फ़िल्मी टी-20: 48 घंटे में पिक्चर!

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- Author, सुमिरन प्रीत कौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
दिल्ली में कुछ उभरते हुए फ़िल्मकारों ने बीते शनिवार और रविवार में वक़्त के साथ मुक़ाबला किया.
ये सब भाग ले रहे थे दिल्ली में हुए '48 ऑवर्स फ़िल्म प्रोजेक्ट' में जहां उन्हें 48 घंटो में फ़िल्म बनानी थी.
फ़िल्म की कहानी को सोचने से लेकर फ़िल्म की शूटिंग और एडिटिंग तक, सब कुछ 48 घंटो में करना था.
कान्स में फ़िल्म
ये प्रतियोगिता दुनिया भर में होती है. फ़िल्म अच्छी बनी, तो हो सकता है कि फ़िल्म का प्रदर्शन फ़्रांस में सालाना होने वाले 'कान्स फ़िल्म फ़ेस्टिवल' में हो.

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कुछ लोगों के लिए ये अपने वीकेंड को मज़ेदार बनाने का तरीक़ा है तो कुछ के लिए ये एक पड़ाव है इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री मे अपने पांव जमाने के लिए.
सब लोगों को एक थीम, प्रॉप और डायलॉग को लेकर फ़िल्म बनानी होती है. फ़िल्म चार से सात मिनट की होनी चाहिए.
सबसे पहले टीम के सदस्य कहानी सोचते हैं और फिर उसे बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है.
मनमुटाव

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टीम “वी स्प्रॉल” की ख़ुशबू डोगरा कहती हैं, “जहां कोई भी काम हो, वहां थोड़े बहुत मनमुटाव हो जाते हैं. ये बहुत स्वभाविक है. यहां सबसे ज़रूरी होता है कि आप अपने अहम और ग़ुरूर को पीछे छोड़कर आगे बढ़ें. सबसे अहम बात है की आप कितने संगठित हैं. आपकी कहानी कितनी अहम है. ऐसे में एक दूसरे पर विश्वास करना होता है.”
पूरी रात और दिन में आइडिया पर सोचने के बाद टीम निकलती है अपनी फ़िल्म को शूट करने के लिए.
कुछ नहीं खाया

अब कहानी को पर्दे पर उतारने की तैयारी शुरू हो जाती है. टीम "ब्रदर्स इन ब्लू" के प्रभजोत सिंह कहते हैं, “दिन है कि रात, कोई नहीं देखता. 24 घंटे से हमने कुछ नही खाया. एक्टिंग भी मैं कर रहा हूं और निर्देशन भी. क्या करूं लोग ही नहीं हैं.”
इस प्रतियोगिता के दिल्ली के आयोजक प्रीति गोपालकृष्णन और योगी चोपरा बताते हैं कि ये एक माध्यम हैं जहां सिर्फ़ आप फ़िल्म नहीं बनाते बल्कि अपने बारे मे बहुत कुछ सीखते हैं. वो लोग जो सालों से ऐसा कुछ करना चाहते हैं पर कर नहीं पाते उनके लिए ये दो दिनों में कुछ रचान्त्मक करने का माध्यम है.
जब 48 घंटे पूरे हुए तो कुछ वक़्त पर पहुंचे और उन्होंने अपनी फ़िल्म वक़्त पर दी तो कुछ समय सीमा के बाद पहुंचे.
कुछ जीतेंगे, कुछ हारेंगे पर जो भी हो, 48 घंटे में फ़िल्म बनाने की प्रक्रिया को ये लोग हमेशा याद रखेंगे.
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