यूपी की नई फ़िल्म सिटी: क्या बॉलीवुड को टक्कर दे पाएगा नोएडा

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- Author, प्रदीप सरदाना
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक
अभी पिछले महीने ही उत्तर प्रदेश का अयोध्या, अपने यहां भव्य राम मंदिर निर्माण को लेकर विश्व भर में सुर्खियां बटोर रहा था. जबकि अब यकायक फिर से उत्तर प्रदेश अपने एक और भव्य निर्माण कार्य के लिए इतना चर्चित हो गया है कि उसकी गूंज देशभर में ही नहीं, दुनिया के कई हिस्सों तक पहुंच गई है.
हालांकि जब गत 19 सितंबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में नोएडा क्षेत्र में एक भव्य और विशाल फिल्म सिटी बनाने की घोषणा की तो लगा था कि अभी यह एक घोषणा ही है, जो न जाने कब शुरू और कब पूरी होगी.
लेकिन फिल्म सिटी की इस योजना को पंख तब लगे जब 22 सितंबर को ही मुख्यमंत्री योगी ने इसकी मीटिंग के लिए कुछ फिल्म वालों को लखनऊ में लंच पर बुला लिया. इससे यह संदेश गया कि योगी फिल्म सिटी की योजना को लंबा न खींचकर जल्द से जल्द पूरा करने का मन बना चुके हैं.
योगी ने फिल्म वालों के साथ अपनी इस मीटिंग में मुंबई के हिन्दी सिनेमा के लोगों को ही नहीं साउथ फिल्म इंडस्ट्री के कुछ लोगों को भी बुलाया. जो यह बताता है कि इस फिल्म सिटी को लेकर चाहे चर्चा यह है कि अब हिन्दी फिल्में, अपने हिन्दी प्रदेश की अपनी माटी पर बन सकेंगी.
लेकिन सरकार अपने इस प्रोजेक्ट को सिर्फ हिन्दी सिनेमा तक ही सीमित नहीं रखना चाहती वह दक्षिण के सिनेमा को भी इससे जोड़ना चाहती है.

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फिल्म सिटी की पूरी योजना
सबसे बड़ी बात यह है कि इस घोषणा के दो दिन के भीतर और फिल्म वालों से मीटिंग से पहले ही यह तक तय कर लिया गया कि योगी की यह ड्रीम फिल्म सिटी कहां बनेगी, इसका मास्टर प्लान क्या है और वहां शूटिंग फ्लोर और स्टूडियो के साथ और क्या-क्या होगा.
हालांकि फिल्म सिटी को लेकर कुछ बातें अभी भी साफ नहीं हैं. फिल्म सिटी की घोषणा के बाद ही उत्तर प्रदेश के या पूरे उत्तर भारत के अनेक लोगों ने ही नहीं मुंबई और दक्षिण के फिल्म उद्योग के भी बहुत से लोगों ने दिल खोलकर स्वागत किया है.
इसका एक कारण तो यही है कि जब तमिल की फिल्में चेन्नई में बनती हैं तो तेलुगू की हैदराबाद में. कन्नड़ की भी ज़्यादातर फिल्में बेंगलुरु में बनती हैं. ऐसे ही मलयालम की ज़्यादातर फिल्में तिरुवनंतपुरम में, बांग्ला की फिल्में कोलकाता में.
पंजाबी फिल्में पंजाब में, हरियाणवी फिल्में हरियाणा में और मराठी फिल्में महाराष्ट्र में बनती हैं, तो फिर हिन्दी की फिल्में उत्तर भारत के हिन्दी राज्यों या उत्तर प्रदेश में न बनकर मुंबई में क्यों बनती हैं?
दूसरा उत्तर प्रदेश के नोएडा में फिल्म सिटी बनने से रोज़गार के लाखों अवसर मिलने के साथ नई प्रतिभाओं को मौके भी मिल सकेंगे. हालांकि ये सब बातें देखने सुनने में जितनी अच्छी लगती हैं, हक़ीक़त में इतनी आसान नहीं.
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यूं किसी काम को करने का संकल्प लेकर उसे शिद्दत से करने के लिए ठान लिया जाये तो मुश्किल तो कुछ नहीं, फिर भी आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या योगी का यह सपना पूरा हो सकेगा और पूरा होगा तो उसमें कितने बरस लगेंगे?
साथ ही यह भी कि हॉलीवुड की तर्ज पर बॉम्बे फिल्म उद्योग को जैसे बॉलीवुड कहा जाता है. ऐसे ही आने वाले कल में नोएडा की फिल्म सिटी को 'नॉलीवुड' कहा जा सकता है. फिर हमारे यहां बॉलीवुड के साथ क्षेत्रीय सिनेमा में कॉलीवुड और टॉलीवुड भी बन चुके हैं.
जिस तरह इस उत्तर प्रदेश की फिल्म सिटी की घोषणा के साथ ही सिनेमा और राजनीति से जुड़े लोग यह कहने लगे हैं कि इससे मुंबई की जगह हिन्दी फिल्में अब नोएडा में ही बनने लगेंगी. बहुत से आम लोगों के मन में भी कुछ ऐसी ही धारणा बनती दिख रही है.
इसलिए तब यह भी सवाल उठता है कि क्या 'नॉलीवुड' की यह फिल्म सिटी बॉलीवुड को टक्कर दे सकेगी? क्या इसके बाद बॉलीवुड ख़त्म होकर इतिहास में सिमट जाएगा?

