वहीदा रहमान को अपनी कौन सी 5 फिल्में सबसे ज़्यादा पसंद हैं

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- Author, प्रदीप सरदाना
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए
अपने समय की बेहद खूबसूरत और दिलकश अभिनेत्री वहीदा रहमान आज 84 बरस की हो गईं.
उनके इस जन्म दिन पर उन्हें फोन पर बधाई देते हुए मैंने पूछा कि आप अपना यह जन्म दिन कैसे मना रही हैं?
वह हँसते हुए बोलीं, "कुछ नहीं अब. अब वो दिन चले गए सेलिब्रेट करने के."
क्या कोविड के कारण?
"नहीं उससे भी पहले से. अब क्या सेलिब्रेट करना. बच्चे हैं घर में, वो जैसे भी कर लेते हैं. वही अच्छा लगता है."
हालांकि यहाँ बता दें कि वहीदा रहमान, आशा पारिख और हेलन तीनों बहुत अच्छी दोस्त हैं. ये एक दूसरे के सुख-दुख में तो सबसे पहले शामिल होती ही हैं. यूं भी कोरोना काल से पहले महीने में एक दो बार कभी किसी के घर तो कभी किसी के घर लंच पर मिलकर अपनी ज़िंदगी को खुशगवार बनाए रखती रही हैं.
जबकि ये तीनों मिलकर अब भी देश विदेश की यात्राएं भी करती रही हैं. इसलिए उम्मीद है कि इस बार भी वहीदा रहमान के जन्म दिन पर उनकी दोनों पक्की दोस्त आशा पारिख और हेलन तो उन्हें बधाई देने जाएंगी ही.
वहीदा रहमान ने सन 1955 में सिर्फ 17 बरस की उम्र में अपना फिल्म करियर शुरू किया था. वह अब भी कभी कभार कोई फिल्म करती रहती हैं. फिल्म न करें तो टीवी शो में शामिल होकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा देती हैं. अपनी पुरानी फिल्मों को भी वह टीवी पर देख लेती हैं.

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क्या इन दिनों कोई फिल्म कर रही हैं?
यह पूछने पर वह बताती हैं, "नहीं अभी कोई फिल्म नहीं कर रही, एक साल से कोई फिल्म नहीं की."
इधर हम वहीदा रहमान के पिछले 67 वर्ष के करियर को देखें तो उन्होंने इस दौरान करीब 100 फिल्मों में काम किया है. जिनमें उनकी पहली हिन्दी फिल्म 'सीआईडी' से उनकी पिछली फिल्म 'विश्वरूपम' तक एक से एक शानदार, यादगार फिल्में हैं.
जैसे-प्यासा, चौदहवीं का चाँद, कागज़ के फूल, साहिब बीबी और गुलाम, बीस साल बाद, कोहरा, दिल दिया दर्द लिया, पत्थर के सनम, राम और श्याम, आदमी, प्रेम पुजारी,धरती और फाल्गुन. या फिर अदालत, कभी कभी, त्रिशूल, सवाल, नमक हलाल, चाँदनी, रंग दे बसंती और दिल्ली-6.
उनके कुछ प्रसंशक तो ऐसे हैं जो उनकी सभी फिल्मों को पसंद करते हैं. जबकि कुछ अपनी अपनी पसंद से. समीक्षकों की नज़रों में भी उनकी फिल्मों की पसंद कहीं एक सी भी है तो कहीं अलग-अलग.

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लेकिन उनके इस जन्म दिन पर जब मैंने उनसे पूछा कि आपको अपनी नज़र में अपने अपनी 5 फिल्में सबसे ज्यादा अच्छी लगती हैं? तो उनका जवाब था, "गाइड, मुझे जीने दो, खामोशी, तीसरी कसम और रेश्मा और शेरा."
ये फिल्में कब बनीं, क्या है इन फिल्मों में ऐसा खास कि इन्हें देश-दुनिया दर्शकों ने भी पसंद किया और खुद वहीदा रहमान को भी ये अपनी पाँच शिखर की फिल्में लगती हैं. आइये जानते हैं-
गाइड
सन 1965 में प्रदर्शित फिल्म 'गाइड' सुप्रसिद्ध लेखक आरके नारायण के 1958 में प्रकाशित उपन्यास 'द गाइड' पर आधारित थी. नवकेतन के बैनर तले निर्माता देव आनंद और निर्देशक विजय आनंद की हिन्दी के साथ अँग्रेजी में बनी इस फिल्म की गिनती भारतीय सिनेमा की एक कालजयी फिल्म के रूप में होती है.
इस फ़िल्म की धूम सात समंदर पार तक पहुंची थी. यहाँ तक सन 2012 में टाइम मैगज़ीन ने 'गाइड' को अपनी 'बेस्ट बॉलीवुड क्लासिक' की सूची में शिखर से क्रमांक 4 पर रखा था.
फिल्म ने अपनी कहानी, निर्देशन, अभिनय, फोटोग्राफी, शूटिंग लोकेशन से ही नहीं, अपने गीत-संगीत से भी सभी का दिल जीत लिया था.
सचिन देव बर्मन के संगीत में लता मंगेशकर का गाया गीत-''आज फिर जीने की तमन्ना है' तो आज भी जीवन में एक नया रंग भरने के साथ कानों में रस घोलता है जिसमें वहीदा का अल्हड़पन और मस्ती भरा अभिनय दिलों में घर कर लेता है.
वहीदा रहमान को 'गाइड' में शानदार अभिनय के लिए जहाँ शिकागो अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में सर्वश्रेषठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला. वहाँ 1967 के फिल्मफेयर में पहली बार 'गाइड' को चारों बड़े सम्मान मिले. सर्वश्रेष्ठ फिल्म और निर्देशन के साथ देव आनंद को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और वहीदा रहमान को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का.

