सुशांत सिंह राजपूत ने ख़ुदकुशी क्यों की? क्या कहते हैं उनके क़रीबी

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- Author, चिंकी सिन्हा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उस रात उन्होंने शनि ग्रह के छल्ले को देखा था. आसमान में करोड़ों किलोमीटर दूर उन्हें यह नज़ारा दिखा था. चांद भी दिखा था. उस टेलीस्कोप से जो चंबल के बीहड़ों में बसे छोटे से-क़स्बे धौलपुर में उन्होंने लगाया था.
उन रातों को याद करते हुए अभिनेता रणवीर शौरी बताते हैं कि किस तरह इन सबके बीच गुरू ग्रह भी दिख रहा था लेकिन वे सिर्फ़ उन नारंगी छल्लों को याद कर रहे थे. वे याद करते हैं कि किस तरह उन्होंने बीहड़ के बीच उस क़स्बे में बिताई कुछ रातों को आसमान में अनंत की ओर देखा था.
धौलपुर में लोग अपनी फ़िल्म 'सोनचिरैया' की शूटिंग के लिए डेरा जमाए हुए थे. उसी दौरान दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने कुछ विलक्षण आकाशीय घटनाओं को देखने के लिए एक मजमा जुटाया था. उस रात चांद कुछ दूसरे ग्रहों की सीध में आने वाला था, तो कुछ इस तरह के थे सुशांत. थोड़े अलग-से.
रणवीर बरसों पहले सुशांत के साथ बिताए अपने दिनों को कुछ इस तरह याद करते हैं. इसके साथ यह भी बताते हैं कि सुशांत ने किस तरह उन्हें गणित के सिद्धांतों के बारे में बताया था.
रणवीर कहते हैं कि मौत की बात सोचकर उन्हें कंपकंपी होने लगती है. ख़ैर, बॉलीवुड क्रूर जगह तो है ही. शायद सुशांत को यहां दरकिनार किया जा रहा हो लेकिन तब तक वो स्टार बन चुके थे.
बेताब एनर्जी वाले सुशांत

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शौरी कहते हैं कि बॉलीवुड की दुनिया जोखिम से भरी है. यहां कब कामयाबी आपसे रूठ जाए कोई कह नहीं सकता. यहां दुनिया का सारा गणित मिलाकर भी कामयाबी का कोई फ़ॉर्मूला बनाना मुश्किल है. आख़िरकार यह बाज़ार है. सनक भरा बाज़ार. साथ ही बेरहम और पूर्वाग्रह से भरा मीडिया भी मौजूद है.
शौरी बताते हैं, "सुशांत में एक बेचैनी थी. उनके अंदर एक बेताब एनर्जी थी. वह शर्मीला-सा चुपचाप रहने वाला लड़का. उनसे आसानी से बातचीत नहीं हो सकती थी क्योंकि वो अपनी ही दुनिया में खोए रहते थे. मैं तो कहूंगा कि स्टार दो तरह के होते हैं. एक जो बॉक्स ऑफ़िस को चलाते हैं. और दूसरे जिन्हें मीडिया और भाई-भतीजावाद से जुड़ी ताक़तें स्टार बनाती हैं. सुशांत असली स्टार थे. अगर आप उस क्लब के मेंबर नहीं हैं तो आपकी ज़िंदगी बेहद मुश्किल हो जाती है. आपको रिजेक्ट किया जाता है. आपको रोका जाता है और आपके सामने एक दीवार खड़ी की जाती है."
ज़ाहिर है, इन सबके बीच रहना आसान नहीं होता है. आपको इन सबके बीच अस्तित्व बनाए रखना होता है. बॉलीवुड की चमक के पीछे एक काला घना अंधेरा भी है, ठीक वैसे ही जैसे चाँद का अंधेरा हिस्सा है जो सुशांत के टेलीस्कोप से भी नहीं दिखता.
लोग कह रहे हैं कि सुशांत सिंह राजपूत डिप्रेशन की दवा ले रहे थे. रविवार की सुबह उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली. उनका टेलीस्कोप पीछे छुट गया.
