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पटवर्धन की फ़िल्म प्रदर्शन को तैयार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आनंद पटवर्धन की एक और बहुचर्चित फ़िल्म 'जंग और अमन' बहुत सारी क़ानूनी लड़ाई लड़ने के बाद आख़िरकार प्रदर्शित होने को तैयार है. इस फ़िल्म की एक ख़ासियत यह है कि भारतीय फ़िल्म के इतिहास में ऐसा पहली बार होगा कि एक डाक्यूमेंट्री को व्यावसायिक सिनेमा हॉल में रिलीज़ किया जाएगा. पिछले साल माइकल मूर की डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'फ़ारेनहाइट 9/11' को भारत के सिनेमाघरों में भी प्रदर्शित किया गया था. आगामी 24 जून को मुंबई के एक थिएटर में रिलीज़ हो रही 'जंग और अमन' एक हफ़्ते बाद एक दूसरे सिनेमा हॉल में रिलीज़ की जाएगी. ये फ़िल्म परमाणु हथियार और युद्द के ख़तरों के बीच उग्रवाद और कट्टरपंथी राष्ट्रवाद के बीच संबंध तलाशने की कोशिश करती है. लंबी लड़ाई जंग और अमन 2002 में बनकर तैयार हो गयी थी लेकिन कुछ वर्षों से ये फ़िल्म अदालतों के चक्कर में फंसी हुई थी. सबसे पहले 2002 में ही सेंसर बोर्ड ने फ़िल्म के छह हिस्सों को काटने की सिफ़ारिश की थी. इसके बाद फ़िल्म के निर्देशक आनंद पटवर्धन के सेंसर बोर्ड की पुनर्विचार समिति में अपील की जिसके बाद सेंसर बोर्ड ने फ़िल्म पर प्रतिबंध लगा दिया. सेंसर बोर्ड की दूसरी पुनर्विचार समिति में जब अपील गई तो उसने फ़िल्म के 21 भागों पर कैंची चलाने की सिफ़ारिश की. मामले की सुनवाई बोर्ड के ख़ास एपेक्स ट्राइब्यूनल में पहुँची. ट्राइब्यूनल ने फ़िल्म के दो हिस्सों को आपत्तिजनक पाया और उसे काटने के आदेश दिए. आनंद पटवर्धन के अनुसार उनको फ़िल्म का कोई भी हिस्सा काटना मान्य नहीं था. वे मामले को मुंबई हाईकोर्ट तक ले गए. मुंबई हाईकोर्ट ने आख़िरकार कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी इस फ़िल्म को बिना किसी काट-छाँट के प्रदर्शित करने का फ़ैसला सुनाया. विवादास्पद फ़िल्मों के निर्माता आनंद पटवर्धन और उनकी फ़िल्मों के लिए ये कोई नई बात नहीं थी.
इससे पहले लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा पर बनी उनकी फ़िल्म 'राम के नाम' भी दर्शकों तक इन्हीं जद्दोजहद के बाद पहुँची थी. आनंद पटवर्धन के मुताबिक़ देश की सत्ताधारी ताक़तों की लाख जोड़ तोड़ के बावजूद इस देश का संविधान इस देश के नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है. 'जंग और अमन' के केंद्र में हैं युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद. राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर आम नागरिकों को कौन से मूल्य चुकाने पड़ रहे हैं, फ़िल्म इस प्रश्न का विस्तार से उत्तर ढूँढ़ती है. ज़ाहिर है कि ये असहमति वाले कई सवाल खड़े करती है. स्मृति फ़िल्म में इस अमरीकी मान्यता पर बार-बार सवाल उठाया गया है कि एटम बम से विश्व शांति स्थापित हो सकती है. 1998 में भारत ने पोखरण में अपना दूसरा सफल आण्विक परीक्षण किया था. फिर पाकिस्तान ने भी परीक्षण किए और बाद के दिनों में हालात कुछ ऐसे बदले कि भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध की स्थिति पैदा होने लगी. इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा था जब आण्विक हथियार के इस्तेमाल की बात सोची जी रही थी. इससे पहले हिरोशिमा और नागासाकी पर अमरीकी हमले के सबक शायद आम स्मृति से विस्मृत हुए जा रहे थे. आनंद पटवर्धन ने उस स्मृति को कुरेदने की कोशिश की है. फ़िल्म की शुरुआत महात्मा गांधी की हत्या से होती है. गांधी की हत्या का गहरा संबंध भारत में कट्टरपंथ के उदय से था. कट्टरपंथ और उग्र राष्ट्रवाद का उदय एक साथ हुआ. फ़िल्म इन दोनों के संबंध की पड़ताल करती है. फ़िल्म में यूरेनियम के खदानों में काम करने वाले मज़दूरों और परीक्षण स्थल के आस-पास के आम नागरिकों की सेहत के लिए, आण्विक हथियार या राष्ट्रवाद के क्या मतलब हैं यह भी दिखलाया गया है. फ़िल्म के मुताबिक उग्र राष्ट्रवाद एक ख़ास किस्म के अभिजात्यों की अवधारणा है जो उनके अपने वर्गहित के लिए उपयुक्त है. जंग और अमन एक घनघोर अंधेरे के ताने-बाने को तोड़ती हुई उजाले की तरफ़ सफ़र करती है. भारत और पाकिस्तान में नोटिस न किये जाने वाले स्तर पर चल रही शांति की कोशिश और उम्मीद भी फ़िल्म में देखने को मिलती है. अगंभीर व्यक्ति आनंद पटवर्धन निर्देशक के अलावा स्वयं इस फ़िल्म के संपादक भी हैं. दो या दो से अधिक चित्र और संवाद एक ख़ास जगह मिलकर नये अर्थ के कई आयाम खोलते हैं. अपने विषय की गहरी समझ, शोध करने की न उबने वाली मानसिकता, सरकार या किसी भी ताकत के आगे न झुकने की हिम्मत और अपने माध्यम पर महारत, शायद इन्ही कारणों से आनंद पटवर्धन को भारत का माइकल मूर कहा गया है. आनंद पटवर्धन अपने बारे में कहते हैं कि वो एक अगंभीर व्यक्ति हैं जिन्हें परिस्थितियों ने गंभीर फ़िल्म बनाने के लिए मजबूर कर दिया है. पटवर्धन को हिंदी की गिनी-चुनी मनोरंजक फ़िल्में देखने से परहेज नहीं है. हाल में ही उन्होंने लगान, मुन्नाभाई एमबीबीएस और मैं हूँ ना जैसी कुछ फ़िल्में देखी हैं. ये पूछे जाने पर कि क्या वो कभी हिंदी फ़ीचर फील्मों की तरफ रुख़ करेगें, पटवर्धन ने कहा, "मेरे लिए अहम मुद्दों पर डाक्यूमेंट्री बनाना अधिक ज़रुरी है क्योंकि ये कभी नष्ट न होने वाले ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं जिनमें विरोध और संभावनाओं के निष्कपट स्वर सुने जा सकते हैं." |
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