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पहले भी है नोएडा में एक फिल्म सिटी
असल में पिछले कुछ बरसों में उत्तरप्रदेश में फिल्म सिटी बनाने की बात अक्सर चलती रही है. जिसके लिए कभी आगरा, कभी लखनऊ, कभी कानपुर तो कभी उन्नाव के नाम प्रस्तावित होते रहे हैं.
लेकिन सरकारी योजनाओं पर आशंका के बादल इसलिए भी मंडराते हैं क्योंकि कुछ वैसी ही योजनाएं पहले दम तोड़ चुकी होती हैं. उत्तर प्रदेश में करीब 35 बरस पहले राज्य सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने भी नोएडा में एक फिल्म सिटी बनाने का एलान किया था.
वीर बहादुर की इस योजना के बाद भी कई फिल्मकारों सहित और भी बहुत से लोगों ने यही उम्मीद जताई थी कि अब हिन्दी फिल्में, हिन्दी प्रदेश में बन सकेंगी. मुंबई वाले अब दिल्ली आकर बस जाएंगे.
वीर बहादुर ने घोषणा के बाद 1987 में नोएडा के सेक्टर 16 में इस फिल्म सिटी के लिए 100 एकड़ जगह आवंटित करके फिल्मकारों को प्लॉट देने का प्रस्ताव रखा, तो कई बड़े नाम यहां अपने फिल्म स्टूडियो बनाने के लिए लालायित दिखे.
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इसके लिए यहां पहले कुल मिलाकर 16 लोगों को स्टूडियो के लिए ज़मीन आवंटित की गयी. जिनमें यश चोपड़ा, शम्मी कपूर-एफसी मेहरा के ईगल फिल्म्स, बोनी कपूर-अनिल कपूर के पिता सुरेन्द्र कपूर सहित पद्मिनी कोल्हापुरे, गुलशन कुमार, रोमेश शर्मा, विनोद पांडे, पूर्ण सरीन, वीके सोबती और संदीप मारवाह जैसे नाम तो थे ही.
साथ ही दक्षिण सिनेमा के दो बड़े नाम एलवी प्रसाद और पूर्ण चंद्र राव भी थे. यह सब देख एक बार तो लगा कि सच में ही मुंबई और साउथ की फिल्म इंडस्ट्री का एक अहम हिस्सा दिल्ली में आ जाएगा. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.
आज नोएडा सेक्टर 16 की वह फिल्म सिटी न्यूज़ चैनल्स और अन्य कई सरकारी गैरसरकारी संस्थाओं की सिटी बनकर रह गयी है. ज़्यादातर फिल्मकार अपने फिल्म स्टूडियो के प्लॉटस बेच चुके हैं. फिल्म को लेकर अभी तक यहां कोई मुख्य गतिविधि मारवाह स्टूडियो में ही चल रही है.
इसके अलावा गुलशन कुमार (टी सीरीज़) ओरिजिनल अलौटी हैं. हालांकि नोएडा में टी सीरीज़ स्टूडियो में फिल्मों की शूटिंग तो अब न के बराबर ही है. कुछ बरस पहले बोनी कपूर ने टी सीरीज़ में श्रीदेवी की फिल्म 'मॉम' का सेट लगाया था, लेकिन टी सीरीज़ ने भी अब यहां मारवाह स्टूडियो की तरह अपना एक फिल्म प्रशिक्षण संस्थान खोल लिया है.

