तो भारत कोहिनूर पर दावा कर ही नहीं पाएगा

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कोहिनूर हीरे पर भारत के दावे पर भारत सरकार के ही एक बयान से सवाल खड़े हो गए हैं.
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है, “यह ना तो चुराया गया था और ना ही ज़बरदस्ती ले जाया गया था.”
सॉलिस्टर जनरल रंजीत कुमार ने सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में संस्कृति मंत्रालय का पक्ष बताते हुए कहा कि 105 कैरेट के इस कोहिनूर हीरे को महाराजा दिलीप सिंह ने ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपा था.
संस्कृति मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक 1849 में अंग्रेजों और सिखों के बीच हुए युद्ध के बाद महाराजा दिलीप सिंह ने हर्ज़ाने के तौर पर ये हीरा ब्रिटिश सरकार को सौंपा था.
इस युद्ध के बाद ही अंग्रेजों का पंजाब पर पूरा कब्ज़ा हुआ था. हालांकि कहा जाता है कि 1850 में, पंजाब के तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर ने महाराज दिलीप सिंह को ये हीरा ब्रिटेन की महारानी को देने के लिए बाध्य किया था.
संस्कृति मंत्रालय के पक्ष को जानने के बाद मामले की सुनवाई कर रहे मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टी.एस. ठाकुर ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या वह ये मामला ख़त्म करना चाहती है क्योंकि इस राय के मुताबिक फ़ैसला आने पर भारत भविष्य में कभी कोहिनूर पर अपना दावा नहीं कर पाएगा.
महाराजा रणजीत सिंह के परिवार से ताल्लुक रखने वाले दमनदीप सिंह ने बीबीसी हिंदी संवाददाता निखिल रंजन से बात करते हुए सरकार के इस बयान पर हैरानी जताते हुए कहा, "सरकार का ये कहना कि हीरा ज़बरदस्ती नहीं लिया गया है ना ही चुराया गया है, बिलकुल ग़लत है. ये हीरा महाराजा दिलीप सिंह से ज़बरदस्ती ले लिया गया और वो भी तब जब वो नाबालिग थे."

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पिछले कई सालों से कोहिनूर को भारत लाने की मांग उठती रही है. ब्रिटिश सरकार ने 2013 में भारत सरकार की ऐसी ही मांग को ख़ारिज़ कर दिया था.
वैसे इस मामले पर विदेश मंत्रालय को भी अपना पक्ष रखना है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से छह सप्ताह के अंदर इस मामले पर विस्तृत ढंग से पक्ष रखना को कहा है.
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट एक गैर सरकारी संगठन ऑल इंडिया ह्यूमन राइट्स एंड सोशल जस्टिस फ्रंट की याचिका पर सुनवाई कर रहा है. ये संगठन कोहिनूर की भारत वापसी की मांग कर रहा है.
वैसे कोहिनूर पर भारत के अलावा पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की सरकारें भी अपना दावा करती रही हैं. लेकिन ब्रिटेन इस सब दावों को ख़ारिज़ करता रहा है.
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