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'फ़िल्में दीवारें न खड़ी करें...'
सुनील दत्त
सुनील दत्त ने कहा कि वे ऐसी फ़िल्में बनाने के हक में नहीं जो लोगों के बीच दीवारें खड़ी करती हैं
सुप्रसिद्ध हिंदी फ़िल्म अभिनेता और काँग्रेस नेता सुनील दत्त ने भारत-पाकिस्तान रिश्तों के संदर्भ में कहा है कि वे ऐसी फ़िल्में बनाने के हक़ में नहीं हैं जिनसे लोगों के बीच दीवारें खड़ी होती हैं.

उनका कहना था कि जब लड़ाई के बादल मंडरा रहे हों तो अजीब माहौल पैदा हो जाता है और समाचार माध्यम भी ऐसा माहौल बनाते हैं.

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उनका कहना था ऐसे माहौल में फ़िल्म निर्माता भी 'देशभक्ति' की भावना दर्शाती हुई फ़िल्में बनाते हैं.

उनका कहना था, "लेकिन इससे कोई मदद नहीं मिलती. बल्कि नफ़रत ही बढ़ती है. यदि दोनो देश भाईचारे से रहना चाहते हैं तो ऐसा नहीं होना चाहिए."

सुनील दत्त ने ये विचार बीबीसी हिंदी सेवा के साप्ताहिक कार्यक्रम 'आपकी बात बीबीसी के साथ' में श्रोताओं के सवालों के जवाब में व्यक्त किए.

उन्होंने कहा कि जब वे दक्षिण एशिया के देशों के लोगों को जोड़ने के लक्ष्य से एक जन आंदोलन में भाग ले रहे थे तो उन्होंने इन देशों के नेताओं से अपने रक्षा बजट को पाँच प्रतिशत घटाकर इसे ग़रीबी हटाने, शिक्षा प्रदान करने और स्वास्थ्य आदि के लिए ख़र्च करने का अनुरोध किया था.

सुनील दत्त का कहना था कि भारत और पाकिस्तान की 95 प्रतिशत जनता शांति चाहती है लेकिन इसके लिए इच्छाशक्ति की ज़रूरत है.

'विश्वास ज़रूरी'

उनका कहना था कि जब हक़ीक़त में कोई घटनाएँ होती हैं जैसे करगिल की घटनाएँ हुईं तो फ़िल्में भी बनाई जाती हैं.

लेकिन ऐसी फ़िल्में बनाने से कोई मदद नहीं मिलती. बल्कि नफ़रत ही बढ़ती है. यदि दोनो देश भाईचारे से रहना चाहते हैं तो ऐसा नहीं होना चाहिए

 लेकिन ऐसी फ़िल्में बनाने से कोई मदद नहीं मिलती बल्कि नफ़रत ही बढ़ती है. यदि दोनो देश भाईचारे से रहना चाहते हैं तो ऐसा नहीं होना चाहिए
सुनील दत्त

लेकिन उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जब दुनिया के बड़े नेता बैठकर आपस में बातचीत करते हैं और समस्याएँ सुलझाते हैं तो लोग ये बातें भूल जाते हैं.

उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हिटलर के जर्मनी और अन्य देशों में किए कारनामों के बाद भी यूरोप के देशों ने आपसी सहयोग का फ़ैसला किया और आज उनकी आर्थिक प्रगति देखने वाली है.

जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत राष्ट्रपति मुशर्रफ़ पर भरोसा कर सकता है तो उन्होंने कहा कि बिना विश्वास के किसी परिणाम की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

सुनील दत्त का कहना था कि भारत और पाकिस्तान को एक दूसरे पर भरोसा करना होगा क्योंकि दोनो देशों के लोग शांति चाहते हैं.

उनका कहना था कि यदि भारत को ऐसा लगता कि पाकिस्तान अपने प्रयासों में गंभीर नहीं है तो प्रधानमंत्री वाजपेयी इस्लामाबाद नहीं जाते.

'रिश्ते सुधर रहे हैं'

उनका कहना था कि प्रधानमंत्री का पाकिस्तान जाना इस बात का संकेत है कि दोनो देशों के रिश्ते सुधर रहे हैं.

उनका कहना था कि रिश्ते बेहतर होने से न केवल युवाओं बल्कि महिलाओं और बच्चों की जान भी बच सकती है.

सुनील दत्त ने कहा कि उन्होंने देश का बंटवारा देखा है जब ख़ून-ख़राबे में लगभग दस लाख लोग मारे
गए थे और उन्हें लगता था कि वे उन दिनों को कभी भूल नहीं पाएँगे.

लेकिन उन्होंने कहा कि वह केवल के बुरा स्वप्न लगता है क्योंकि भारत के नेताओं ने सिखाया कि पुरानी बातों को पीछे छोड़ आगे की सोचनी चाहिए.

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