विवादों में घिरी फ़िल्म, कितना नफ़ा..

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- Author, निधि सिन्हा
- पदनाम, मुंबई से, बीबीसी डॉटकॉम के लिए
‘पीके,’ ‘बाजीराव मस्तानी’, ‘रंगरसिया’ और अब ‘उड़ता पंजाब’ जैसी हाल की कुछ फ़िल्में हैं रिलीज़ से पहले ही विवादों में फंस गईं.
लेकिन क्या इसका असर ऐसी फ़िल्मों के कारोबार पर भी पड़ता है?
इस मामले पर बीबीसी ने कुछ फ़िल्म निर्देशकों और आलोचकों से बात की, उनका नज़रिया बंटा हुआ है.
‘उड़ता पंजाब’ को लेकर सेंसर बोर्ड को अदालत तक ले जानेवाले निर्माता-निर्देशक अनुराग कश्यप विवादों को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही मानते हैं.

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वो कहते हैं, ‘रिलीज़ से पहले विवाद में आने से फ़िल्म सफ़ल और असफलता दोनों हो सकती है.’
हालांकि, वो फ़िल्म ‘उड़ता पंजाब’ को सफ़ल मानती है.
लेकिन मशहूर फ़िल्मकार श्याम बेनेगल हिट या फ़्लॉप के लिए कंटेंट को अहम मानते हैं.
वो कहते हैं, 'रिलीज़ से पहले सुर्खियों में आ गईं फ़िल्में कोई ज़रूरी नहीं कि सफ़ल रहें, क्योंकि फ़िल्म के कंटेंट पर काफ़ी कुछ निर्भर करता है. वैसे कई बार विवाद से फ़िल्मों को फ़ायदा भी हो जाता और वे अच्छा क़ारोबार कर लेती हैं.’’
‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी’ और ‘चमेली’ सरीखी फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक और पटकथा लेखक सुधीर मिश्रा विवादों को फ़िल्मों के कारोबार के लिए अच्छा मानते हैं.

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वो कहते हैं, ‘फ़िल्म की कमाई का सही आंकड़ा देना तो मुश्क़िल है. लेकिन कुछ फ़िल्में विवादों में आने के बाद बेहतर परिणाम देकर गईं हैं.’
पीवीआर पिक्चर्स के कमल गियानचंदानी का कहना है कि विवादित फ़िल्मों के चलने की उम्मीद तभी होती है, जब उसमें सितारे और कंटेंट उम्दा हों.
वो उदाहरण देकर बताते हैं, ‘आमिर ख़ान और काजोल अभिनीत फ़िल्म ‘फ़ना’ कई बड़े मल्टीप्लेक्स और गुजरात में रिलीज़ ना होने के बाद भी अच्छी कमाई कर गई थी.’’
अभी हाल ही में ‘रेप्ड वुमन’ कमेंट की वजह से कड़ी आलोचना झेल रहे सलमान खान विवादों को फ़िल्मों के कारोबार के लिए नुक़सानदेह मानते हैं.

उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि इससे मेरी फ़िल्मों को कोई फ़ायदा होता है बल्कि उन्हें तो इसका नुक़सान होता है.’
वहीं अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी कहते हैं, ‘फ़िल्म कंटेंट से चलती है, न कि कन्ट्रोवर्सी से.’
विवादों से फ़िल्मों को नफ़ा-नुक़सान के सवाल पर फ़िल्म समीक्षक भी दो धड़ों में बंटे नज़र आए.
जहां फ़िल्म समीक्षक कुणाल शाह का कहना है, ‘रिलीज़ से पहले विवाद में फंसने की वजह से फ़िल्म का प्रमोशन तो अच्छा हो जाता है, लेकिन उसके क़ारोबार का फै़सला फ़िल्म का कंटेंट ही करता है.’

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वहीं फ़िल्म समीक्षक शांतिस्वरुप त्रिपाठी कहते हैं, ‘विवादों से फ़िल्मों को फ़ायदा होता है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण ‘बाजीराव मस्तानी’ है.’’
ग़ौरतलब है कि साल 2015 में आई फ़िल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ पर इतिहास से छेड़छाड़ का आरोप लगा और कई जगह पर विरोध प्रदर्शन भी हुए, लेकिन इसके बाद भी फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर सफ़ल रही.
125 करोड़ रुपये की लागत से बनी फ़िल्म ने 357 करोड़ की कमाई की.

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विवादों में फंसने के बाद भी बॉक्स ऑफ़िस पर परचम लहराने वाली फ़िल्मों में ‘जोधा अक़बर’, ‘माय नेम इज़ ख़ान’, ‘बिल्लू बार्बर’, ‘पीके’ रहीं.
वहीं ‘आरक्षण’, ‘चक्रव्यूह’, ‘बोले सो निहाल’ वग़ैरह दर्शकों को टिकट खिड़की तक नहीं ला पाईं.
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