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फिल्म से जुड़ी गतिविधियां
एक फिल्म प्रशिक्षण संस्थान 'आइसोम्स' यहां बीएजी फिल्म्स की अनुराधा प्रसाद का भी है. अनुराधा प्रसाद बताती हैं, "हम इस फिल्म सिटी के शुरू होने के काफी बाद सन 2003 में आए थे. हालांकि हमारे स्टूडियो तो हमारे न्यूज़ चैनल्स में ही व्यस्त रहते हैं. हमारे टीवी शो या फिल्मों की शूटिंग मुंबई में ही होती थी. लेकिन हमारा फिल्म प्रशिक्षण संस्थान यहीं से चलता है."
यानि कुल मिलाकर यहां अब बस तीन स्टूडियो में फिल्म या फिल्म से जुड़ी गतिविधियां चल रही हैं. जबकि शूटिंग आदि तो सिर्फ एक मारवाह स्टूडियो में ही होती हैं.
मारवाह स्टूडियो के प्रमुख संदीप मारवाह बताते हैं, "मैंने मार्च 1991 में अपने इस स्टूडियो को शुरू कर दिया था. तब से अब तक लगातार हमारे यहां फिल्मों की शूटिंग हो रही हैं, टीवी के शो भी बन रहे हैं, फिल्म प्रशिक्षण भी हो रहा है."
मारवाह कहते हैं, "यह ठीक है शुरू में यहां कुछ मुश्किल थी. लेकिन हमने हिम्मत और सूझबूझ से काम लिया तो हम सफल रहे. हमारे यहां अभी तक हज़ारों टीवी शो बन चुके हैं. वहां स्वदेश, बोल बच्चन, दिल्ली बैली, जवानी दीवानी, विक्की डोनर, स्टूडेंट ऑफ द इयर और रांझना सहित 100 से अधिक फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है."
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उधर, फिल्मकार बोनी कपूर से जब हमने पूछा कि सेक्टर नोएडा की आपकी पुरानी फिल्म सिटी तो सफल नहीं हो सकी. अब योगी की नयी फिल्म सिटी को लेकर आप क्या सोचते हैं?
इस पर कपूर कहते हैं, "तब सरकार का उस समय पूरा सहयोग नहीं मिला, इसलिए वह फिल्म सिटी सफल नहीं हुई. लेकिन अब सरकार जिस तरह शत प्रतिशत सहयोग दे रही है. साथ में यूपी में फिल्मों की शूटिंग करने के लिए सब्सिडी भी दे रही है. उससे पहले से ही यूपी में फिल्मों की शूटिंग काफी होने लगी हैं."
"मैंने ही हाल ही में 'मैदान' फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश में ही की थी. अब यदि यहां फिल्म सिटी बनती है तो उसे पक्की सफलता मिलेगी. क्योंकि फिल्मकारों को आउटडोर के साथ इंडोर स्टूडियो की भी सुविधा मिल जाएगी."

