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गुरुवार, 22 जून, 2006 को 23:42 GMT तक के समाचार
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कैसे गुरू, कैसे चेले
बिंदास बाबू
(बिंदास बाबू की डायरी)

दक्षिणपंथी वामपंथियों से शिक्षा माँग रहे हैं. वामपंथी पूँजीपतियों से शिक्षा माँग रहे हैं.

विचाराधाराओं का शर्बत बन रहा है.

दक्षिणपंथी कह रहे है कि वामपंथियों से सीखना है. चुनाव जीतने का कौशल सीखना है. देखो तो कितने दिनों से लगातार जीतते आ रहे हैं. सातवीं बार भी सत्ता में आ गए.

कमाल है. हमने तो सोचा था कि इस बार जनता इन्हें लुढ़का देगी. बंगाल की खाड़ी में डुबो देगी. चुनावी तिकड़मों पर चुनाव आयोग नकेल कसेगा. तब कहाँ जाएँगे ये वामपंथी.

अब अपने बंदों से कह रहे हैं कि वामपंथियों से सीखो. चुनाव जीतने की कला सीखो. सत्ता में लगातार बने रहने की कला. बुद्धा के ब्रांड के बाज़ार को हड़प लेने की कला.

कालजयी राजनीति जब विनय पत्रिका लिखती है तो इसी तरह लिखती है. कोई भी किसी से सीखने की बात करने लगता है.

 वे धागा बने मोती ढूंढ रहे हैं. भगवा रंग का धागा लाल रंग के मोती की चाहत में गा रहा है- गुरु बिन ज्ञान कहाँ से लाऊँ. हे वामपंथी गुरू, मुझे चेला बना लो.

गाने लगता है. प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी. प्रभु जी, तुम मोती हम धागा. प्रभु जी, तुम गुरू हम चेला. पाँच मिनट का गुरू, पाँच मिनट का चेला.

वे धागा बने मोती ढूंढ़ रहे हैं. भगवा रंग का धागा लाल रंग के मोती की चाहत में गा रहा है- गुरु बिन ज्ञान कहाँ से लाऊँ. हे वामपंथी गुरू, मुझे चेला बना लो.

एक दूसरे तरह के शिक्षार्थी भी पैदा हो गए हैं.

वे आधे दक्षिण और आधे वाम के बीच घिरे रहते हैं. कह रहे हैं कि पश्चिम बंगाल के भूमि सुधार को बिहार में लागू करने की ज़रूरत है.

उन्हें लागू करने का तरीका सीखना है. लागू करेंगे तो वो भी सात बार जीतेंगे.

कलयुग में ऐसा शील, ऐसी विनय बड़ी मुश्किल से नसीब हुआ करती है.

ऐसे ही विनय विद्यार्थी जब नए-नए गुरू खोजते हैं तो लगने लगता है कि गुरुओं के दिन फिर रहे हैं.

वामपंथी भी गुरू बन रहे हैं. दक्षिणपंथी चेले वामपंथियों को गुरू बनाने पर तुले हैं.

कहते हैं कि अपने मूल गुरू को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए. चेला गुरू द्रोह का भागी बनता है. सीधे नरक में सीट रिज़र्व हो जाती है. गुरू का शाप मिलता है.

जिनके गुरू ने वामपंथियों को मलेच्छों के बराबर माना हो, विदेशी एजेंट माना हो, वही अब उन्हें गुरू बनाने की बात कहें तो पुराने गुरू तो क्रोध में पागल हो जाएँगे न.

 जिनके गुरू ने वामपंथियों को मलेच्छों के बराबर माना हो, विदेशी एजेंट माना हो, वही अब उन्हें गुरू बनाने की बात कहें तो पुराने गुरू तो क्रोध में पागल हो जाएँगे न.

यही हो रहा है. चेला अपने असल गुरू की लाइन छोड़कर नई लाइन पर जा रहा है. सत्ता जो न करा दे वही कम.

गुरू-चेला संबंध के मामले में कबीरदास क्रांतिकारी बात कहते हैं. वो गुरू को गोविंद से बड़ा कहते हैं. वो चेले को घड़ा कहते हैं. वो असली गुरू को अकाल मानते हैं.

कलयुग में अच्छे गुरू नहीं मिलते लेकिन चेला नहीं जानता कि क्या कह रहा है.

वामपंथी जिसके गुरू होते हैं, उसे बड़ा रगड़ते हैं. पहले सर्वहारा बनाते हैं फिर बुर्जुआज़ी करते हैं.

दक्षिणपंथी चेला अगर वामपंथी बना तो दक्षिणपंथ का क्या होगा. उधर वामपंथी चिंतित हैं कि ऐसा हुआ तो उनका क्या होगा.

वे तो ख़ुद पूँजीवाद को अपना गुरू बनाने पर तुले हुए हैं.

(बिंदास बाबू की डायरी का यह पन्ना आपको कैसा लगा लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर)

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