'मुझे जीने दो'
सन 1963 में प्रदर्शित ऐसी ब्लैक एंड वाइट फिल्म थी जिसमें डाकू समस्या को भावनात्मक स्पर्श के साथ दिखाया गया था. डाकू से भी कोई कैसे दिल-ओ-जान से प्रेम कर सकता है. वह भी इस फिल्म खूबसूरती थी.
डाकू और समाज को लेकर 'जिस देश में गंगा बहती है' और 'गंगा जमुना' के बाद दो-तीन बरसों में ही आई 'मुझे जीने दो' भी एक सुपर हिट फिल्म साबित हुई थी.
सुनील दत्त इस फिल्म के निर्माता होने के साथ फिल्म के नायक भी थे. डाकू जरनैल सिंह की भूमिका में वह इतने पसंद किये गए कि उन्हें इसके लिए 1964 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला.
वहीदा रहमान ने अपनी चमेली जान की भूमिका को कुछ ऐसे साकार किया कि इससे उनके अभिनय को नया शिखर मिल गया.
फिल्म का आकर्षण साहिर लुधियानवी के गीत और जयदेव जैसे दिग्गज का संगीत भी था. जिनमें शास्त्रीय धुनों पर सज़ा आशा भोसले का गाया गीत -'नदी नारे ना जाओ श्याम पईयां पडूँ' तो शिखर गीत रहा. साथ ही 'रात भी है कुछ भीगी भीगी' काफ़ी लोकप्रिय रही.
ख़ामोशी
वहीदा रहमान की तीसरी पसंदीदा फिल्म 'खामोशी' उनके करियर में मील का पत्थर साबित होने के साथ फिल्म के नायक राजेश खन्ना के लिए भी अच्छी साबित हुई.
'खामोशी' आशुतोष मुखर्जी की लघु कथा 'नर्स मित्र' पर बनी थी जिस पर निर्देशक असित सेन सुचित्रा सेन के साथ 1959 में बांग्ला फिल्म 'दीप ज्वले जाई' पहले ही बना चुके थे.
सेन ने 1969 में इसका हिंदी रीमेक 'खामोशी' बनाना चाहा तब नायिका तो वहीदा बन गईं लेकिन नायक कौन हो?
तब वहीदा ने खुद राजेश खन्ना का नाम सुझाया. वहीदा ने यह फैसला नवोदित अभिनेता राजेश खन्ना की 'आखिरी ख़त' देखने के बाद लिया था.
यह फिल्म मानसिक रोगी अस्पताल की एक नर्स राधा की मार्मिक कहानी है. फिल्म के निर्माण के साथ इसके संगीतकार भी हेमंत कुमार हैं. गुलज़ार ने पटकथा और गीत लिखे हैं.जिनमें -'हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू', 'तुम पुकार लो' और 'वो शाम कुछ अजीब थी' तो काफी लोकप्रिय हुए.
वहीदा रहमान इस फिल्म के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित तो हुईं. लेकिन उन्हें पुरस्कार मिला नहीं. इस फिल्म को ब्लैक एंड वाइट सिनेमाटोग्राफी के लिए फिल्म फेयर अवश्य मिला.

तीसरी कसम
'तीसरी कसम' एक ऐसी फिल्म है जो अपने प्रथम प्रदर्शन के समय 1966 में दर्शकों ने बुरी तरह नकार दी थी लेकिन आज यह ऐसी कालजयी फिल्म है जिसकी चर्चा के बिना भारतीय सिनेमा का इतिहास पूरा नहीं होता.
फणीश्वर नाथ रेणु की कृति 'मारे गए गुलफाम' पर आधारित इस फिल्म का निर्माण बेहतरीन गीतकार शैलेंद्र ने किया था जबकि निर्देशन बासु भट्टाचार्य का था.
फिल्म का आकर्षण राज कपूर और वहीदा रहमान भी थे. लेकिन इस फिल्म को बनाने में शैलेंद्र बुरी तरह कर्ज में डूब गए. फिल्म असफल होने से तो वह पूरी तरह टूटकर मौत के आलिंगन में चले गए. लेकिन बाद में फिल्म के साथ सब अच्छा होता चला गया.
'तीसरी कसम' को जहाँ 1967 में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का 'राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार' मिला. वहां उसी बरस 'मॉस्को फिल्म समारोह' में इसने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी जीता.
फिल्म में कुल 10 गीत हैं. जिनमें 'सजन रे झूठ मत बोलो', 'दुनिया बनाने वाले','पान खाए सईयाँ हमारो' और 'चलत मुसाफिर' तो आज भी नहीं भूलते.
वहीदा रहमान ही नहीं राज कपूर को भी इस क्लासिक के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा.

रेशमा और शेरा
निर्माता-निर्देशक सुनील दत्त की 'रेशमा और शेरा' ऐसी फिल्म थी जिसके लिए वहीदा रहमान को अपनी रेशमा की भूमिका के लिए, सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. इसलिए भला वह यह फिल्म वह कैसे भूल सकती हैं.
इतना ही नहीं, 19वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में वहीदा के साथ जयदेव को निर्देशन और रामचंद्र को सिनेमाटोग्राफी के लिए भी राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया.
राजस्थान की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म ऐसी प्रेम गाथा है जिनके परिवारों के परस्पर झगड़े तूफ़ान मचा देते हैं.
सन 1971 में प्रदशित इस फिल्म में जहाँ केएन सिंह और जयंत का शानदार किरदार था. वहां अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, राखी, अमरीश पुरी और रणजीत जैसे वे कलाकार भी इस फिल्म में हैं जो आगे चलकर फिल्म क्षितिज के बड़े सितारे बने.
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