भीड़ के तमाशे के लिए है 'फैंटम'

- Author, मयंक शेखर
- पदनाम, फ़िल्म समीक्षक
फ़िल्मः फैंटम
निर्देशकः कबीर ख़ान
अभिनेताः सैफ़ अली ख़ान, कटरीना कैफ़
रेटिंगः **
फिल्म के इंटरवल के दौरान थिएटर से बाहर निकलते हुए, जो एहसास होता है, वो ये कि अभी तक आप जो देख रहे थे वो दरअसल एक काम के बाद हुई अनुभूति है.
हम उस अनुभूति के बीच में कहीं हैं. जब रैंबो किस्म का हीरो पाकिस्तान को बेधने का फ़ैसला करता है.
आपको शुरू से ही पता था कि फिल्म का पूरा मक़सद दरअसल यही रहा होगा. आधे रास्ते आकर, लगता है कि फिल्म अभी शुरू ही हुई है.
तब तक रैंबो अपनी बहादुरी दिखलाता है, सीरिया में आईएस चरमपंथियों के बीच गोलीबारी करता है, जेल में जाकर डेविड हैडली को मार गिराता है, कारों का पीछा करता है, कुल मिला कर शिकागो, लंदन, बेरूत, अम्मान के बीच घूमता हुआ आखिरकार लाहौर की तरफ निकलता है.
आप चाहें तो इसे प्रतिशोध आधारित ड्रामा कह सकते हैं.
वीडियो गेम

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दानियल ख़ान (सैफ़, जिनका बोटोक्स से फूला हुआ माथा भौंहों के बीच ख़ासा सिकुड़ जाता है) भारतीय सेना का पूर्व सैनिक है, जिसे सेना ने बाहर कर दिया है.
उसे भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) मुंबई में 26/11 हमले के मास्टरमाइंड लोगों को एक-एक करके लुढ़काने के लिए नियुक्त करती है, कैसे?
लश्कर-ए-तोएबा में घुसपैठ करके. लेकिन क्या करके वह लश्कर-ए-तोएबा में घुसपैठ करता है? ये मैं कैसे बता सकता हूं, मैंने तो महज़ ये फिल्म देखी है.
अगर ये एक वीडियो गेम होता तो आप इसे पूरी तरह समझ सकते थे.
इसे वीडियो गेम ही होना चाहिए था. इस सारी गोलाबारी के ज़ोर को एक एनिमेशन नायक की स्टार पावर ही मैच कर सकती थी.
इस सबके पीछे की राजनीति को तब आसानी से नज़रअंदाज़ किया जा सकता था.
बड़ी बात ये भी है कि बड़े पर्दे पर इस स्क्रिप्ट को उतारने में बहुत ज़्यादा शारीरिक मेहनत लगी है.
और चूंकि ये एक फिल्म है, तो ज़रा एक पल के लिए इस पर तवज्जो दें कि दानियल मुंबई हमलों के मुख्य षड्यंत्रकारी डेविड हैडली को कैसे धरता है.
दानियल हैडली के गुप्त जेल में एक ऐसे हत्यारे के तौर पर दाखिल होता है, जिसकी अदालती कार्रवाई अभी जारी है.
वो इस जेल के भीतर हैडली की गतिविधियों पर नज़र रखता है, जिस ओवरहैड पाइप से हैडली के शावर में पानी जाता है, उस पाइप को खोलता है और उसमें ज़हर मिला देता है.
हैडली अपना मुंह खोल कर उस शावर में नहाता है. हैडली मर जाता है. हाहा!
बी ग्रेड स्क्रिप्ट

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इसके लिए आपको पूरी तरह से निर्देशक कबीर ख़ान(जिनकी पिछली फिल्म भारत-पाक के बीच ‘शांति की पिकनिक’ सरीखा फिल्म बजरंगी भाईजान थी) को श्रेय देना होगा कि ज़ाहिरा तौर पर एक बी ग्रेड फ़िल्म की स्क्रिप्ट से उन्होंने एक ठीकठाक ए-ग्रेड फिल्म निकाल ही दी है.
इससे पहले डेविड हैडली की मौत का मज़ाक बनाने के लिए तहेदिल से माफ़ी.
लेकिन इस बात पर हम दो बार हंसेंगे कि हमने सुना है इस फिल्म के निर्माता सार्वजनिक तौर पर इस बात से परेशान थे कि पाकिस्तान ने इस फिल्म को बैन कर दिया है.
अरे, उन्हें मौका मिलेगा तो वो तो टॉम एंड जैरी को भी बैन कर देंगे.(ज़ाहिर है, उस टॉम एंड जैरी फिल्म में टॉम भारत होगा!)
लेकिन भारत में बनने वाली फ़िल्मों में ये फ़िल्म सबसे ज़्यादा खुले तौर पर पाकिस्तान विरोधी है.
इसका मतलब ये कहना नहीं है कि हमारे दोस्ताना पड़ोसी के लिए समझदारी की एक ख़ुराक ज़रूरी नहीं.
आज पाकिस्तान एक ऐसा विकासशील देश लगता है जो घटिया साज़िश के सिद्धांतों पर ख़ुद को मिटाने पर तुला है.
लेकिन ये ख़ासकर ऐसी फिल्म है जिसमें भारत को कुछ ज्यादा ही ज़ोर आज़माइश करते दिखाया गया है.
2013 में पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने भी इसी तरह एक फिल्म को प्रायोजित किया था जिसका नाम था- वार, जिसमें रॉ की तबियत से खिंचाई की गई थी.
मैंने ये फिल्म नहीं देखी है.
अगर इसी तरह से फैंटम को भी रॉ ने प्रायोजित किया होता, तो मुझे इस पर ज़रा सी हैरानी नहीं होती.
पहले भी बनी ऐसी फिल्में