अतीत को कई तरह से देखा जा सकता है. 34 साल के इस एक्टर के अतीत को, जो अपने पीछे कोई नोट छोड़कर नहीं गए लेकिन उन्होंने अपने पीछे कुछ शब्द छोड़ दिए थे. कुछ आकृतियां, कुछ विचार छोड़े थे और इनमें से ज़्यादातर उन चीज़ों के बारे में थे, जो उन्होंने अंतरिक्ष में देखे थे. स्पेस की उनकी यह यात्रा उनकी उन अधूरी-सी कविताओं में पिरोई हुई थी, जिन्हें वो अपने 'ख़यालात' कहा करते थे. वह साइंस में डूबे रहने वाले शख़्स थे. वे आधे कवि भी थे.
उनके बारे में समझना हो तो उनकी पढ़ी हुई चीज़ों से कुछ सुराग़ मिल सकता है. उन्होंने जो देखा उसे देखकर ही आप उनके बारे में कुछ समझ सकेंगे. सुशांत को पता था कि शनि ग्रह के छल्ले धूमकेतुओं के टुकड़े, छोटे तारों या इसके सशक्त गुरुत्वाकर्षण से चकनाचूर चांदों के टुकड़े हैं. ये बर्फ़, पत्थर और धूल हैं.
सुशांत ने फ़िलीप रोथ को पढ़ा था, वाल्डो इमर्सन को भी, वह ईई कमिंग्स को कोट किया करते थे. वह रात में अनंत की ओर देखा करते थे. वह कहा करते थे कि तारे किस तरह अंतरंग होकर एक दूसरे को गले लगा रहे हैं. उन्हें पीटर प्रिंसिपल नाम के कॉन्सेप्ट के बारे में पता था. उनके पास 200 किलो का भारी-भरकम टेलीस्कोप था. उन्होंने आसमान की मैपिंग की थी. उन्हें याद्दाश्त चले जाने के बारे में पता था. वह ब्लैक होल और चांद के गड्ढों को बारे में जानते थे.
उन्हें 'डार्क साइड ऑफ़ मून' के बारे में भी पता था और जब भी वह आसमां में उन तारों को देखते थे जो समय की यात्रा कर रहे होते थे. उन्हें नीत्शे के बारे में भी पता था. नीत्शे कहा करते थे अगर आप लंबे वक़्त तक शून्य को घूरते हैं तो वह भी आपको घूरने लगता है. शायद वो सितारों की भीड़ में ख़ुद को अकेला, अलग-थलग खड़े पाते थे.

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शायद सुशांत स्पूतनिक हैं. वो सेटेलाइट जिसे छोड़े जाने के तीन महीने के बाद हर 96 मिनट पर पृथ्वी का चक्कर लगाना था, जो टूट कर बिखर गया था. वह अंतरिक्ष में विलीन हो गया था. शायद स्पूतनिक वो प्रेमी था जो ब्लैक होल में खो गया. बग़ैर पृथ्वी का चक्कर लगाए वह सीधे अनंत में विलीन हो गया. इसके पीछे न कोई सिद्धांत काम कर रहा था और न कोई भौतिकी और न ही कोई रसायनशास्त्र.
सुशांत एक ऐसे शख़्स थे, जो हमारे सामने थोड़ा खुले भी थे और थोड़ा बंद भी. उनमें कई चीज़ों का मेल दिखता था. यह एक ऐसे आदमी की कहानी थी, जिसने हमने तवज्जो नहीं दिया.
ख़ुदकुशी के बाद कई लोगों ने उनके बारे में कई चीज़ें लिखीं. किसी ने ख़ुदकुशी के तरीक़े के बारे में लिखा, तो कुछ ने इसकी वजह बताई. उसकी मौत की साज़िश के बारे में बातें हुईं. पुलिस की पूछताछ और डॉक्टरों पर बयानों को लेकर चर्चा हुई.
