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यत्र सेवाः तत्र मेवाः | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
(बिंदास बाबू की डायरी) घोर अनर्थ हो रहा है. इस कलि काल में भी कुछ ऐसे सिरफिरे हैं जो ‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट’ यानी ‘लाभ के पद’ को नहीं चाहते. वे चाहते हैं कि जनसेवक जनप्रतिनिधि शुद्ध मन से सेवा किया करें. मेवा की ओर न देखा करें. संसद आने वाले दिनों में ‘लाभ के पद’ के कानून की लाभ-हानि देखे सो देखे. हमारा मानना है कि ‘लाभ’ शब्द का इतना अपमान न करें. ज़्यादा करेंगे तो ‘हानि’ ज़्यादा हो जाएगी. याद करें किसी ज़माने में समाजवादी सोवियत संघ ने अपने बही खातों में ‘लाभ’ की एंट्री ही निकाल रखी थी. एक दिन ऐसा आया कि सब कुछ सौ फीसदी हानि में बदल गया. अपने ‘व्यापारी लोग’ दुकानदार अपनी दुकान पर तिजोरी पर बाईं ओर शुभ लिखा करते हैं और दाईं ओर लाभ. यह परंपरा है. दफ़्तरों में यह इस तरह लिखा नहीं होता. मगर हर सेवा के बदले मेवा वहाँ चलती है. ‘शुभ-लाभ’ पर हर आदमी नज़र रखता है. जिस दफ़्तर में शुभ लाभ नहीं होता वह दफ़्तर बंद रहा करता है. अपनी परंपरा है. संस्कृति है यत्र सेवा, तत्र मेवा. यह शाश्वत नियम है. पांच हज़ार साल से चल रहा है. आप ही बताएँ संसार में कोई ऐसा पद है जो ‘मेवा’ के साथ न होता हो. पद का मतलब ही लाभ है. जो बिना पद हैं वह या तो निर्गुण है, निराकार है या शून्य है. संतों ने बहुत पहले एक लाईन दे रखी है कि ये हानि-लाभ सब विधाता के खेल हैं. ‘हानि लाभ जीवन मरन यश अपयश विधि हाथ.’ जो विधि का विधान है उसमें हस्तक्षेप कैसा ? घोर पाप लगेगा. फोकट में कुछ नहीं पूँजीवाद के चिंतक संत तो बार बार कहते आए है. ‘देअर इज नो फ्री लंच’ पूंजीवाद में कुछ भी फोकट में नहीं मिलता. तब कोई भी सेवा बिना मेवा के भला कब तक होगी. जनसेवक धनसेवक न होगा तो मन से सेवा कैसे करेगा? जो पद लाभ का नहीं होगा उधर वह ताकेगा भी नहीं. सारी सेवा बंद हो जाएगी. वो तो गनीमत रही कि सरकार ने वक़्त रहते कुछ ‘लाभ के पदों’ को ‘लाभ के पद’ मानने से इनकार कर दिया. देश बच गया. दफ़्तर बज गए. सेवा बच गई. मेवा भी बच गई. बस मानने की बात है. अब धारणा की बात है. माने तो भगवान नहीं तो पत्थर. इसी तरह मानो तो ‘मेवा’ है नहीं तो ‘सेवा’ है. हम तो कहेंगे सेवा के साथ ‘मेवा’ पहले ही तय कर दी जाए. सारा टंटा इसे तय न करने का परिणाम है. साफ़ सुथरे पारदर्शी ‘सेवा’ के नियम बनें. हर दफ़्तर के बाहर रेट चार्ट टंगा हो. अँग्रेजी के साथ हिंदी में ज़रूर हो. सब जाने पढ़े करे. सेवा के बदले मेवा दें. अपना ग़रीब समाज तरह तरह के सेवकों, स्वयं सेवकों, जनसेवकों. धनसेवकों, गनसेवकों से बना है. वे सेवा के बिना नहीं रह सकते. सेवा करेंगे तो मेवा चाहेंगे. क्या ग़लत करेंगे? आप क्यों इन ग़रीबों के पेट पर लात मारते हो? अरे खाओ और खाने दो. पाओ और पाने दो, जियो और जीने दो, पियो और पीने दो. (बिंदास बाबू की डायरी का यह पन्ना आपको कैसा लगा लिखिए [email protected] पर) |
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