फ़िल्म रिव्यू: गुंडे

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    • Author, कोमल नाहटा
    • पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक

स्टार रेटिंग : *2

बिज़नेस रेटिंग : *3

यशराज फ़िल्मस् की 'गुंडे' बिक्रम और बाला नाम के दो दोस्तों के इर्द गिर्द घूमती है.

दोनों लड़के रिफ़्यूजी हैं जिनका इस दुनिया में कोई नहीं है सिवाय लतीफ़ नाम के एक किरदार के जो उन्हें जुर्म की दुनिया में धकेलता है.

कहानी में ट्विस्ट लाता है दोनों का एक ही लड़की यानी प्रियंका चोपड़ा से प्यार, जब दोनों की दोस्ती में पड़ती है दरार.

निर्देशन

अली अब्बास ज़फ़र का निर्देशन ठीक-ठाक है हालांकि रणवीर और अर्जुन के साथ कुछ दृश्यों में उनका काम बेहतर हो सकता था. प्रियंका के साथ रणवीर और अर्जुन के अलग-अलग दृश्यों में ज़फ़र की पकड़ बेहतर दिखी है.

सुहेल सेन का संगीत फ़िल्म का मज़बूत पक्ष है. ‘तूने मारी एंट्रियां’ पहले से ही काफ़ी हिट हो चुका है, ‘जश्न-ए-इश्क़ा,’ ‘जिया’ और ‘सैंया’ भी बेहतर बन पड़े हैं.

इरशाद कामिल के लिरिक्स लोक-लुभावने हैं. बॉस्को-सीज़र की कोरियोग्राफ़ी अच्छी है और शाम कौशल के ऐक्शन सीन भी लोगों को अपील करेंगे.

क़मज़ोर पटकथा

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निर्देशक अली अब्बास ज़फ़र ने कहानी को 70 के दशक में पेश करने की कोशिश की है लेकिन नएपन की कमी है.

फ़िल्म का स्क्रीनप्ले में ऐसे बहुत से दृश्य हैं जो आपकी 70 या 80 के दशक की फ़िल्मों में देखे हुए से लगते हैं.

दो दोस्तों के बीच की मज़बूत संवेदनाओं को उभारने में अली अब्बास कमतर साबित होते हैं. अगर स्क्रीनप्ले में कसावट होती तो फ़िल्म के कई दृश्य दर्शकों को रूला सकते थे.

दुर्भाग्य से ऐसा नहीं होता क्योंकि पटकथा कहीं भी आपको छूती नहीं है और सारी कहानी एक बहुत ही बासीपन के साथ सामने आती है.

हालांकि कुछ सीन ज़रूर हैं जो अच्छे बन पड़े हैं लेकिन ये उम्मीद से कहीं कम हैं. सबकुछ इतना जाना पहचाना है कि असर नहीं करता.

कहानी में ज़्यादा उतार-चढ़ाव नहीं हैं और फ़िल्म दर्शकों को अपने साथ लेकर नहीं चल पाती. हालांकि यहां ये ज़रूर जोड़ना चाहूंगा कि लोग ऐसी कहानियां देखना पसंद करते हैं जहां दो दोस्तों के बीच तकरार की वजह एक लड़की हो.

इस फ़िल्म में भी नएपन की कमी के बावजूद लोग इस कहानी में दिलचस्पी ले सकते हैं हालांकि दोस्ती में दरार ही इस कहानी का सबसे क़मज़ोर पहलू है.

निर्देशक अली अब्बास ने संजय मासूम के साथ मिलकर संवाद लिखे हैं लेकिन भाषा कुछ ज़्यादा ही अलंकारिक है जो शायद आधुनिक दर्शकों के गले नही उतरेगी.

यही नहीं कुछ किरदार इतना धीमे अपना संवाद बोलते हैं कि बोरियत और बढ़ जाती है.

अभिनय

फ़िल्म 70 और 80 के दशक की याद दिलाती है लेकिन फ़िल्म में नयापन बिल्कुल नहीं है.

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इमेज कैप्शन, फ़िल्म 70 और 80 के दशक की याद दिलाती है लेकिन फ़िल्म में नयापन बिल्कुल नहीं है.

रणवीर सिंह ने बिक्रम का किरदार बेहद ईमानदारी से निभाया है. ऐक्शन दृश्य काफ़ी अच्छे किए हैं. अर्जुन कपूर भी ऐक्शन सीन में अच्छे लगते हैं लेकिन उनका काम साधारण है. उन्हें अपनी आवाज़ और भावों पर काम करने की ज़रूरत है.

प्रियंका चोपड़ा आकर्षक लगती हैं और रोल भी अच्छे से निभाया है.

सत्यजीत सरकार के रूप में अभिनेता इरफ़ान की उपस्थिति फ़िल्म में कोई असर पैदा नहीं करती. उनके पास ना तो उनके टैलेंट के हिसाब का रोल है और ना ही यादगार संवाद. फ़िल्म में उनके साथ न्याय नहीं हुआ है.

पंकज त्रिपाठी छाप छोड़ते हैं और मनु ऋषि चड्ढा का काम ठीक है. बाक़ी किरदार भी ज़रूरत के हिसाब से ठीक लगते हैं.

कुल मिलाकर गुंडे एक साधारण कहानी है जिसके दो मज़बूत आधार हैं- अच्छा संगीत और बेहतर शुरूआत.

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