उनकी ख़ुदकुशी को लेकर कई लॉबियाँ खड़ी हो गईं. भाई-भतीजावाद की भर्त्सना की गई. बिहार के मुज़फ्फ़रपुर में बॉलीवुड के एक्टर्स और डायरेक्टरों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हुई. एफ़आईआर में आरोप लगाया गया कि सुशांत को कुछ लोगों ने ख़ुदकुशी के कगार पर पहुंचा दिया था. कुछ ने कहा कि पहले उन्हें प्रेम में फंसाया गया और फिर धोखा दे दिया गया.
एक मीडिया संस्थान ने तो ये थ्योरी दे दी कि उनकी मौत का नाता उनके ट्विटर प्रोफ़ाइल में लगी वैन गॉग की पेंटिंग से है, एक महान डच चित्रकार जिसने ख़ुद को गोली मार ली थी. इन सबमें डिप्रेशन की कहानी ग़ायब थी. और शायद यही ख़ुदकुशी की इस दुखद कहानी का सबसे अहम पहलू था.
छोटे शहर का ऊंची ख़्वाबों वाला लड़का

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बॉलीवुड के लिए वह पूरी तरह से बाहरी थे. दर्शक उन्हें जानते थे, सेलेब्रेट करते थे. अपनी पहली फ़िल्म 'काई पो चे'में उन्होंने एक ऐसे युवा शख़्स का रोल किया जो क्रिकेट का दीवाना है और जो एक युवा मुस्लिम लड़के को कोचिंग देता है ताकि वह आगे खेल सके. यह एक ऐसी भूमिका थी, जिसे आप भुला नहीं सकते. उस क्षण को तो आप अपने ज़ेहन से कभी झटक ही नहीं पाएंगे जब वह खिड़की से रेंगते हुए बाहर निकलते हैं और बस की छत पर चढ़ जाते हैं.
उनमें छोटे शहर के उस लड़के की झलक मिलती है जो अपनी आकांक्षाओं और जुनून के बीच डुबकियां लगाता रहता है. यह मां-बाप की महत्वाकांक्षाओं और आज़ादी के आकर्षण के बीच कश्मकश की कहानी है.
आप लोगों को ज़िंदगी के उस हिस्से के बारे में बख़ूबी पता होगा. बिहार ऐसी ही जगह है, जहां छोटी उम्र के बच्चों के दिमाग़ में सपने रोप दिए जाते हैं. इंजीनियर, डॉक्टर, सिविल सर्वेंट बनने से लेकर शादी करने और सैटल होने तक सपने. यहां आपको हर दीवार पर आपको कोचिंग सेंटर के विज्ञापन चिपके मिलेंगे.
सुशांत सिंह राजपूत ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए एंट्रेस एग्ज़ाम दिया था और इसमें पूरे देश भर में सातवीं पोज़िशन पर आए थे. एक्टिंग के फ़ील्ड में उतरने से पहले वे मैकेनिकल इंजीनयरिंग की पढ़ाई कर रहे थे. एक्टिंग के लिए उन्होंने इंजीनियरिंग दी थी.
एकांतप्रिय सुशांत

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सुशांत सिंह का जन्म बिहार के पूर्णिया ज़िले के मलडीहा में 1986 में हुआ था. पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे. सभी बहनें, सिर्फ़ एक भाई. अपनी मां के बेहद क़रीब. वह शांत रहने वाला बच्चे थे. 2003 में मां की मौत का उस पर गहरा असर रहा. वह हमेशा एकांतप्रिय रहा.
सुशांत के परिवार की नज़दीकी रंजीता ओझा कहती हैं कि वह अपनी मां के बहुत क़रीब थे. मां की याद उन्हें बहुत सताती थी. हंसराज स्कूल में दाख़िले के लिए वे दिल्ली के मुखर्जी नगर आ गए थे, अपनी बहन के साथ रहने. बहन यहीं रहकर सिविल सर्विसेज़ की तैयारी करती थीं. सुशांत ने डेल्ही कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में दाख़िला ले लिया था. वह हमेशा मुस्कुराते रहते. रंजीता को उनकी यही मुस्कुराहट हमेशा याद आती है. या तो वे पार्क में अकले घूमते या फिर अपनी पढ़ने की मेज़ पर होते.