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कैसी होगी नई फिल्म सिटी
आदित्यनाथ योगी की यह नई फिल्म सिटी यमुना एक्स्प्रेस-वे के सेक्टर 21 में एक हज़ार एकड़ क्षेत्र में बनेगी. जिसमें 220 एकड़ क्षेत्र व्यावसायिक गतिविधियों के लिए और 35 एकड़ क्षेत्र फिल्म सिटी पार्क के लिए होगा. योजना कुछ ऐसी है कि फिल्म सिटी के साथ यहां विश्व स्तरीय इलेक्ट्रॉनिक सिटी और एक विश्व स्तरीय फ़ाइनेंशियल सिटी भी बनाई जाएगी.
यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण के सीईओ अरुणवीर कहते हैं, "हम इस डेडिकेटेड इंफोटेनमेंट फिल्म सिटी ज़ोन की योजना आने वाले 50 साल की जरूरतों को देखकर बना रहे हैं. एशिया के सबसे बड़े जेवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का निर्माण भी इस फिल्म सिटी के क़रीब हो रहा है. यह क्षेत्र रेल, और सड़क परिवहन से तो पहले ही जुड़ा हुआ है. साथ ही इसे हाई स्पीड ट्रेन के साथ मेट्रो और रेपिड रेल परिवहन व्यवस्था से भी जोड़ा जाएगा."
फिल्म सिटी के इस क्षेत्र का एक प्लस पॉइंट यह भी है कि ताज नगरी आगरा यहां से 100 किमी और कृष्ण नगरी वृन्दावन यहां से 60 किमी की दूरी पर है.
इसके लिए फिल्म सिटी के लिए जो मास्टर प्लान तैयार किया गया है उसमें पूरी फिल्म सिटी को 5 खंडों में विभाजित किया गया है. जिनमें शूटिंग की एक से एक शानदार लोकेशन होगी, जिसमें हवाई अड्डा, रेलवे स्टेशन, हैलिपेड, महल, गांव, बंगले, अस्पताल, अदालत, सरोवर के साथ विश्व के सात अजूबों के सेट भी यहां मौजूद रहेंगे.
साथ ही भव्य गार्डन, रेस्तरां सहित शूटिंग के लिए विभिन्न फ्लोर्स तो होंगे ही और फिल्म पोस्ट प्रॉडक्शन के लिए आधुनिक तकनीक के एडिटिंग रूम सहित बहुत कुछ होगा. इसके अतिरिक्त यहां पांच सितारा और थ्री स्टार होटल के साथ अन्य छोटे होटल और रहने के लिए कुछ फ्लैट्स और सर्वेंट क्वॉटर्स आदि भी बनाने की योजना है.
योगी इस फिल्म सिटी को एक आकर्षक पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित करना चाहते हैं. इसलिए यहां शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और आउटडोर और इंडोर राइड्स भी होंगी. एक फिल्म संग्रहालय रहेगा और फिल्म की विभिन्न विधाओं को सीखाने के लिए फिल्म प्रशिक्षण संस्थान भी बनाया जाएगा.

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कब होगा यह भव्य सपना पूरा
यह फिल्म सिटी किसी माया नगरी से कम नहीं है. लेकिन क्या इतना बड़ा सपना पूरा होने में बरसों नहीं लग जाएँगे? इतना बड़ा प्रोजेक्ट देखकर कोई भी आकर्षित होगा ही लेकिन इसके लिए जिस भारी भरकम बजट की ज़रूरत होगी वह कहां से आएगा?
असल में माया नगरी मुंबई को गौतम बुद्ध की नगरी की ओर आकर्षित करने के लिए योगी ने अपनी टीम के प्रमुख सदस्यों से देश विदेश के बड़े स्टूडियो और फिल्म सिटी के साथ दुबई के थीम पार्क आदि सहित कई स्थलों का अध्ययन भी कराया है. जिनमें वॉर्नर ब्रदर्स, यूनिवर्सल और पाइनवुड स्टूडियो के साथ हैदराबाद और मुंबई की फिल्म सिटी भी हैं.
इस फिल्म सिटी के प्रोजेक्ट का जिम्मा मुख्यमंत्री योगी ने अपने विश्वास पात्र प्रशासनिक अधिकारी अवनीश कुमार अवस्थी को सौंपा है. हमने अवनीश अवस्थी से पूछा कि आपने दो दिन में ही फिल्म सिटी की जगह निर्धारित करने के साथ उसक पूरा खाका इतनी जल्दी कैसे तैयार कर लिया?
इस पर अवस्थी बताते हैं, "यदि काम करने की इच्छा हो, सही लोग आपके साथ हों तो दुनिया में मदद करने वाले लोगों की कमी नहीं. मदद करने वाले लोग मिल ही जाते हैं."
इस प्रोजेक्ट के बारे में जो बात अभी तक साफ नहीं हुई है लेकिन वह सबसे अहम है, वह यह कि इसे उत्तर प्रदेश सरकार स्वयं संचालित करेगी या फिर निर्माताओं को अलग-अलग स्टूडियो बनाने के लिए प्लॉटस आवंटित किए जाएंगे?

