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इतिहासकारों को 'द राइज़िंग' पर आपत्ति | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रिटेन के एक इतिहासकार ने मंगल पांडे पर आधारित बॉलीवुड की फ़िल्म द राइज़िंग में दिखाई गई उन घटनाओं को निरर्थक बताया है जिनके बाद 1857 की क्रांति फैली थी. इस फ़िल्म में ब्रितानी फ़िल्म काउंसिल ने भी निवेश किया है. पिछले शुक्रवार को ही यह फ़िल्म दुनियाभर में रिलीज़ हुई है. एक ब्रितानी इतिहासकार सौल डेविड ने इस फ़िल्म के बारे में कहा, "मेरे सामने कभी भी ऐसे सबूत नहीं आए हैं जो इस फ़िल्म में दिखाई गई घटनाओं का समर्थन करते हैं." लेकिन फ़िल्म के निर्माता बॉबी बेदी का कहना है कि यह फ़िल्म ब्रिटेन विरोधी नहीं है. 1857 में ब्रितानी ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम करने वाले हिंदू और मुसलमान सैनिकों ने कारतूसों में जानवरों की चर्बी के इस्तेमाल के कारण बग़ावत कर दी थी. केतन मेहता निर्देशित इस फ़िल्म का मुख्य पात्र मंगल पांडे है जिसे बग़ावत के कारण फाँसी दे दी गई थी. मंगल पांडे की भूमिका की है आमिर ख़ान ने. द राइज़िंग में 1857 की घटनाओं की पृष्ठभूमि में मित्रता, धोखेबाज़ी, प्यार और बलिदान की कहानी गढ़ी गई है. ब्रितानी इसे सिपाही विद्रोह कहते हैं लेकिन भारतीयों के लिए यह पहला स्वतंत्रता संग्राम था. 'इंडियन म्यूटिनी: 1857' के लेखक सौल डेविड ने कहा, "कुछ हद तक आलोचना जायज़ है लेकिन लगता तो यही है कि इस फ़िल्म में सिर्फ़ निंदा करने के लिए ब्रिटेन की निंदा की गई है." आपत्ति उन्होंने इस फ़िल्म के एक दृश्य पर ख़ास तौर पर आपत्ति जताई है जिसमें ब्रितानी ऑफ़िसर एक गाँव को सिर्फ़ इसलिए नष्ट करने का आदेश दे देता है क्योंकि गाँववासी अफ़ीम के उत्पादन के लिए अपनी ज़मीन देने से इनकार कर देते हैं. सौल डेविड ने कहा, "ईस्ट इंडिया कंपनी अफ़ीम का व्यापार ज़रूर करती थी लेकिन इस तरह की जनसंहार जैसी घटना मेरी जानकारी में नहीं है और मैं नहीं मानता कि ऐसा कुछ हुआ था."
कंज़र्वेटिव पार्टी के कला मामलों के प्रवक्ता ह्यूगो स्वायर ने इस पर भी सवाल उठाया कि सरकारी सहायता वाले ब्रितानी फ़िल्म काउंसिल ने इस फ़िल्म में क़रीब डेढ़ लाख पाउंड निवेश क्यों किया? लेकिन ब्रितानी फ़िल्म काउंसिल का कहना है कि काउंसिल गुणवत्ता के आधार पर निवेश करता है, राजनीति के आधार पर नहीं. पिछले सप्ताह एक भारतीय इतिहासकार रूद्रांग्शू मुखर्जी ने भी 1857 की क्रांति में मंगल पांडे की भूमिका पर सवाल उठाए थे. उन्होंने कहा था, "148 साल बाद इस विषय पर कई शोध हो चुके हैं और इसके बावजूद हमें मंगल पांडे के बारे में बहुत कम जानकारी है." लेकिन फ़िल्म के निर्देशक केतन मेहता का कहना है कि फ़िल्म को पूरा होने में दो वर्ष इसलिए लगे क्योंकि इस पर काफ़ी शोध किया गया था. |
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