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सियासी सफ़र पर बनी फ़िल्म | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बांग्लादेश में बचपन, लंदन में छात्र जीवन और उसके बाद पश्चिम बंगाल में सात दशक लंबे राजनीतिक जीवन की कितनी ही भूली-बिसरी यादें और घटनाएँ. अपने जीवन पर बनी दो घंटे लंबी डाक्यूमेंट्री को देखते हुए माकपा के वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु मानों अतीत में डूब गए. जाने-माने फ़िल्मकार गौतम घोष की इस फ़िल्म का शो खत्म होने के बाद उन्होंने कहा कि "मुझे भी याद नहीं था कि मैंने इतनी बातें कहीं थी. मेरी यादें ताजा हो गई हैं." वर्ष 1997 से 2004 यानी पूरे आठ साल की शूटिंग के बाद बनी ‘ज्योति बसुर संगे (ए जर्नी विथ ज्योति बसु) यानी ज्योति बसु के साथ एक सफर’ में पहली बार बसु के जीवन के छुए-अनछुए कई पहलू आम लोगों के सामने आएँगे. बंगाल के कुछ चुनिंदा सिनेमाघरों में पहली मई को यह डाक्यूमेंट्री रिलीज होगी. अपना पूरा जीवन मेहनतकश लोगों के हितों की लड़ाई में बिताने वाले नेता के जीवन पर बनी फिल्म के लिए शायद पहली मई यानी मजदूर दिवस से बेहतर कोई मौका हो ही नहीं सकता था. कोलकाता के नंदन सिनेमाघर में इस डाक्यूमेंट्री का प्रीमियर शो आयोजित किया गया. इसके दर्शकों में ज्योति बसु, मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, उनके मंत्रिमंडल के सदस्य और फिल्मकार मृणाल सेन समेत कई जानी-मानी हस्तियां शामिल थीं. खुद बसु कहते हैं कि ‘यह फिल्म एक ऐतिहासिक दस्तावेज साबित होगी.’ फिल्म की शूटिंग पश्चिम बंगाल के अलावा विदेशों खासकर लंदन में की गई है. इसमें बसु ने बचपन के कई ऐसे क्षणों को याद किया है जो राजनीतिक जीवन की आपाधापी में वे कब के भूल चुके थे. इस फिल्म की शूटिंग हालांकि अलग-अलग टुकड़ों में आठ वर्षों तक हुई, लेकिन इसके लिए गौतम घोष ने बसु का इंटरव्यू बीते साल ही लिया. घोष कहते हैं कि उन्होंने बसु पर फिल्म बनाने का फैसला इसलिए किया कि वे उन गिने-चुने राजनीतिज्ञों में से हैं जिन्होंने बीते सात दशकों के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य को देखा है. वे कहते हैं, "मैं उनके नजरिए को समझने का प्रयास करना चाहता था. फिल्म पूरी करने के लिए मैंने ज्योति बसु के सत्ता से रिटायर होने तक इंतजार करने का फैसला किया था ताकि वे उन सब मुद्दों पर खुल कर अपनी बात कह सकें जिन पर सत्ता में रहते कुछ नहीं कहा था." |
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