| सुनील दत्त:एक बहुआयामी व्यक्तित्व | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आज जब वे नहीं रहे तो यह तय करना कठिन दिखाई देता है कि सुनील दत्त थे कौन? एक पत्रकार, एक अभिनेता, एक सामाजिक कार्यकर्ता, एक मानवतावादी या फिर एक राजनीतिज्ञ. यह कठिन इसलिए है क्योंकि उनके ये सब उनके व्यक्तित्व के अभिन्न अंग थे. पाकिस्तान के हिस्से में चले गए झेलम ज़िले के ख़ुर्द गाँवों में जन्मे सुनील दत्त को भी विभाजन के समय लाखों लोगों की तरह भारत आना पड़ा और वे मुंबई पहुँच गए. ग़रीबी में पढ़ाई कर रहे सुनील दत्त को अपने शुरुआती दिन मुंबई के फुटपाथ पर बिताने पड़े और मुंबई के जयहिंद कॉलेज की पढ़ाई के अलावा रोटी कमाने की जुगत में लगना पड़ा. उसी दौर में उन्होंने एक ब्रितानी विज्ञापन कंपनी और रेडियो सिलोन के लिए काम करना शुरु किया. वे रेडियो सिलोन के लिए फ़िल्मी हस्तियों के साक्षात्कार लेते हुए एक दिन ख़ुद फ़िल्म अभिनेता बन गए. इसी दौरान उनकी मुलाक़ात नर्गिस से भी हुई जो बाद में उनकी पत्नी बनीं. मदर इंडिया, मुझे जीने दो, सुजाता, पड़ोसन से लेकर मुन्नाभाई एमबीबीएस तक कई यादगार फ़िल्में करने वाले सुनील दत्त की पहली फ़िल्म रेलवे प्लेटफॉर्म (1955) को ख़ास सफलता नहीं मिल सकी थी. निर्देशकों के पसंदीदा अभिनेता माने जाने वाले सुनील दत्त ने निर्माता-निर्देशक के रुप में भी हाथ आजमाया. रेशमा और शेरा (1971) से उनको बड़ी निराशा हाथ लगी लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और 1981 में रॉकी बनाकर उन्होंने अपने बेटे संजय दत्त को सिनेमा में उतारा लेकिन उसी साल नर्गिस की कैंसर से मौत हो गई. इस सदमे से उबरते-उबरते उन्होंने कैंसर को लेकर एक संवेदनशील फ़िल्म दर्द का रिश्ता बनाई जिसे ख़ूब सराहना मिली. जिस दौर में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन ने सुनहरे पर्दे पर धाक जमा रखी थी उस दौर में भी सुनील दत्त को फ़िल्मों में काम करने का अवसर मिलता रहा और उसी समय उनकी रुचि सामाजिक कार्यों और फिर राजनीति में जागी. सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में उन्होंने नर्गिस की मौत के बाद कैसर के लिए देश और दुनिया के कई कैंसर अस्पतालों के लिए करोड़ों की धनराशि जुटाई और कैंसर पीड़ितों की सहायता को अपने जीवन का लक्ष्य बनाए रखा. धर्मनिरपेक्षता के कट्टर समर्थक सुनील दत्त ने सांप्रदायिक सद्भावना को लेकर बहुत काम किया और सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ उनकी पदयात्रा की बड़ी चर्चा रही. शुरुआती दिनों से ही वे कांग्रेस पार्टी के साथ राजनीति करते रहे. सुनील दत्त एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हे जीवन भर संघर्ष करना पड़ा. पहले नर्गिस की मौत फिर संजय दत्त को नशे की लत फिर संजय दत्त का मुंबई बम कांड में फँसना और फिर अंतिम दिनों का राजनीतिक ऊहापोह. शायद ऐसे पहले अभिनेता थे जो एक बार राजनीति में आए तो फिर यहीं डटे रहे और उम्रभर कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा क्योंकि वे मानते थे कि यही पार्टी सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लड़ रही है. ये और बात है कि संजय दत्त के बम कांड में फँसने से लेकर शिवसेना से निकाले गए सांसद संजय निरुपम को कांग्रेस में वापस लेने के मामले तक कांग्रेस ने उनकी अनदेखी ही की. सुनील दत्त की उपस्थिति इतनी प्रभावशाली थी कि उनकी अनुपस्थिति बहुत समय तक देश के राजनीतिक और सामाजिक समाज को महसूस होती रहेगी. |
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