हर सुबह निकल पड़ते हैं मुंबई के ये फ़रिश्ते

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- Author, श्वेता पांडेय
- पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
आज के ज़माने मे कोई किसी की छोटी सी भी मदद कर दे तो लोग उसे फ़रिश्ता मान लेते हैं, ऐसे में किसी को ज़िंदगी देने वाला क्या कहलाएगा?
मुंबई में मौजूद दो ऐसे लोगों की कहानी को आज भले ही मीडिया में ज़ोर शोर से उछाला जा रहा हो लेकिन ये लोग कई बरसों से लोगों की मदद कर रहे हैं.
फ़्री टिफ़िन

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मुंबई के बोरिवली इलाक़े के 57 वर्षीय मार्क डिसूज़ा बुजुर्गों के अन्नदाता हैं क्योंकि वो मुफ़्त टिफ़िन सर्विस चलाते हैं, सिर्फ़ बुज़ुर्गों के लिए.
बचपन में ही माता पिता को खो देने वाले मार्क ने दादा दादी के साथ जीवन बिताया और बुढ़ापे से जुड़ी समस्याओं को करीब से देखा समझा है .
उन्होनें हमेशा से ही बुज़ुर्गो के लिए कुछ करने की मन में ठानी थी.
साल 2012 से आसपास रहने वाले बुज़ुर्गों के लिए टिफ़िन सर्विस उपलब्ध करवाने का काम कर रहे मार्क कहते हैं, "मैंने अपनी पत्नी से 5 हज़ार रुपए लेकर छह लोगों के टिफ़िन का काम शुरू किया था जो आज बढ़कर 25 हो गया है."

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इस काम में मार्क का साथ देने वाली उनकी पत्नी योना कहती हैं,"हम इस बात का ध्यान रखते हैं कि कम खर्च में अच्छा भोजन मिले, कम मिर्च-मसाला और तेल में बना खाना हम बुज़ुर्गों को देते हैं."
मार्क और योना ये सारा ख़ाना ख़ुद बनाते थे लेकिन अब कुछ लोग उनके साथ जुड़ गए हैं और अब कुछ बुजुर्गों को खाने के साथ साथ रहने के लिए भी जगह मुहैया करवा पा रहे हैं.
कैंसर से जंग
कैंसर के ईलाज के लिए मुंबई का टाटा मेमोरियल अस्पताल देशभर में मशहूर है. इसी अस्पताल के बाहर 30 सालों से हरखचंद सावला मरीज़ों के लिए मुफ़्त भोजन, दवाइयां और कपड़े बांट रहे हैं.
हर रोज़ लगभग सात सौ लोगों की सेवा कर रहे सावला कहते हैं, "मेरा एक रेस्त्रां है जिसे मेरे परिवार वाले देखते हैं और मैं यहां आने वाले लोगों की सेवा करता हूँ."

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ऐसा नहीं कि इस अस्पताल के सामने भोजन बांटने का काम और लोग नहीं करते लेकिन लेकिन हर रोज़ ऐसा करने वाले हरखचंद अकेले हैं.
कैंसर पीड़ितों को तो अस्पताल से भोजन मिलता है लेकिन आर्थिक तौर पर कमज़ोर रोगियों के साथ आए लोगों के लिए वो भोजन-कपड़ा देते हैं और कौन ज़रूरतमंद है इसकी सारी जानकारी अस्पताल से मिल जाती है.
ये दोनों ही लोग बिना किसी संस्था के बैनर या नाम के लोक सेवा कर रहे हैं और अब मुंबई के कुछ लोकल अख़बार उन्हें मुंबई का हीरो भी घोषित कर रहे हैं.
लेकिन मार्क और हरखचंद एक बात ज़रूर कहते हैं, "हमने लोकप्रियता के लिए यह काम शुरू नहीं किया था और लोकप्रिय होने के बाद कुछ बदलेगा नहीं."
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