क्या शोले सबसे 'महान' हिंदी फ़िल्म है?

इमेज स्रोत, AMITABH FB PAGE

    • Author, वंदना
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पुरानी दिल्ली में रहने वाले 32 साल के ज़बीउल्ला चौथी क्लास में थे जब उन्होंने पहली बार शोले देखी और अब तक करीब 20 बार देख चुके हैं.

आज भी अमिताभ बच्चन स्टाइल में कपड़े पहनते हैं और शोले के डायलॉग उन्हें रटे हुए हैं.

शोले की सफलता को लेकर इतने क़िस्से मशहूर हैं कि सच और झूठ के फर्क को पाटते हुए ये क़िस्से भी शोले की तरह पहेली जैसे बन गए हैं.

इमेज स्रोत, sholay

कहते हैं कि शोले के रिलीज़ के बाद ब्लैक में टिकट बेच-बेच कर ही कुछ लोगों ने इतनी कमाई की थी कि अपना घर, गाड़ी सब ख़रीद लिया.

मुंबई में मिनर्वा सिनेमाघर के पास वाला बस स्टॉप शोले स्टॉप बन गया तो जहाँ शोले शूट हुई वहाँ सिप्पीनगर.

कैसे आया ख़्याल

चार लाइन से शुरु हुए सलीम जावेद के आइडिया को निर्माता जीपी सिप्पी और निर्देशक रमेश सिप्पी ने एक ऐसा विराट रूप दिया जो उस समय तक दर्शकों, फ़िल्म वितरकों, समीक्षकों और अभिनेताओं की भी कल्पना से परे था.

जिसने भी द मैगनीफ़िशेंट सेवन जैसी वेस्टर्न श्रेणी की फ़िल्में देखी हैं वो कह सकता है कि कहीं न कहीं उनका प्रभाव शोले पर दिखता है.

फ़िल्म 'द गार्डन ऑफ इवल' में हीरो और उसका सहयोगी पत्तों के सहारे ये तय करते हैं कि हमलावरों से घिरे गाँव में कौन वहीं रुककर लड़ेगा और कौन आगे जाएगा. शोले में भी सिक्का वाला ऐसा ही सीन जय और वीरू के बीच दिखता है.

विदेशी फ़िल्मों से ऐसी कई समानताएँ होते हुए भी शोले लोगों के सामने बिल्कुल अलग और ऑरिजनल कहानी बनकर सामने आई.

आख़िर क्या वजह है कि शोले को वो कल्ट स्टेटस हासिल हुआ जो किसी और फ़िल्म को नसीब नहीं हुआ. और क्या शोले वाकई हिंदी सिनेमा की सबसे महान फ़िल्म है ?

'शोले से बेहतर है दीवार'

इमेज स्रोत, Deewar

वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे के मुताबिक शोले भले ही सफल फ़िल्म थी पर वे इसे दीवार जैसी फ़िल्म से बेहतर नहीं मानते.

वो ये ज़रूर मानते हैं कि शोले कई जादुई चीज़ों का ऐसा घातक मिश्रण थी कि ये बताना मुश्किल हो जाता है कि आख़िर इसे ऐसी सफलता क्यों मिली.

जयप्रकाश चौकसे कहते हैं, "मेरी एक एक दुविधा है. शोले अविश्वसनीय फ़िल्म है जो किसी लोकगीत की तरह लोगों के दिलों में बस गई है. लेकिन जो फ़िल्म एक तरह से राष्ट्रीय फ़िल्म बन चुकी है वो सिनेमाई शुद्धता की कसौटी पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती. मैं शोले को दीवार या जंज़ीर से बेहतर फ़िल्म नहीं मानता."

'टाइमलेस है शोले'

इमेज स्रोत, PAN India

वहीं शोले को महान मानने वालों की कमी नहीं है.

