| हीरो की भूमिका बदल गई है-जॉन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हाल के बरसों में चर्चित हुए जॉन अब्राहम कहते हैं कि अब हिंदी सिनेमा में हीरो की भूमिका बदल गई है और हीरो को लेकर लोगों की सोच बदल गई है. ज़्यादातर अभिनेताओं का बड़े पर्दे तक का सफर संघर्ष से शुरू होता है, लेकिन जॉन अब्राहम का फ़िल्मी सफ़र एक संजोग से शुरु हुआ. एमबीए करने के बाद वे एक विज्ञापन कंपनी मे काम कर रहे थे और एक दिन कोई मॉडल नहीं आया तो उनसे मॉडलिंग करने को कहा गया और थोड़े ही दिनों में एक सुपरिचित मॉडल बन गए. एक दिन अचानक पूजा भट्ट ने जॉन को अपनी फ़िल्म ‘जिस्म’ में हीरो का रोल दिया और जॉन अब्राहम ने फ़िल्मों में अपनी जगह बना ली. दीपा मेहता की नई फ़िल्म ‘वॉटर’ में अब्राहम ने प्रमुख भूमिका निभाई. इस साल टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव का उद्धाटन ‘वॉटर’ से हुआ और जॉन अब्राहम इसमें शामिल हुए. टोरंटों में वी. राधिका ने जॉन अब्राहम से बातचीत की. प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश : सवाल - वॉटर मे आपने अपनी छवि से हटकर एक गाँधीवादी का किरदार निभाया है. ये अनुभव कैसा रहा?
जवाब - अनुभव बहुत अच्छा रहा क्योंकि दीपा मेहता एक बहुत ही प्रतिष्ठित डायरेक्टर हैं. मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी तो बहुत अच्छा लगा, लगा कि ये विचारोत्तेजक स्क्रिप्ट है, आदमी को सोचने का मौका देता है. इससे पहले मैं भी आम हिन्दुस्तानी की तरह सोचता था कि विधवा आश्रम होते हैं लेकिन स्क्रिप्ट पढ़कर पता चला कि इतना कुछ होता है. दीपा मेहता ने मुझे बहुत संतुलित रखकर फ़िल्म बनाई. मुझे बता दिया गया था कि मुझे क़िरदार के दायरे में ही रहना है. सवाल - इस रोल के लिए आपको क्या तैयारी करनी पड़ी? जवाब - एक हिन्दुस्तानी होने के नाते हम सब गाँधीजी के बारे में जानते हैं. हाँ कुछ तैयारी करनी पड़ी जैसे मुझे धोती पहनना सीखना पड़ा, बाँसुरी बजानी सीखनी पड़ी, संस्कृत में श्लोक बोलना सीखना पडा. सवाल - भारतीय फ़िल्मों के मुकाबले वाटर मे आपने क्या फ़र्क महसूस किया? जवाब - एक फ़र्क तो ये महसूस हुआ कि 'वाटर' विश्व स्तर पर प्रदर्शित हुई और अचानक मुझे अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने ले आई. सबने मेरे काम की सराहना भी की. ये मेरे लिए विशिष्ट है. सवाल - एक अभिनेता के तौर पर क्या फ़र्क रहा? जवाब - दीपा मेहता एक ऐसी निर्देशक हैं जिसे अभिनेता का निर्देशक कहा जाता है. फिर वे एकदम प्रोफ़ेशनल हैं. वो इस बात का बेहद ध्यान रखती हैं कि अभिनेता को कोई अड़चन न हो, कोई बाधा न पहुँचे, इसलिए सेट पर अभिनेताओं का बड़ा ध्यान रखा जाता था. जहाँ तक काम करने का ढंग है तो ये लोग ज्यादा प्रोफ़ेशनल हैं, काम वक्त पर शुरू होता है और जल्दी पूरा भी होता है. सेट पर कम लोग काम करते हैं. उदाहरण के लिए, उनके सेट पर अगर 20 लोग हैं तो उसी काम के लिए हमारे यहाँ 200 लोग लगते हैं. लेकिन यहाँ ये जरूरी भी है क्योंकि भारत में बेरोज़गारी बहुत है और ये रोज़गार का एक साधन है. सवाल - इस फ़िल्म से आपकी क्या अपेक्षाएँ है? जवाब - टोरंटो मे पिछले 3-4 दिनों मे से मुझे कई एजेंट्स मिल चुके हैं. वो काफी मुझे लेकर काफ़ी आशान्वित हैं. वो सोचते हैं कि मै यहाँ (उत्तरी अमरीका) की फ़िल्मों में काम कर सकता हूँ. उनको लगता है कि मेरी शक्ल इटैलियन या दक्षिण अमरीका निवासियों जैसी है और इसलिए भी मझे यहाँ काम मिल सकता है. सवाल - हिन्दी फिल्मों में हीरो के बदलते छवि के बारे मे आप का क्या खयाल है? जवाब - मैं ख़ुद का ही उदाहरण दे सकता हूँ. मेरी पहली फ़िल्म जिस्म थी जिसमें मेरा पहला ही दृश्य रोते हुए मरने का था. कुछ साल पहले हिन्दी फिल्मों में कोई हीरो ऐसा काम नहीं करता था लेकिन अब बदलाव दिखता है. इसकी वजह शायद ये है कि इंडस्ट्री में नए लोग आ रहे हैं. अब मेरा ही उदाहरण लें तो मेरा चेहरा व्यावसायिक बॉलीवुड हीरो जैसा नहीं है, थोड़ा अलग है और इसलिए जितनी भी अलग क़िस्म की फिल्में बनती हैं मुझे लिया जाता है.