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मेरे यह पूछने पर अवनीश बताते हैं, "यह अभी फ़ाइनल नहीं है. इसके लिए अभी बातचीत चल रही है. यह सब कॉन्सेप्ट फ़ाइनल और अप्रूव होने के बाद तय होगा."
ऐसे बड़े और शानदार प्रोजेक्ट्स को पूरा होने में बरसों लग जाते हैं. यह पूछने पर अवस्थी का जवाब था, "हो सकता है पांच साल से भी पहले यह फ़िल्म सिटी शुरू हो जाएगी. यह साल ख़त्म होने से पहले ही इसके मूलभूत ढांचे को लेकर तैयारी पूरी कर ली जाएगी. उसके बाद इसका काम शुरू हो जाएगा."
उधर, लखनऊ में मुख्यमंत्री के साथ मीटिंग में जो फिल्म वाले शामिल हुए उनमें परेश रावल, अनुपम खेर, मनोज जोशी जैसे अभिनेता थे. तो अनूप जलोटा, उदित नारायण और कैलाश खेर जैसे गायक, ओम राऊत, अशोक पंडित, विवेक अग्निहोत्री, सतीश कौशिक, विनोद बच्चन और शैलेंद्र सिंह जैसे निर्माता निर्देशक के साथ यूपी फिल्म विकास परिषद के अध्यक्ष राजू श्रीवास्तव ने भी सीएम के साथ मीटिंग में हिस्सा लिया.
इनके अलावा गीतकार मनोज मुंतशिर और कला निर्देशक नितिन देसाई भी शामिल हुए. साथ ही दक्षिण की फिल्म नगरी से चर्चित निर्मात्री और सुपर स्टार रजनीकांत की बेटी सौंदर्या और 'बाहुबली' व 'बजरंगी भाईजान' जैसी सुपर हिट फिल्मों के पटकथा लेखक विजयेन्द्र प्रसाद ने भी फिल्म सिटी को लेकर चर्चा की.

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इनमें से कुछ लोगों ने स्वयं लखनऊ पहुंचकर इस मीटिंग में हिस्सा लिया तो कुछ लोगों ने वर्चुअल माध्यम से अपनी बातें कहीं.
योगी ने फिल्मकारों को अपनी इस योजना में भरोसा दिलाते हुए कहा, "उत्तर प्रदेश इसी परंपरा को गति प्रदान करते हुए एक भव्य, दिव्य और सर्व सुविधायुक्त पूर्ण फिल्म सिटी बनाकर विश्व को एक उपहार देगा. समय की आवश्यकता है कि भारतीय सिनेमा को एक नया मंच मिले. गौतमबुद्ध नगर की यह फिल्म सिटी भारत की पहचान का एक प्रतीक बने."

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फिल्म सिटी ही नहीं इल्म सिटी बने
जानेमाने गायक कैलाश खेर कहते हैं, "बस एक बात कहना चाहता हूं कि यहां सिर्फ एक ढांचा या सिर्फ एक फिल्म सिटी बनकर न रह जाये. यह एक इल्म सिटी बननी चाहिए. जहां आत्म शोधन और आत्म अवलोकन का परिवेश हो."
उधर गायक उदित नारायण, जिन्होंने योगी की इस सभा का समापन अपने एक गीत से ऐसा किया कि उनका वह गीत वायरल हो गया. अपने 'ओ मितवा' गीत में उदित ने योगी को जोड़ दिया. मूलतः हर संत कहे, साधु कहे की जगह उदित ने गीत को योगी कहे करके शुरू किया, "योगी कहे, सच और साहस है जिसके मन में, अंत में जीत उसी की है, ओ मितवा, सुन मितवा, तुझको क्या डर है रे, ये धरती अपनी है, अपना अंबर है रे'."