वह मेज़ भी कुछ अलग थी. उस पर मिनिएचर एंटिक कारों के मॉडल रखे थे. साथ में उनकी असेंबल की हुई छोटी मशीनें भी थीं. उस छोटी-सी उम्र में किशोर होते हुए सुशांत रेने देकार्ते और सार्त्र के बारे में बात किया करते थे. सुशांत की बहन ने दर्शनशास्त्र में ग्रेजुएशन किया था. रंजीता कहती हैं, वे काफ़ी समझदार थे.
भाई-भतीजावाद कोई नई बात नहीं है. जो लोग नामी हैं उनके घरों में बच्चों से भी नाम कमाने की उम्मीद की जाती है. दिवंगत ऋषि कपूर और नीतू सिंह के बेटे रणवीर कपूर, कपूर ख़ानदान की चौथी पीढ़ी के अभिनेता हैं. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि फ़िल्म इंडस्ट्री में उन्हें ज़्यादा मौक़े इसलिए मिले क्योंकि वह फ़िल्मी परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं.
ऐसे करियर परवान चढ़ा

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राजपूत श्यामक डावर के डांस ट्रूप में थे. उन्होंने बेरी जॉन के एक्टिंग स्कूल में एक्टिंग भी सीखी थी. बाद में वे नादिरा बब्बर के एक 'एकजुट थियेटर' से भी जुड़े. सुशांत जब कॉलेज में थे तो उन्होंने अपनी सबसे बड़ी बहन को फ़ोन कर कहा था कि वे डांस करना चाहते हैं.
सुशांत के एक पारिवारिक मित्र ने बताया कि उस दौरान उनकी बहन ने उसकी मदद की थी. बड़ी बहन ने पिता को नहीं बताया कि सुशांत डांस करने के लिए मुंबई गए हैं. पिता को उन्होंने यह बताया कि वह इंटर्नशिप पर वे मुंबई में हैं. जल्दी ही सुशांत को नोटिस किया जाने लगा और फिर 'किस देश में रहता है मेरे दिल' से उनका टीवी का करियर शुरू हुआ. फिर वे एकता कपूर के सीरियल 'पवित्र रिश्ता'में लीड रोल में दिखे.
2011 में उन्होंने बॉलीवुड पर नज़रें टिकाईं, जहाँ फ़िल्म इंडस्ट्री से ताल्लुक़ रखने वाले रणवीर सिंह, वरुण धवन, रणवीर कपूर जैसे स्टार मौजूद थे. परिवार का फ़िल्मी बैकग्राउंड हो तो करियर में दूसरा या तीसरा चांस भी मिल जाता है. कई बार ब्रेक मिल जाते हैं. लेकिन फ़िल्मी दुनिया के बिल्कुल बाहर वाले शख्स के लिए तो सिर्फ़ एक मौक़ा मिलता है.
मगर सुशांत की पहली ही फ़िल्म सफल रही. इसके बाद आई मनीष शर्मा की 'शुद्ध देसी रोमांस'(2013).
इसके बाद उन्होंने राजकुमार हिरानी की फ़िल्म 'पीके' (2014) में उन्होंने सरफ़राज की भूमिका निभाई. इसके बाद सुशांत को यशराज फ़िल्म ने साइन किया और उन्हें दिबाकर बैनर्जी की 'डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी' फ़िल्म मिली.
'सर्वाइवल ऑफ़ द फ़िटेस्ट'का सिद्धांत चलता है

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विकास चंद्रा की मुलाक़ात सुशांत सिंह राजपूत से ब्योमकेश बख्शी के सेट पर हुई थी. विकास कहते हैं कि "जिस भाई-भतीजावाद की बात की जा रही है, उसने सुशांत को नहीं मारा. उन्हें तो एक महामारी ने मारा और वह है अकेलापन. हमारे चारों ओर भारी अकेलापन है. आपको पता नहीं कि अकेलापन क्या कर सकता है. ख़ास कर ऐसे शख़्स के साथ, जो डिप्रेशन से जूझ रहा हो. और जो किसी ने किसी रूप में अकेला रहा हो. इंडस्ट्री में भाई-भतीजावाद के बावजूद वह स्टार बन गए थे. सुशांत को भी पता था कि उन्हें सब कुछ मिल गया है. लेकिन वह एक अलग शख़्स भी थे".
