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सेक्स को समझने की एक और कोशिश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
स्त्री-मन में सेक्स और प्यार की थाह लेने के दिन करवट बदल रहे हैं, अब बारी पुरुषों की है. भारत की साप्ताहिक पत्रिका, इंडिया टुडे और एसी निल्सन-ओआरजी मार्ग ने संयुक्त रूप से किए गए एक सर्वेक्षण में पुरूषों के दिमाग़ में सेक्स को लेकर चलने वाली हलचल का जायज़ा लेने की कोशिश की है. सर्वेक्षण के मुताबिक़ 89 प्रतिशत लोगों के लिए सेक्स ख़ास महत्व रखता है जबकि केवल 3 प्रतिशत लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है. लगभग तीन-चौथाई पुरुषों ने स्वीकारा की सहचर्य में दोनों, स्त्री और पुरुष की संतुष्टि को महत्व दिया जाना चाहिए और 43 प्रतिशत पुरुषों को महिलाओं का वक्षभाग सबसे ज्यादा आकर्षित करता है. पर ख़बर ख़राब भी है, 40 प्रतिशत पुरुषों को कंडोम का इस्तेमाल करना पसंद नहीं है. वे इसे अपने आनंद में बाधक पाते हैं. सर्वेक्षण में पुरुषों ने अपने विवाहेत्तर संबंधों और समलैंगिक संबंधों पर भी मुँह खोला है. प्रभावी पुरुषवाद सर्वेक्षण के तमाम नतीजों में यह साफ़ दिखाई देता है कि अभी भी सेक्स को लेकर पुरुषों के मनोविज्ञान में बहुत तब्दीली नहीं आई है.
मसलन, 72 प्रतिशत पुरुष अभी भी ऐसी महिला से ही शादी करना चाहते हैं जिनका कौमार्य सुरक्षित हो और 77 प्रतिशत लोगों ने ऐसी महिला से विवाह करने से इनकार किया जिसके शादी से पहले किसी से शारीरिक संबंध रहे हों. हालाँकि केवल 46 प्रतिशत पुरुष ही ऐसे थे, जिन्होंने शादी के बाद शारीरिक संबंध बनाए. इनमें 14 प्रतिशत ने अपने स्कूल के समय में और 27 प्रतिशत ने कॉलेज में पढ़ाई के दौरान सेक्स संबंध बनाए. भारतीय पुरुष में सेक्स संबंधी व्यवहार अभी भी ख़ासा पारंपरिक है. मिसाल के तौर पर आधे से अधिक पुरुषों को रात के वक्त बिस्तर पर ही शारीरिक संबंध पसंद है. अस्सी प्रतिशत लोगों का मानना है कि सेक्स उनका दांपत्य अधिकार है.
इस सर्वेक्षण के मुताबिक़, आधे से अधिक पुरुष, साड़ी को आज भी नारी के लिए सबसे उपयुक्त परिधान मानते हैं. सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले 63 प्रतिशत पुरुषों ने बताया कि उन्होंने कभी सेक्स के लिए पैसे का सहारा नहीं लिया यानी बाजार में बिकते जिस्म से ये दूर ही रहे. पर तीन प्रतिशत पुरुष ऐसे भी हैं जिन्होंने पुरुष यौनकर्मियों से संबंध बनाए हैं. और तो और, 19 प्रतिशत लोगों ने समलैंगिक संबंधों का अनुभव होने की बात स्वीकारी है. सर्वेक्षण पर सवाल इस सर्वेक्षण के लिए भारत के 11 शहरों के दो हजार, चार सौ निन्यान्बे लोगों से बातचीत की गई जिनमें 18 से 55 वर्ष की आयु वाले विवाहित-अविवाहित पुरुषों को ही शामिल किया गया है. पर कई विशेषज्ञ इस तरह के सर्वेक्षणों पर भी सवाल उठा रहे हैं.
जानी-मानी मनोवैज्ञानिक, प्रोफ़ेसर अरुणा ब्रूटा कहती हैं, "अब तक ऐसा अमरीका में ही होता था, अब अपने यहाँ भी हो रहा है, यह देखकर खुशी होती है पर इस तरह के सर्वेक्षण उन लोगों की समझ को बताते हैं जो कि इस मुद्दे पर खुलने और बोलने को तैयार हों और औसत मध्यमवर्गीय भारतीय अभी इस बारे में बोलने को तैयार नहीं है." अपने अनुभवों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, "भारतीय पुरुष अपनी एड्स की बीमारी को स्वीकार कर सकते हैं पर समलैंगिकता पर बोलने या स्वीकार करने से कतराते हैं." वरिष्ठ स्तंभकार मनोहर श्याम जोशी पत्रकारिता में इस तरह के चलन को कड़ी प्रतिस्पर्धा वाले बाजार की देन मानते हैं. उन्होंने कहा, "कुछ विषय शाश्वत जिज्ञासा और रुचि के होते हैं. मृत्यु, भूत-प्रेत की तरह ही सबसे ज्यादा जिज्ञासा वाला विषय है सेक्स." उन्होंने कहा, "ऐसा नहीं है कि लोगों को यह नहीं जानना चाहिए पर यह भी समझना होगा कि यह आखिर क्यों परोसा गया और इसको सामने लाने के पीछे क्या मंशा है." वजह कुछ भी हो, आम पाठक की जिज्ञासा के लिए पत्रिका में पर्याप्त 'मसाला' है और आलम यह है कि बुक स्टॉलों पर पत्रिका का अंक अब ढ़ूँढने पर भी नहीं मिल रहा है. |
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