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थियेटर, फ़िल्म और टीवी में संतुलन ज़रुरी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अगर जेहन में रजित कपूर का नाम आता है तो एक मंजे हुए कलाकार की छवि आंखों के आस-पास से गुजरने लगती है, जिसे पता है कि उसे क्या करना है और निर्माता-निर्देशक उससे क्या चाहता है. बहुत ही कम कलाकार ऐसे होते हैं जो एक कलाकार वाले शो में काम करना पसंद करते हैं और रजित कपूर उनमें से एक है. इन्होंने ‘वाइसेस्ट फ़ूल ऑन अर्थ’ नामक एक नाटक में कई भूमिकाओं वाला किरदार निभा कर अपने सर्वश्रेष्ठ अभिनय का परिचय भी दे दिया है. वैसे इनके ज्यादातर चाहने वाले इन्हें फ़िल्म और टीवी कलाकार के रूप में ही जानते हैं. लेकिन मुंबई के दर्शकों को इनके थियेटर प्लेज ज़यादा आकर्षित करते हैं जिनमें ‘लव लेटर्स’, ‘जमीलाबाई कलाली’, ‘लॉरेंस साब’ जैसे कई नाटकों की भरमार है. रजित कपूर से ख़ास बातचीत सवाल : काफ़ी समय बाद आप फिल्मों में वापसी कर रहें हैं ? इसकी वजह ? सवाल : फ़िल्म ‘डेडलाइन-सिर्फ 24 घंटे’ में आपके किरदार के बारे में बताइए ?
सवाल : आप थियेटर के कलाकार हैं तो आपकी एक्टिंग कला क्या होती है ? रजित : बडे पैमाने पर देखा जाए तो एक्टिंग करने की कला निर्देशक पर भी काफ़ी हद तक निर्भर करती है. वो अपने कलाकार से क्या चाहता है यह उस है. फ़िल्म भावनाओं का खेल होता है और निर्देशक उसे किस हद तक ले जाना चाहता है. सवाल : एक कलाकार के लिए फ़िल्मों और थियेटर के बीच संतुलन बनाए रखना कितना मुश्किल होता है ? सवाल : आप अपने आप को किस तरह का कलाकार मानते हैं ? सवाल : श्याम बेनेगल और आपका साथ नियमित रहा है. आपकी कौन सी बात उनको प्रेरित करती है ? सवाल : आज हर कलाकार किसी न किसी मकसद से जुडा हुआ है, क्या आप भी उन्हीं की तरह हैं ? |
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