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शुक्रवार, 28 जुलाई, 2006 को 02:29 GMT तक के समाचार
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'आइए जासूस-जासूस खेलें'
बिंदास बाबू
(बिंदास बाबू की डायरी)

तुम जासूस. मैं जासूस. तुम मेरी जासूसी करो. अपन तुम्हारी करेंगे. जासूसी के खेल में बड़ा मजा है. रिटायर होने पर किस्से लिखा करेंगे.

जासूस हमेशा सबसे बड़ी खबर होता है. सनसनी होता है. वो जासूसी कर गुज़रता है और बाद में उसकी कारस्तानी का राज़ खुलता है तो सभी चकित-थकित-विस्मित और उल्लासित होते हैं.

जिस पर जासूसी की गई होती है. चकित-थकित-विस्मित होता है. जो भेद खोलते हैं वे उल्लासित होते हैं.

जो भेद को भेदने वाला होता है. जो उस भेदिए के भेद को भेदता है. दोनों बराबर की टक्कर के जासूस कहलाते हैं. दोनों में भाव मैत्री होती है. बुद्धि मैत्री होती है.

जासूस हमेशा से रहे हैं और रहते हैं. जासूसी के बिना उस अदभुत रस की बरसात नहीं होती जो रसता है तो सबको चमत्कृत करता है.

जासूस कलजुग का परमब्रह्म है जो सबमें समाया है. वह ‘बिनु पग चलै सुनै बिन काना, कर बिनु करम कर ही विधिनाना’ ब्रांड होता है. वह जब होता है तब नहीं दिखता. जब दिखता है तब होता नहीं.

देवताओं के जमाने में इंद्र भगवान जासूस बनकर, भेष बदलकर तपस्वियों के भेद चुराते रहे. फिर भी देवता बने रहे.

रावण के गुप्तचर राम की गुप्तचरी करते रहे. जब आदरणीय विभीषण बड़े भ्राता की लात खाकर राम की शरण में आए तो वानरों ने समझा कोई जासूस है. बाद में युद्ध के ऐन क्रूशियल टाइम में भेद खोला था कि महाराज रावण की नाभि में अमृत कुंड है. जब तक उसे न भेदोगे वह मरेगा नहीं.

 जासूसों की लीला अनंत है. अखंड है. अनाहत है. जासूसी एक निर्गुण एक्शन है.

यूँ तो अभिमन्यु तक को जूनियर जासूस कहा जा सकता है. माँ के गर्भ में ही चक्रव्यू भेदने की कला सीख ली थी. उधर भगवान शिवजी पार्वती को कथा सुना रहे थे कि आदरणीय आदि कथावाचक शुकदेव जी ने छिपकर सुन ली. भाई जी हिट कथावाचक हो गए.

जासूसों की लीला अनंत है. अखंड है. अनाहत है. जासूसी एक निर्गुण एक्शन है.

ऐसे में अगर कोई कह देता है कि फलां के दरबार में विदेशी जासूस था तो लोग सीरियसली नहीं लेते. इतने आदी हो चले हैं कि बोर होने लगे हैं. सीआईए हो या आईएसआई. हमें क्या भाई?

अपनी सेना में जब देखो तब जासूस निकल आते हैं. अपनी नेवी के रक्षा उपायों के कंप्यूटरीकृत आंकड़े भी जासूस ले उड़े.

हर महीने कही न कहीं कोई न कोई जासूस प्रकट हो जाता है. ईंट उठाओ तो दस जासूस निकल पड़ते हैं. अपने भी जासूस दूसरों के यहां लगे रहते हैं.

जासूसी का विभाग गुप्तचरों की तरह गुप्त होता है. लेकिन जेम्स बाँड महाशय कहते हैं कि यार इंडिया भी कोई जासूसी का केंद्र हुआ? यहां तो हर चीज पहले से ही खुली रहती है. जिसपर ‘परम गोपनीय’, ‘मोस्ट काँफीडेंशल’ लिखा होता है वह सबसे ज़्यादा खुला होता है.

 जासूसी का विभाग गुप्तचरों की तरह गुप्त होता है. लेकिन जेम्स बाँड महाशय कहते हैं कि यार इंडिया भी कोई जासूसी का केंद्र हुआ? यहां तो हर चीज पहले से ही खुली रहती है. जिसपर ‘परम गोपनीय’, ‘मोस्ट काँफीडेंशल’ लिखा होता है वह सबसे ज़्यादा खुला होता है.

गूगल तक ने राष्ट्रपति भवन का नक्शा ऊपर से दिखा दिया. पंजी-दस्सी में बाबू वर्ग जो चाहो सूचना दे देता है. ऐसे में जासूसी कर मजा कहाँ. यहाँ तो जिसको चाहो खरीद लो. हर आदमी का दाम है. सच. इस काम में इसीलिए बड़ी बोरियत होती है. मैंने इसीलिए इंडिया को इस लायक कभी नहीं समझा.

लेकिन हमारे एक पूर्व मंत्री ने तो लिखा है कि आप वहाँ जासूसी कर रहे थे. ‘चार किताब बेचने का तरीका है.’ और क्या? जासूस था, उन्हें मालूम था तब वे क्यों चुप रहे? अरे पकड़ते न. देखो बिरादर. आप लोगों के यहाँ ही नहीं दुनिया भर में जासूसी कथा सबसे ज्यादा बिक्री कर ली है.

जेम्स बाँड फोन पर बोले, "जो किताब न बिकने वाली हो, उसमें जासूस का नाम डाल दो. फिर देखना किताब बिकेगी."

मैंने जानना चाहा, "आप न होंगे आपका बंदा तो हो सकता है?"

इस पर उसने कहा, "बेवकूफ, अगर होता तो मैं ख़ुद होता. लेकिन तुम्हारे मुल्क में ऐसा कुछ है ही नहीं जो जासूसी के लायक हो. यार सारा देश तो भूखा-नंगा है. नंगा क्या ओढे, क्या बिछाए? और क्या छिपाए?"

(बिंदास बाबू की डायरी का यह पन्ना आपको कैसा लगा लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर)

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