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शनिवार, 17 जून, 2006 को 08:42 GMT तक के समाचार
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हिंदू-मुस्लिम रिश्तों की व्याख्या करती किताब

किताब
इस किताब पर अंग्रेज़ों ने पाबंदी लगा दी थी
भारत के नेशनल बुक ट्रस्ट ने हिंदू-मुस्लिम रिश्तों की व्याख्या करती एक दुर्लभ किताब प्रकाशित की है जिसे समकालीन इतिहास में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जा रहा है.

इस किताब पर अंग्रेज़ सरकार ने पाबंदी लगा दी थी.

उत्तरांचल की राजधानी देहरादून में चल रहे पुस्तक मेले में शुक्रवार को इसका विमोचन किया गया. इसे एक ही साथ हिंदी-उर्दू और अंग्रेज़ी में भी प्रकाशित किया गया है.

‘सांप्रदायिक समस्या” नाम की ये किताब मूल रूप से 1931 के कानपुर दंगों पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की तैयार की हुई रिपोर्ट पर आधारित है.

24 मार्च, 1931 को कानपुर में हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे थे जिनपर कई दिनें तक काबू नहीं पाया जा सका था और अंतत: इसमें प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी भी मारे गये थे.

इसके कुछ दिन पहले ही बनारस में भी दंगा हो चुका था. तब कांग्रेस ने इन दंगों की जांच और दोनों समुदायों में बढ़ रही कड़वाहट की जांच के लिए अपने कराची सत्र में एक छह सदस्यीय समिति बनाई थी.

इसके सदस्य थे भगवान दास (अध्यक्ष), सुंदरलाल, पुरूषोत्तम दास टंडन, मंज़र अली सोख़्ता, अब्दुल लतीफ़ बिजनौरी और मौलाना जफ़रुल मुल्क.

पाबंदी

इस समिति की रिपोर्ट को कांग्रेस ने 1933 में प्रकाशित किया लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इस पर फौरन पाबंदी लगा दी थी.

इस दुर्लभ दस्तावेज़ को सात दशक बाद पहली बार किताब के तौर पर सार्वजनिक किया गया है.

 आधुनिक भारत में सांप्रदायिकता के जन्म और उसके प्रसार के कारण और उसके निदान के उपायों का जितना सूक्ष्म और तार्किक विश्लेषण इस किताब में है उतना शायद ही कहीं और देखने को मिलेगा
प्रोफेसर विपिन चंद्रा, इतिहासकार

प्रख्यात इतिहासकार और नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर विपिन चंद्रा के अनुसार, ''आधुनिक भारत में सांप्रदायिकता के जन्म और उसके फैलाव के कारण और उसके निदान के उपायों का जितना सूक्ष्म और तार्किक विश्लेषण इस किताब में है उतना शायद ही कहीं और देखने को मिलेगा.''

अगर किताब के कुछ अंशों पर नज़र डालें तो-हिंदू-मुस्लिम दंगे किसी तात्कालिक वजह से नहीं होते बल्कि ये सांप्रदायिकता की भावना और उन सांप्रदायिक विचारों का चरम विस्फोट होते हैं जो कि कुछ वर्षों से राजनीतिक और सामाजिक ताने-बाने में गहरे बिठा दिए गए हैं.

लेखकों ने ये भी तर्क दिया है कि सांप्रदायिकता कोई युगों पुरानी समस्या नहीं है जैसा कि भ्रांति फैलाई गई है बल्कि इसका जन्म औपनिवेशिक काल में हुआ.

ये किताब ब्रिटिश इतिहासकारों के उस नज़रिए का भी विरोध करती है जिसके अनुसार हिंदू-मुसलमान दो धर्म न होकर दो विपरीत ध्रुव हैं और जिनके आपसी रिश्ते स्वाभाविक और ऐतिहासिक रूप से कटु हैं.

ऐतिहासिक तथ्य

व्यापक ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इस किताब में बताया गया है कि विविधताओं के बावजूद सदियों से दोनों समुदाय मेल-मिलाप से रहते आए हैं.

 इस किताब का महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है जब हम देखते हैं कि सांप्रदायिकता आज भी हमारे सामने एक बड़ी समस्या हैं और कैसे स्वार्थी गुट जब चाहते हैं अपने फायदे के लिए दंगे करा देते हैं
मंगलेश डबराल, सलाहकार, नेशनल बुक ट्रस्ट

इसी वजह से इस किताब के एक बड़े हिस्से में मध्यकालीन और औपनिवेशकालीन इतिहास का विश्लेषण है.

किताब के एक पूरे अध्याय में वो राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक उपचार सुझाए गए हैं जिनसे दंगों और सांप्रदायिकता पर क़ाबू पाया जा सकता है.

नेशनल बुक ट्रस्ट के सलाहकार मंगलेश डबराल कहते हैं, "इस किताब का महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है जब हम देखते हैं कि सांप्रदायिकता आज भी हमारे सामने एक बड़ी समस्या हैं और कैसे स्वार्थी गुट जब चाहते हैं अपने फायदे के लिए दंगे करा देते हैं.”

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