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रामोजी राव सिटी मॉडल है आदर्श
इस समय देश में दो प्रमुख फिल्म सिटी हैं. एक मुंबई में और दूसरी हैदराबाद में. मुंबई की फिल्म सिटी की स्थापना सन 1977 में महाराष्ट्र सरकार ने की थी. जिसके लिए वी शांताराम, बीआर चोपड़ा और दिलीप कुमार से मार्गदर्शन लिया गया था. क़रीब 520 एकड़ के क्षेत्र में बनी इस फिल्म सिटी को सन 2001 में 'दादा साहब फाल्के चित्रनगरी' नाम दिया गया.
आज यहां की विभिन्न 40 लोकेशन पर मुंबई की लगभग 70 प्रतिशत फिल्मों की कुछ न कुछ शूटिंग ज़रूर होती है. जबकि सीरियल निर्माताओं के लिए तो यह फिल्म सिटी किसी वरदान से कम नहीं. इसका संचालन मूलतः महाराष्ट्र सरकार ही करती है.
इसके अलावा देश में आज सबसे बड़ी और सबसे आधुनिक फिल्म सिटी हैदराबाद की 'रामोजी राव फिल्म सिटी' है. जाने माने फ़िल्मकार पदमविभूषण रामोजी राव की इस फिल्म सिटी में 1996 में ही फिल्मों की शूटिंग शुरू हो गई थी.
यह फिल्म सिटी 2 हज़ार एकड़ में बनी है. देश के साथ यह विश्व की सबसे बड़ी फिल्म सिटी के रूप में गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है. इसकी भव्यता और उपयोगिता देखते ही बनती है.
फिल्म 'बाहुबली से लेकर कृष-3, चेन्नई एक्सप्रेस और भुज जैसी कई बड़ी फिल्मों की शूटिंग यहां हुई है. यहां स्क्रिप्ट लेकर आओ और फिल्म पूरी करके उसके प्रिंट के साथ बाहर आओ का, जो कॉन्सेप्ट बरसों पहले बनाया गया था, उसे यूपी की फिल्म सिटी में अपनाने की बात है.
ऐसे ही यहां हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन जैसे जो शानदार सेट फ़िल्मकारों का बड़ा आकर्षण बने, वे अब नोएडा में भी होने की बात कही जा रही है.

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विदेशों से आई निवेश की पेशकश
उत्तर प्रदेश की भव्य फिल्म सिटी के लिए बजट कहां से आएगा इसके लिए भी राज्य सरकार योजना बना रही है. बड़ी बात यह है कि फिल्म सिटी की घोषणा के बाद ही सिंगापुर की एक कंपनी 'विस्टास मीडिया' के संदीप सिंह ने यहां फिल्म अकादमी बनाने के लिए 10 मिलियन यूएस डॉलर यानी क़रीब 73 करोड़ रुपए निवेश करने का प्रस्ताव दे दिया है.
इससे यह साफ़ हो गया है कि इस आकर्षक फिल्म सिटी में देश विदेश के बहुत से लोग निवेश कर सकते हैं. ऐसी आशंकाएं भी हैं कि यदि यहां सेक्टर 16 की पुरानी छोटी फिल्म सिटी की तरह फिल्म वालों को प्लॉटस दिये तो इस फिल्म सिटी का भी वैसा ही हश्र हो सकता है.
निर्माता पहले सस्ते दामों में प्लॉटस तो ले लेंगे. लेकिन बाद में आगे चलकर वे वहां फिल्म स्टूडियो न बनाकर उसे किसी को बेच दें या फिर वहां कोई और व्यावसायिक गतिविधी शुरू कर दें, तब भव्य फिल्म सिटी बनने का सपना टूटने का डर बना रहेगा.

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मुंबई से टकराव नहीं
फिल्म सिटी की इस मीटिंग में एक बात सबसे खास यह रही कि सभी फिल्म वालों सहित फिल्म सिटी से जुड़े कई लोगों ने एक बात ज़ोर शोर से कही कि यहां मुंबई वर्सेज़ नोएडा नहीं होना चाहिए. मुंबई में जो काम हो रहा है वहां होता रहे. जिसने मुंबई में फिल्म बनानी है वह वहां बनाए जिसने नोएडा फिल्म सिटी में बनानी है वह यहां बनाए.
वैसे भी देखा जाये तो हाल फिलहाल नोएडा की इस नई फिल्म सिटी से मुंबई फिल्म उद्योग को कोई खतरा नहीं है. इस नई फिल्म सिटी से बॉलीवुड का भार कुछ कम हो सकता है. लेकिन वहां के बड़े सितारे या फ़िल्मकार मुंबई छोड़कर नोएडा आकार नहीं बसने वाले. कम से कम आने वाले 15 बरसों तक तो नोएडा फिल्म सिटी के शुरू होने के बाद भी मुंबई के बॉलीवुड की अहमियत बनी रहेगी.
मुंबई में भी हिन्दी फिल्में बनती रहेंगी पर यूपी की इस फिल्म सिटी के शुरू होने से बॉलीवुड का वर्चस्व ज़रूर टूटेगा. साथ ही यह भी कि यदि सब ऐसे ही और इसी योजना के अनुसार हुआ तो आने वाले कुछ बरसों में 'नॉलीवुड' पर्यटकों का भी एक बड़ा आकर्षण बन सकता है.
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