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जब मैं दत्त साहब का सहयात्री बना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बात जनवरी 2003 की है. पूर्वोत्तर भारत के राज्य नगालैंड में विधानसभा चुनाव होने थे और इसी सिलसिले में मैं अपनी सहकर्मी स्वाति चौहान के साथ नगालैंड जा रहा था. सुबह-सुबह हमने कोलकाता के नेताजी सुभाषचंद्र बोस हवाई अड्डे से दीमापुर जा रहे विमान में अपनी सीट पकड़ी. जैसा कि पूर्वोत्तर भारत के सफ़र में प्रायः होता है, विमान काफ़ी छोटा था, बमुश्किल 25-30 यात्रियों के लिए पर्याप्त. हमें सीट मिली आगे से बिल्कुल दूसरी कतार में, हमारे से आगेवाली सीट ख़ाली और उसके आगे थोड़ी और ख़ाली जगह के बाद उल्टी तरफ़ परिचारिका के बैठने के लिए एक फ़ोल्डिंग सीट. हम अपनी सीट पर बैठे अख़बार के पन्ने उलट-पुलट रहे थे कि इसी बीच मैंने देखा, सुनील दत्त मुस्कुराते हुए आए और आगे वाली सीट पर बैठ गए. मैंने स्वाति से फ़ुसफ़ुसाकर कहा, "देखा?" वो बोलीं,"क्या?" मैंने फिर उसी स्वर में कहा,"अगली सीट पर?" इसके बाद स्वाति ने आगे देखा, फिर हम दोनों मुस्कुराने लगे. सुगबुगाहट विमान छोटा हो, जिसमें बिज़नेस क्लास और इकोनॉमी क्लास का अंतर ना हो, और कोई प्रख्यात हस्ती विमान में आ जाए तो क्या होता है, अब ये देखने की बारी थी. विमान उड़ा और दत्त साहब एक बार बाथरूम जाने के लिए उठे, जो बिल्कुल पीछे था. छोटे विमान की छत को छूने जितने लंबे दत्त साहब ने खड़े होकर अपनी अमिट मुस्कुराहट के साथ पूरे विमान को निहारा, थोड़े झुके कंधों पर टिका अपना सिर हिलाया और पीछे की ओर चल पड़े, सबको देखकर मुस्कुराते हुए. फिर जब वे अपनी सीट पर लौटे, तो उनकी मुस्कुराहट से सहज महसूस कर रहे यात्री बारी-बारी से उनके पास आने लगे, किसी ने नमस्ते की, किसी ने हाथ मिलाया, किसी ने ऑटोग्राफ़ लिया. हाँ एक और मज़े की बात रही कि उस छुटके विमान में, जो किसी बस की तरह आवाज़ करते उड़ रहा था, स्पीकर पर पुराने गानों की धुन बजनी शुरू हो गई थी. संकोच
अब हमारे सामने एक के बाद एक लोग आ रहे थे और 'दत्त साहब' से मिलकर चले जा रहे थे और हमें समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें. केवल मिल लें, या इंटरव्यू करें, या बैठे रहें, बाद में मिलें, तरह-तरह के विकल्प, प्रस्तावित हो रहे थे, ख़ारिज़ हो रहे थे. एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठन का बड़ा नाम ये भी अहसास दिला रहा था कि अपनी गरिमा को भी बनाए रखना है. आगे एक नगालैंड की स्थानीय युवती बैठी दत्त साहब को कुछ पन्ने दिखा रही थी. मैंने और स्वाति ने अंततः फ़ैसला कर ही लिया, और युवती के जाते ही, जो शायद मिलनेवालों में सबसे अंतिम यात्री रही हो, स्वाति ने पहल की. हम दोनों बाहर निकले, उनको नमस्ते किया, और फिर दत्त साहब ने ये जानकर कि हम बीबीसी से हैं, हम दोनों को बैठने के लिए कहा. स्वाति