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कहानी के स्तर पर इसमें कोई अनूठी बात नहीं है.
हम सैफ़ को बतौर जासूस पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया में घूमते पहले ही देख चुके हैं (एजेंट विनोद-2012).
इसमें कुछ देर के लिए सैफ़ ‘मिशन इंपॉसिबलःरोग नेशन’(2015) के टॉम क्रूज़ की तरह बदमाश बन जाते हैं. लेकिन बहुत थोड़ी देर के लिए.
कट टू कैटरीना, या फिर रहने ही दें, क्यों कि वो तो युद्ध क्षेत्र में हैं, वहां भी ‘वोग’ के लिए पोज़ देते हुए दिखाई देती हैं.
कबीर ख़ान की ‘एक था टाइगर’ में भी कैट ने एक जासूस का रोल निभाया था, इस फिल्म में भी वो जासूस ही हैं (हालांकि ये बताना मुश्किल है कि वो आख़िर कर क्या रही हैं)
26/11 घटना पर राम गोपाल वर्मा ने भी(रद्दी) फिल्म बनाई थी, द अटैक्स ऑफ 26/11.
जिस फ़िल्म ह़ॉल में मैं फिल्म देख रहा था वहां के दर्शकों को इसमें अक्षय कुमार की हॉलीडे (2014) के भी शेड दिखाई दिए.
सेना का जवान अकेले एक मिशन पर वगैरह. लेकिन सैफ़ की तरह अक्षय (बेबी 2015 में) भी रॉ के लिए हाफ़िज़ सईद या उसके जैसे दिखने वाले शख्स तक पहुंचने के लिए ये ऑपरेशन सउदी अरब से संचालित करते हैं.
ओह, लेकिन फैंटम पाकिस्तान में है!
निखिल आडवाणी की डी-डे भी पाकिस्तान में घुस कर दाउद इब्राहीम को पकड़ने के बारे में थी.
तो क्या ये सभी फ़िल्में ‘आर्गो’(2012) से प्रभावित रहीं? कहना मुश्किल है.
लेकिन आप समझ सकते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में इस तरह की फ़िल्म बनाना एक विधा बन गई है.
फ़िल्म की स्क्रिप्ट एस हुसैन ज़ैदी के उपन्यास ‘मुंबई एवेंजर्स’ पर आधारित है.
ज़ैदी अपराध मामलों के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं. मुझे उनके साथ काम करने का सौभाग्य भी मिला है.
ज़ैदी ने ‘ब्लैक फ्राइडे’ भी लिखी थी जो बढ़िया इंवेस्टिगेटिव पत्रकारिता की एक मिसाल है. इस पर अनुराग कश्यप ने एक उम्दा फ़िल्म भी बनाई.
तालियों और शोर के लिए

इस फ़िल्म का पहला डॉयलॉग है- ‘आंख के बदले आंख का सिद्धांत पूरी दुनिया को अंधा बना देगा.’
फ़िल्म में कहा गया है कि ऐसा गांधी ने कहा था. ज़्यादातर लोग ये नहीं जानते कि गांधी ने ऐसा नहीं कहा था.
स्क्रीनप्ले लेखक जॉन ब्राइले ने फ़िल्म ‘गांधी’ (1982) के लिए ये संवाद लिखा था.
इस फ़िल्म के कुछ हिस्से बहुत रोमांचक हैं, ख़ासकर पाकिस्तान वाले हिस्से.
लेकिन जब भी उन मास्टरमाइंड लोगों के मरने पर मेरे आसपास बैठे लोग तालियां बजाते और शोर मचाते तो मुझे हल्की सी बेचैनी होती.
मानों इन लोगों को मारने से उन 166 लोगों की मौत का प्रतिकार हो जाएगा जो 26/11/08 के हमलों में मारे गए थे.
मैं माफ़ी चाहता हूं लेकिन अंधेरे हॉल में खून के प्यासे आवेग के इस शोर से आप वाकई बेचैनी महसूस करने लगते हैं.
ये फ़िल्म लोगों में ऐसी ही प्रतिक्रिया जगाने के लिए बनाई गई है, ऐसी ही भीड़ के तमाशे के लिए.
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