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कीड़ों से बातचीत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
(बिंदास बाबू की डायरी) कोक पेप्सी में फिर कीड़ों को मारने की दवा निकली है. यह सुनकर इस मौसम में निकलने वाले कीड़े शर्मिंदा हो रहे हैं. टीवी पर ख़बर सुनकर एक घासीराम छाप कीड़ा बोला. यार मैं तो इधर घास में रहता हूँ. ये जो दोपाए, चौपाए यत्र तत्र विचरण करते हुए इस असार संसार में जो कुछ त्यागते रहते हैं अपन उसी में से ख़ुराक पाते हैं. मक्खियाँ अपनी दोस्त हैं. चींटी, दीमकें, लाल-काले तरह-तरह के कीड़े, मिलेंगे सब इसी में जन्म लेते हैं. मस्त रहते हैं. इन दिनों बारिश है. कीचड़ है. उमस है. अपनी मौज बहार है. लेकिन ये क्या सुनता हूँ कि कोक पेप्सी की बोतल में कीड़ा मार दवाई मिल रही है. ये कैसे हो सकता है? ये तो अपने लिए रिजर्व होती थी? दूसरा कीड़ा बोला अबे यार धीमे से बोल. ये देख. ये मल्टीनेशनल कीड़े मारने वालों की साज़िश है कि वे अब हमें कोक-पेप्सी की बोतल के रास्ते मारने पर आमादा है. मोटी अकल पहला कीड़ा बोला अबे बेवकूफ. तेरी अकल बड़ी मोटी खोटी है. भइए हमसे कीड़ा मारने वाले हार गए. तभी तो बोतल में बंद कर दिया दवा को. सबसे बड़े कीड़े मारने को. दूसरे ने पहले को शट अप करते हुए डांटा अकल के दुश्मन. कीड़े मारने वालों ने हमें मारने की अब यह नई तरक़ीब निकाली है. पहले आदमी पिएगा. फिर वह दिसा मैदान जाएगा. बाथरूम जाएगा. और इस तरह हमारा जीवन ख़तरे में आ जाएगा. क्या तुम इतनी सी बात नहीं समझ सकते. तभी संसद में संसद सदस्य ज़ोर-ज़ोर से बोलने लगे. जंगल के सारे कीड़े अपने नीम के पेड़ पर टंगे टीवी सेट पर लाइव देखने-सुनने लगे. एक सांसद बोले यह कोक पेप्सी खतरनाक है. इन्हें बैन करो. दूजे ने कहा इन्हें बैन करो. तीजे ने कहा इन्हें बैन करो. सब बोले इन्हें बैन करो. तभी एक बुज़ुर्ग कीड़ा बोला भाइयों बहनो. शोर मत करो. धीरज से मेरी बात सुनो. ज़्यादा उत्तेजित होने की ज़रूरत नहीं. देखो. तीन साल पहले की बात है. तब भी यही संसद थी. ऐसे ही सांसदजन थे. तब भी किसी ने बताया था कि कोक पेप्सी में जितना ‘एलाउड’ है उससे कहीं ज़्यादा कीड़ों को मारने वाली दवाएँ हैं. जानते हैं तब क्या हुआ था? संसद की कैंटीन में तुरंत प्रभाव से ये कोल्ड ड्रिंक्स बंद कर दिए गए. कमेटी बैठी जाँच की. रिपोर्ट दी. हेल्थ के लिए फ़ायदेमंद? लेकिन देश में बोतलें बिकती रहीं. करोड़ों रोज़ बिकती रहीं. तीन साल से बिकतीं रहीं. वैसे ही जैसे कि तीन साल पहले पकड़ी गई थी. सांसदों का स्वास्थ्य क़ीमती था. लोगों का नहीं था. यों भी आबादी बढ़ती जाती है. है कि नहीं. बुज़ुर्ग कीड़ा हँसा. तभी एक नन्हे से कीड़े ने जिज्ञासा की. दादाजी ये बताइए कि कीड़ामार दवा की मात्रा ‘एलाउड’ क्यों है? क्या वह फ़ायदेमंद है? हेल्थ के लिए? बुज़ुर्ग कीड़े ने दाढ़ी पर हाथ फिराया फिर बोला. बंटी बेटे बात ये है कि ये जो आदमजात है न ये है ही ऐसी. हर चीज़ इन दिनों ‘एलाउड मात्रा’ में खाती पीती है. उसके अनुसार तो ज़हर भी एलाउड मात्रा में ले लेना चाहिए. कीड़ामार दवा एलाउड मात्रा में लेते रहेंगे तो आदी बन जाएँगे. उसका ख़तरा जाता रहेगा. फिर भारत के लोग तो ऐसे ही इतने प्रदूषण, पोल्यूशन में जीते हैं जैसे हम. वे भी हमारी तरह आदी हो गए हैं. नन्हीं कीड़ी ने तब सवाल किया अंकल जी. ये तो ठीक है तब ज़्यादा मात्रा में कीटनाशक क्या जान-बूझकर दिया-लिया जाता है? दादाजी ने चश्मा साफ़ करते हुए कहा, हाँ बच्ची. मल्टीनेशनल है. कोक पेप्सी भी उनकी कीड़ा मार दवा भी उनकी. जो चाहे बेचें. जैसे चाहे बेचें बस बेचतें रहें. हम ग्लोबल बनें रहें. यह सब चाहते हैं. ‘लेकिन बाबा रामदेव तो कहते हैं कि कोल्ड ड्रिंक्स में इतने पेस्टीसाइड है कि टॉयलेट एकदम साफ़ हो जाता है. क्या सांसद सब उन्हीं की कही नहीं बोल रहें.’ देखो बेटी बाबा ने सत्य पहले ही पकड़ लिया था. तीन साल बाद अब फिर पकड़ा है फिर कमेटी बनेगी. रपट देगी. फिर एलाउड मात्रा में पेस्टीसाइड रहेगा. पेस्टीसाइड जाने वाला नहीं. बस मात्रा की लड़ाई है. तब तो हम लोग महफ़ूज़ रहेंगे? सब कीड़े बोले और हँसने लगे. (बिंदास बाबू की डायरी का यह पन्ना आपको कैसा लगा लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर) |
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