हम अक्सर फ़िज़ूलखर्ची करते हैं: दिबाकर बनर्जी

इमेज स्रोत, Dibakar Bainerjee
- Author, सुप्रिया सोगले
- पदनाम, मुंबई से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बॉलीवुड में अपनी-अपनी फ़िल्मों की कमाई का आंकड़ा बढ़ा-चढ़ा के पेश करने के अलावा फ़िल्म के बजट को भी भारी भरकम बताने का चलन बढ़ता जा रहा है.
फलां फ़िल्म 50 करोड़ में बनी, फलां का बजट सौ करोड़ के आसपास पहुंच गया वगैरह-वगैरह. फ़िल्मकार दिबाकर बनर्जी इस फ़िज़ूलखर्ची से परेशान हैं.
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बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में दिबाकर ने कहा, "हमारे यहां फ़िल्म को छोड़कर इधर-उधर की चीज़ों में पैसा खर्च किया जाता है. स्टार पर, लोकेशन पर वगैरह-वगैरह."
'बजट बढ़ने से मुश्किल'
"फ़िल्म की कहानी में, उसकी बेहतरी में अगर पैसा लगाया जाए तो अलग बात है. लेकिन ऐसी जगह पैसा लगाया जाता है जिससे फ़िल्म की गुणवत्ता में रत्ती भर भी इज़ाफ़ा नहीं होता."
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दिबाकर के मुताबिक़ इस चलन से बेवजह फ़िल्मों का बजट बढ़ता है और पैसे कमाना मुश्किल हो जाता है.
दिबाकर ने कहा, "भले ही फ़िल्में कम बनें लेकिन अगर वो मुनाफ़ा कमाती हैं तो पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए ही बेहतर होगा."
'तितली'
दिबाकर बनर्जी की फ़िल्म 'तितली' 14 मई से शुरू हो रहे कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में जा रही है. फ़िल्म के निर्देशक कनु बहल हैं और इसे दिबाकर के साथ यशराज स्टूडियो ने को-प्रोड्यूस किया है.
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फ़िल्म के बारे में दिबाकर ने कहा, "आप इसके नाम पर मत जाइए. ये कोई मासूम फ़िल्म नहीं है. इसमें विद्रोह है, प्यार है, गुस्सा है, मौलिकता है, नयापन है. मुझे इसकी कहानी में इतना दम लगा कि मैंने इसे प्रोड्यूस करने का फ़ैसला किया."
दिबाकर के मुताबिक़ कान फ़िल्म समारोह में जाने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फ़िल्म के लिए ख़रीदार ढूंढने में आसानी होगी और यशराज बैनर का नाम जुड़ा होने से इसे भारत के अंदर आसानी से रिलीज़ किया जा सकेगा.
'मसाला भी ज़रूरी'
दिबाकर बॉलीवुड के मौजूदा दौर से ख़ुश हैं और उन्हें कोई ख़ास शिकायत नहीं है. वो कबूल करते हैं कि वो 'दबंग', 'सिंघम' और 'गोलमाल' सिरीज़ सरीखी मसाला फ़िल्में देखना पसंद नहीं करते लेकिन उन्हें ऐसी फ़िल्मों से परहेज़ नहीं.
वो कहते हैं, "सिर्फ़ मेरे जैसी फ़िल्में या फिर लंचबॉक्स, शिप ऑफ़ थीसियस और तितली जैसी फ़िल्में ही बनेंगी तो दर्शकों को बदहज़मी हो जाएगी. उसी तरह से सिर्फ़ मसाला फ़िल्में बनेंगी तो उनसे भी बदहज़मी होगी. इसलिए दोनों तरह की फ़िल्में ज़रूरी हैं."
दिबाकर हाल ही में घोषित राष्ट्रीय पुरस्कार से ख़ुश हैं और मानते हैं कि 'शिप ऑफ़ थीसियस' जैसी बेहतरीन फ़िल्म को ये पुरस्कार मिलना सही है लेकिन साथ ही वो ये भी कहते हैं कि लंचबॉक्स जैसी फ़िल्म को कोई पुरस्कार ना मिलना अफ़सोस की बात है.
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