'भक्तों' के भरोसे टिकी है एमएसजी 2 ?

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- Author, सुशांत एस मोहन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई
किसी बॉलीवुड फ़िल्म का सीक्वल यानि दूसरा भाग आने में लगभग 2 से 3 साल का वक़्त लग जाता है. लेकिन हाल ही में हीरो बने डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह इंसान अपनी विवादित फ़िल्म 'मैंसेंजर ऑफ़ गॉड' का सीक्वल लेकर सात महीने के अंतराल पर फिर हाज़िर हैं.
मुंबई के एक जाने-माने सिनेमाघर में बाबा की फ़िल्म देखने के लिए लंबी कतार लगी थी. लेकिन ये लोग आम दर्शक नहीं थे बल्कि बाबा के ही 'भक्त' थे.
बसों में आए इन समर्थकों ने पूरा हॉल ही हाईजैक कर लिया. लेकिन भक्तों की यह भीड़ फ़िल्म को हिट करवा पाएगी ऐसा कहना मुश्किल है, क्योंकि फ़िल्म हिट होने के लिए भक्तों की नहीं दर्शकों की ज़रुरत होती है.
प्रचार और केवल प्रचार

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'एमएसजी 2' इस फ़िल्म की पिछली कड़ी की तरह बाबा राम रहीम सिंह इंसान और डेरा सच्चा सौदा का प्रचार करती है.
फ़िल्म देखने आईं मीनाक्षी कहती हैं, "यह फ़िल्म व्यवसाय के लिए नहीं बल्कि हमारे कैंप के अच्छे कार्यों को आगे लाने के लिए बनाई गई है."

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इस फ़िल्म में पिछली फ़िल्म की तुलना में दोगुना कंप्यूटर ग्राफ़िक्स और एक्शन का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन दोनों ही बेहद ख़राब लगते हैं.
कंप्यूटर ग्राफ़िक्स से किसी सीन को असल जैसा दिखाया जाता है लेकिन इस फ़िल्म में कंप्यूटर से बने सांप, भैंसे और यहां तक कि पेड़-पौधे तक नकली दिखाई देते हैं.
सबसे कमज़ोर कड़ी
फ़िल्म में सबसे ज्यादा दिखाई और सुनाई देते हैं फ़िल्म के निर्माता, निर्देशक, लेखक, संगीतकार, गीतकार, गायक, मुख्य अभिनेता बाबा राम रहीम और वही इस फ़िल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी हैं.
एक्शन करते बाबा ज़रा सेहतमंद नज़र आते हैं, कभी इतने कि आप उन्हें 'क्यूट' कह दें. गाना गाते हुए बाबा सात सुरों से बाहर ही गाते हैं. बचा अभिनय तो वो फ़िल्म में बाकी लोगों ने करने की कोशिश की है.
कहानी है कहां?

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फ़िल्म की कहानी सिर्फ़ इतनी है कि पंजाब के किसी हिस्से में मौजूद आदिवासियों से तंग आकर सरकार उन्हें ख़त्म करने का आदेश दे देती है.
राम रहीम सरकार को ऐसा करने से रोकते हैं और उन आदिवासियों के उद्धार का ज़िम्मा अपने सिर ले लेते हैं.
फिर जबर्दस्त एक्शन, कुछ बेसुरे गानों और चमकीली पोशाकों और गाड़ियों के बीच 'पिताजी' (बाबा के समर्थक उन्हें पिताजी कह कर पुकारते हैं) आदिवासियों का उद्धार कर देते हैं, वो भी अकेले.
चमकीले जूते, रंग-बिरंगी पोशाकें, अजीब गाड़ियों में घूमना, प्रेम-अहिंसा का संदेश देते देते गुंडो की लाशें बिछा देते हैं, बाबा, अकेले.

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पिछली फ़िल्म की ही तरह इस फ़िल्म के साथ भी एक विवाद जुड़ गया कि फ़िल्म के प्रोमो में बाबा ने <link type="page"><caption> आदिवासियों को</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/150917_msg2_hits_controversy_on_depiction_tribals_md" platform="highweb"/></link> शैतान कहा.
फ़िल्म से बड़ी सफ़ाई से यह संवाद हटा लिया गया है लेकिन फ़िल्म में से और भी बहुत कुछ हटाया जा सकता था.
एक भी टिकट नहीं बिका

मुंबई में इस फ़िल्म शो के एक घंटे पहले तक एक भी टिकट नहीं बिका था. पहला टिकट हमने ख़रीदा था.
लेकिन कुछ ही देर में तीन बसों से कई लोग उतरे और एमएसजी 2 की टिकट ख़रीदने लगे.
पूछने पर किसी ने नहीं माना कि वो बाबा के भक्त हैं बल्कि कहने लगे कि वो मुंबई से हैं और बाबा की फ़िल्म का प्रोमो देख कर यहां आए हैं.

65 साल के लाखा सिंह ने ठेठ पंजाबी में कहा, "मैं मुंबई से हूं और मैं बाबा को नहीं जानता, बस मैं तो फ़िल्म का पोस्टर देख कर आ गया."
वहीं 32 वर्षीया रोज़ी कहती हैं,"हम तो बाबा को नहीं जानते, लेकिन उनका आकर्षण ही हमें खींच लाया."
बताया जा रहा है कि बाबा के 'भक्तों' की भीड़ को सख्त आदेश था कि वो यह स्वीकार न करें कि वे बाबा को जानते हैं.

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ये प्रमोशन का पैंतरा ही था ताकि लोगों और मीडिया को लगे कि फ़िल्म को देखने 'पब्लिक' आ रही है, लेकिन 'पब्लिक' और 'भक़्तों' में फ़र्क दिख ही जाता है.
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