परिचारिका वाली उल्टी सीट पर आमने-सामने और मैं दत्त साहब के बगल में. बातचीत किसी भी प्रख्यात हस्ती का हमसफ़र बनने का मेरा ये पहला अवसर था, और कितना भी क्यों ना कहूँ, अजीब लग रहा था, असहज लग रहा था. हमने उनसे पूछा कि आप तो नगालैंड चुनाव प्रचार के लिए जा रहे हैं ना. इस पर उन्होंने कहा कि क्या कहूँ अचानक हाईकमान से कहा गया कि आपको जाना है तो मैं चला आया, मुझे ईमानदारी से कुछ भी नहीं पता कि वहाँ क्या हो रहा है, आपको क्या लगता है, सब ठीक है वहाँ ? अब असल बात ये थी कि मैं लंदन से आया था रिपोर्टिंग के लिए, और असल स्थिति मुझे भी नहीं पता थी, सिवाय आँकड़ों और अख़बारों से मिले ज्ञान के. लेकिन हमने भी कह दिया कि नहीं बिल्कुल ठीक है हालत, जमीर साहब(नगालैंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री), काफ़ी मज़बूत स्थिति में हैं. अब इसके बाद दत्त साहब ने बातें शुरू कीं तो बस क्या-क्या नहीं कहा. गुजरात के दंगों की चर्चा की, युवा शक्ति और ख़ासकर कल्पना चावला के योगदान की चर्चा की जो उन दिनों अंतरिक्ष यात्रा पर जानेवाली थीं. मैंने उनसे किसी बात पर उम्र पूछ डाली, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, मैं 25 प्लस हूँ. कोई डेढ़ घंटे उनके साथ यात्रा करते हुए, बात करते हुए, हम दीमापुर पहुँच गए, उन्होंने कहा, चुनाव सभा में आइएगा. चुनाव सभा दीमापुर हवाई अड्डे पर बाहर उनके स्वागत के लिए भीड़ खड़ी थी, उनको ख़ास नगा पहचान वाली जैकेट पहनाई गई, और फिर जब वे गाड़ी में बैठ रहे थे, तो अचानक हमें देखकर उन्होंने फिर उसी मुस्कुराहट के साथ इशारे से सभा में आने के लिए कहा. चुनाव सभा में उन्होंने ख़ूब तालियाँ बटोरीं, सरलता से सबके सामने उम्मीदवार से उसका नाम पूछकर, लोगों से उसे वोट देने के लिए कहा और भाषण दिया. और मैं उनका भाषण सुनकर चकित था, उसमें अधिकांश वही बातें थीं जो उन्होंने हमसे विमान में कही थीं, वही गुजरात दंगे, वही युवा शक्ति की ताक़त और वही कल्पना चावला का उल्लेख! मैने मन ही मन कहा, अच्छा तो दत्त साहब विमान में हमारे साथ प्रैक्टिस कर रहे थे! भाषण ख़त्म हुआ, वो नीचे उतरे, फिर हमें देखा और मुस्कुराते हुए कहा, कैसा था, ठीक था? हम भी मुस्कुरा दिए. स्मृति नगालैंड में कांग्रेस नहीं जीत सकी, कुछ ही दिनों बाद कल्पना चावला की दुर्भाग्यपूर्ण और असामयिक मृत्यु हो गई. आज दत्त साहब भी नहीं रहे, मगर हमें तो थोड़े से झुके हुए कंधों के ऊपर, उनका वही चेहरा याद आता है, मुस्कुराहट से सजा. आज कभी किसी कमज़ोर क्षण में, जब कभी लगता हो कि अपना संयम कमज़ोर पड़ रहा हो, सिद्धांत-मूल्य थोथे लगने लगते हों, अकड़ दिखाने को जी चाहता हो, दत्त साहब का विनम्र चेहरा याद करता हूँ, गर्दन स्वयं झुक जाती है, मुस्कुराने को जी चाहता है, एक नई ऊर्जा के साथ, विश्वास के साथ. |
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