमें यह संदेश छिपा ही होता है कि मुझे आगे बढ़ना है, मुझे काम करना है.

मैं इस समय क्रोएशिया की पृष्ठभूमि में एक फ़िल्म बना रहा हूँ. फ़िल्म पूरी करने के बाद यदि मेरी शारीरिक अवस्था ने साथ दिया तो मैं फिर कुछ करुँगा. मैं कुछ न कुछ तो करता ही रहूँगा क्योंकि मैं देवानंद हूँ.

 आज भी मेरे भीतर यह भावना है कि मैंने अभी कुछ हासिल नहीं किया. अगर मेरे भीतर यह भावना आ गई कि मैंने बहुत कुछ हासिल कर लिया तो आगे कुछ करने की इच्छा ही ख़त्म हो जाएगी
देव आनंद

मैंने लगातार काम किया है. कई सफल फ़िल्में बनाई हैं तो कुछ असफलताएँ भी मेरे खाते में हैं. लेकिन मेरी तरह से कम लोग हैं जो अपना पैसा खर्च करके इतना काम कर रहे हों. अगर मैं चाहता तो मुंबई शहर में कई बिल्डिंग्स ख़रीद लेता और मज़े से रहता. लेकिन मुझे वह मंज़ूर नहीं था.

दरअसल, इसके पीछे कुछ हासिल करने की इच्छा है. अपने न होने के बाद याद किए जाने की इच्छा है.

आज भी मेरे भीतर यह भावना है कि मैंने अभी कुछ हासिल नहीं किया. अगर मेरे भीतर यह भावना आ गई कि मैंने बहुत कुछ हासिल कर लिया तो आगे कुछ करने की इच्छा ही ख़त्म हो जाएगी आगे कुछ करने का दिल ही नहीं करेगा.

यह बात सिर्फ़ मेरे लिए नहीं सभी के लिए है. जब तक आदमी के भीतर कुछ हासिल करने की इच्छा बची रहेगी तभी तक वह काम कर पाता है. यदि एक बार लगा कि जो कुछ हासिल किया वह बहुत है तो आदमी वहीं ख़त्म हो जाता है. तो अपने आपको ख़त्म होने से बचाने के लिए और कुछ हासिल करने की इच्छा बची रहनी चाहिए.

जो कुछ आप करते हैं, उसमें आपको मज़ा लेना चाहिए अगर मज़ा नहीं लेंगे तो बात आगे नहीं बढ़ेंगी, आप आगे नहीं बढ़ेंगे. काम करने की इच्छा ख़त्म हो जाएगी. दूसरे शब्दों में कहें तो सदाबहार होने का मतलब काम करते रहने की इच्छा है.

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