फ़िल्म समीक्षक नम्रता जोशी कहती हैं, "फ़िल्म मेकिंग की जितनी अच्छी बातें होती हैं वो शोले में साथ आ गई हैं. एक सीन है जहाँ गब्बर ठाकुर के लगभग पूरे परिवार को मार कर चला गया है. वहाँ बस एक झूला है जो हिल रहा है और घोड़े की टाप है जो सुनाई देती है. उस तरह का शॉट लेना या साउंड डिज़ाइन ...ये सब अपने समय से बहुत आगे था. किरदार भी कमाल के थे."

उनका कहना है कि बेहतरीन फ़िल्में तो कई आई हैं लेकिन आज देखने पर वो थोड़ी बासी और आउट ऑफ़ टाइम दिखती हैं, पर शोले की ख़ासियत है कि वो आज भी उतनी ही दिलचस्प, ताज़ा और टाइमलेस लगती है..

महान फ़िल्मों की बात करें तो शायद कई नाम आएंगे लेकिन मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा में शोले एक मिसाल है कि कैसे आप एक उम्दा फ़िल्म बना सकते हैं जो बॉक्स ऑफ़िस पर भी हिट हो.

फ़िल्म एक, प्रतिभाएं अनेक

इमेज स्रोत, Anjoo Mahendru

वहीं लेखिका और समीक्षक भावना सौमाया कहती हैं कि शोले एक ऐसे समय पर बनी थी जब इससे जुड़े सारे लोग अपनी क्रिएटिविटी के बेहतरीन दौर में थे इसमें सलीम-जावेद, रमेश सिप्पी, अमिताभ, संजीव कुमार, अमजद ख़ान सब शामिल हैं.

पर वो ये सवाल ज़रूर उठाती हैं कि अगर शोले इतनी ही महान थी तो क्यों इसे कोई ख़ास अवॉर्ड नहीं मिला जबकि उसी साल आई दीवार को सिनेमा से जुड़े कई पुरस्कार दिए गए जो शायद दर्शाता है कि दर्शकों के मन में इमोशनल ड्रामा ही लंबे समय तक ज़िंदा रहता है.

ख़ैर इस बहस से परे इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि शोले ने जो मुक़ाम हासिल किया वो कोई दूसरी फ़िल्म नहीं कर पाई.

शोले का जादू

इमेज स्रोत, sholay

शोले में एक साथ कई खा़सियतें थीं- सधी और कसी हुई कहानी जिसमें किसी तरह के झोल की कोई गुंजाइश नहीं थी, एक- एक किरदार ऐसा जो दिलो-दिमाग़ दोनों को छू जाए, किरदारों के बीच की बेमिसाल केमिस्ट्री, डायलॉग जो कानों में आज भी गूंजते हैं, ऐसा बैकग्राउंड म्यूज़िक जो दृश्य के भाव को और उजागर कर दे, लोकप्रिय संगीत, विदेशी स्टंट डाइरेक्टर के निर्देशन में एक्शन ऐसा जो पहले नहीं देखा गया, कॉमेडी और इमोशन का ऐसा सटीक तालमेल कि लोग फ़िल्म में जितना हँसे उतना ही रोए भी.

जय और वीरू की दोस्ती की ऐसी दास्तां जहाँ पूरी फ़िल्म में दोनों के पास एक दूसरे के बारे में अच्छा कहने को कुछ नहीं लेकिन आखिर में एक ने दूसरे के लिए जान दे दी. दूसरी ओर एक ईमानदार और नेकदिल पुलिस अफ़सर तो दूसरी ओर उसके ठीक उल्टा उतना ही क्रूर, अनैतिक और मटमैला विलेन.

सूरमा भोपाली, अंग्रेज़ों के ज़माने का जेलर, रामलाल, मौसी, कालिया और सांबा, हार्मिनका बजाता जय और जय और राधा की अधूरी प्रेम कहानी, इन सबने मिलाकर ऐसा जादू रचा कि आज तक शोले के तिलिस्म को तोड़ नहीं पाया है. शोले से 40 साल बाद भी फिल्म प्रेमी अपनी दोस्ती इससे निभा रहे हैं.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>