वैसे यशराज हमेशा रोमान्टिक फिल्में बनाते रहे हैं लेकिन जब उन्होंने सोचा कि 'धूम' जैसी एक अलग क़िस्म की फ़िल्म बनानी है और उन्हे एक बाइक चलाने वाले एक लड़के की ज़रूरत थी तो उन्होने मुझे बुलाया. उसी तरह जब 'काल' के निर्माता को अपने फ़िल्म के लिए जंगल पर शोध करने वाले व्यक्ति की ज़रूरत है तो उन्होंने मेरे बारे मे सोचा क्योंकि ये जो रोल है इन्में मैं ठीक बैठता हूँ. अगर करन जौहर और आदित्य चोपड़ा की बात दोहराऊँ तो तो वो कहते हैं, "जॉन तुम दाल चावल जैसे नहीं हो तुम शैंपेन जैसे हो, मतलब थोड़े मंहगें से, लेकिन जहाँ तुम्हारी ज़रूरत है वहाँ कोई और फ़िट नहीं हो सकता." आदित्य चोपड़ा ने कहा कि वे 'धूम' में मोटरबाइक पर वे मेरे अलावा किसी और को सोच नहीं सकते थे. मेरे ख़याल से फ़िल्म निर्माताओं की एक नई पीढ़ी आई है और ये बहुत उत्साहजनक है. मैं ये भी कहना चाहता हूँ कि आज की तारीख़ में जितनी भी हिन्दी फिल्में बन रही हैं बहुत अच्छी बन रही हैं. सवाल - विरुद्ध मे काम करने का अनुभव कैसा रहा? जवाब - ये मेरी दूसरी फ़िल्म थी बच्चन साहब के साथ. अगर सीखने का मौका मिल सकता है तो वो मेरे ख़याल से एक ही आदमी से मिल सकता है- बच्चन साहब से. हिन्दी फ़िल्म जगत में तीन-चार बड़े अभिनेता हैं, नसीरुद्दीन शाह, नाना पाटेकर और बच्चन साहब. मैंने सोचा कि उनके साथ काम करने का मौका क्यों न ले लूँ. बच्चन साहब ने कहा कि इस रोल के लिए उन्हें मेरी ज़रूरत है और मैं तुरंत तैयार हो गया. सवाल - आपका सबसे पसंदीदा रोल कौनसा है? जवाब - 'जिस्म' जो मेरी पहली फ़िल्म थी वो हमेशा मेरी पसंदीदी फ़िल्म रहेगी. जहाँ तक लोकप्रियता का सवाल है और जिसे करने में सबसे ज़्यादा मज़ा आया वो है 'धूम', ये फ़िल्म मेरे लिए बहुत ही ख़ास है क्योंकि धूम ने जिस तरह से भारत मे धूम मचाया, इसने मुझे एक नई जीवन रेखा दी. सवाल - आप अभी कौनसी फ़िल्म में काम कर रहे हैं? जवाब - मैं अभी यशराज प्रोडक्शन की एक फ़िल्म कर रहा हूँ काबुल एक्सप्रेस जिसमें अरशद वारसी हैं और हमारे साथ एक पाकिस्तानी और एक अफ़गानी कलाकार है और एक अमरीकी अभिनेत्री है. ये फ़िल्म काबुल से पाकिस्तान के सीमा तक तीन दिन के सफ़र के बारे में है और बहुत ख़ूबसूरत है. |
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