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पत्र-पत्रिकाओं का एक अनूठा संग्रहालय | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भोपाल में एक छोटी सी शुरुआत के साथ वजूद में आया माधव राव सप्रे संग्रहालय आज पत्र-पत्रिकाओं के एक बड़े संग्रह और संकलन के लिए जाना जाने लगा है. इस संग्रहालय में पत्र-पत्रिकाओं के इतिहास से रूबरू हुआ जा सकता है. सप्रे संग्रहालय की विकास यात्रा 21 वर्ष पहले भोपाल के ऐतिहासिक कमलापति महल के पुराने बुर्ज से 73 पत्र-पत्रिकाओं के संकलन से शुरू हुई थी. इस संग्रहालय की नींव वरिष्ठ पत्रकार विजयदत श्रीधर ने डाली थी. इसके बाद अनेक लोगों ने अपना निजी संकलन भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और संरक्षित करने के लिए सप्रे संग्रहालय को सौंप दिया. आज यह संग्रहालय पत्र पत्रिकाओं पर शोध करने वाले छात्र-छात्राओं को हर तरह की जानकारी एक ही छत के नीचे उपलब्ध करा रहा है. सामग्री इस संग्रहालय में समाचार पत्र-पत्रिकाओं के अलावा गजट प्रतिवेदन और आज़ादी के पहले बड़े नेताओं के बीच हुए पत्र व्यवहार को भी देखा जा सकता है. विजयदत्त श्रीधर कहते हैं, "किसी पुराने वक़्त के समाचार पत्रों की इबारत को पढ़ते हुए इतिहास से रूबरू हुआ जा सकता है." इस संग्रहालय में आधुनिक भारत के पहले अख़बार 'हिक्कीज़ बंगाल गजट' के अलावा हिदुस्तान से प्रकाशित अब तक के सबसे छोटे और अब तक के सबसे बड़े समाचार पत्र की प्रति भी मौजूद है. ऐतिहासिक समाचार पत्र 'भारत भ्राता', 'मालवा अखबार' और 'अख़बार ग्वालियर' की प्रति भी यहाँ रखी गई है. इस संग्रहालय में लगभग 12,000 अखबार और 3000 पत्रिकाएँ हैं. शोध संग्रहालय में एक खंड भारतीय पत्रकारिता की शुरुआत से लेकर सन् 1920 तक के प्रकाशनों के लिए है तो दूसरा खंड उसके बाद के प्रकाशनों के लिए बनाया गया है.
संग्रहालय का एक खंड अख़बारों की कतरनों के लिए भी है और यहाँ उपलब्ध सामाग्री का फ़ायदा अब तक 569 शोधकर्ताओं ने उठाया है. यहाँ से शोध के लिए सामग्री जुटाने वाली वैशाली मानती है, "उपलब्ध सामग्री नायाब है और सबसे बड़ी बात है कि वो एक ही छत के नीचे मौजूद हैं." विजय दत्त श्रीधर का कहना है कि एक ही जगह इस तरह की सारी सामग्री शायद ही कहीं उपलब्ध हो. वो कहते हैं कि ये खासतौर पर महिला शोधार्थियों के लिए वरदान है. उन्हें अब सामग्री के लिए इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता. भाषा इस संग्रहालय में न सिर्फ़ आपको हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएं मिलेंगी बल्कि उर्दू, मराठी, गुजराती, संस्कृत और अंग्रेज़ी की पत्र-पत्रिकाओं के इतिहास को भी देखा जा सकता है. संग्रहालय की शोध निदेशक डॉ. मंगला अनुजा का कहना है, "आज़ादी के वक्त सभी भाषाओं का अपना योगदान रहा है. इन भाषाओं ने भारतीय पत्रकारिता में भी अपना सहयोग दिया है इसलिए सभी भाषाओं की सामग्री को इकठ्ठा करने की कोशिश की गई है." सप्रे संग्रहालय में वर्तमान में 25 लाख पृष्ठ से अधिक संदर्भ सामग्री जुटाई जा चुकी है. इन पृष्ठों से झांकती इबारत राष्ट्र के महान बौद्धिक विरासत की झलक प्रस्तुत करती है. विजयदत्त श्रीधर का कहना है कि ये सामग्री आने वाले पीढियों की अमानत है इसलिए ज़रुरत इस बात की है कि इसको सहेज कर रखा जाए. संग्रहालय पत्र पत्रिकाओं के संरक्षण का ख़ास ख़्याल रखता है और किसी को भी कोई सामग्री की फोटो कॉपी की अनुमति नहीं दी जाती. श्रीधर कहते हैं कि वे इस संग्रहालय को आने वाले वक्त में डिजीटल रुप में देखना चाहेंगे जिसके लिए तैयारी शुरु की जा चुकी है. | इससे जुड़ी ख़बरें भोपाल के दो शायरों में ठनी17 फ़रवरी, 2006 | मनोरंजन मूढ़ी बेचकर साहित्य साधना24 जून, 2005 | मनोरंजन संस्कृति प्रेम ने दिलाया ब्रितानी सम्मान20 मार्च, 2005 | मनोरंजन किस किस का शहर है एमस्टरडम28 नवंबर, 2004 | मनोरंजन ऐश्वर्या की मोम की मूर्ति लगेगी07 सितंबर, 2004 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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