चंद्रा बॉलीवुड के बारे में कहते हैं, "यह एक ख़ास चौखटे में फ़िट दुनिया है. इसमें खोखलापन और भौंडापन है और साथ है इस चौखटे में ख़ुद को फिट करने का दबाव. यहां की व्यवस्था से थोड़ा-सा अलग होते ही अटकलबाज़ियाँ शुरू हो जाती हैं. आपके बारे में तरह-तरह की बातें बनाई जाने लगती हैं." चंद्रा कहते हैं कि भाई-भतीजावाद की यह कहानी दरअसल भारतीय समाज की कहानी है.
चंद्रा कहते हैं, "भारत भरोसा न करने वालों का देश है. हमारे अंदर किसी के प्रति भरोसा नहीं हैं. हम इसी तरह विकसित हुए हैं. आख़िर हमें सिफ़ारिशों की क्यों ज़रूरत पड़ती है. हम सब इस विडंबना को समझते हैं. दरअसल, हम दोहरा जीवन जीने में पारंगत लोग हैं. बॉलीवुड इसी दोहरेपन में जीता है. यहां लोग ख़ानदानी कारोबार करते हैं. लेकिन यह सच्चाई है कि यहां प्रतिस्पर्द्धा भी बेहद कड़ी है. परफॉरमेंस रिव्यू तो आख़िर जनता ही देती है".
यही वजह है कि नामी हीरो-हीरोइनों के बच्चों में से कुछ ही फ़िल्म में चलते हैं क्योंकि यहां भी 'सर्वाइवल ऑफ़ द फ़िटेस्ट'का सिद्धांत चलता है.
बॉलीवुड आपको ऊंचाई देने का वादा करता है. आप पूरे देश में मशहूर हो जाना चाहते हैं. बॉलीवुड आपको इससे निकलने ही नहीं देता. चंद्रा कहते हैं "लोग यहां तारीफ़ पाने के लिए आते हैं. शो बिज़नेस ऐसा ही होता है."
बाहर के लोगों को दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है

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सच तो यही है कि आदित्य चोपड़ा ने ही ब्योमकेश बख्शी के रोल के लिए सुशांत सिंह राजपूत का नाम सुझाया था. चंद्रा कहते हैं, "वह अपने काम के प्रति गंभीर थे. स्टार की तरह उनके नख़रे नहीं थे. वह आने वाले दौर के स्टार थे. इस बात को वह जानते थे."
चंद्रा आगे बताते हैं, "सुशांत को यह अहसास कराया गया कि वह आउटसाइडर हैं. वह नेटवर्किंग और पीआर जैसी चीज़ों से नफ़रत करते थे. मुझे पता था कि उन्हें ये चीज़ें अच्छी नहीं लगती थीं लेकिन अगर आप ये सब चीज़ें नहीं करते हैं आपको इससे जुड़े फ़ायदे भी नहीं मिलते, लेकिन यह भी सच्चाई है कि इन सब चीज़ें के बावजूद वहां पहुंचे, जहां उन्हें पहुंचना था. नई पीढ़ी के स्टार्स में उनका भी नाम था."
जब करनी सेना जैसे संगठनों ने कहा कि फ़िल्म पद्मावत राजपूत संस्कृति का अपमान करती है इसलिए उसे रिलीज़ नहीं होने देना चाहिए. इसके बाद सुशांत ने कहा कि वे अपने नाम में से राजपूत शब्द हटा रहे हैं जिसके नाम पर इस तरह के विवाद पैदा किए जा रहे हैं.
चंद्रा कहते हैं कि भाई-भतीजावाद एक ऐसा मुद्दा है, जिसमें अब कोई दम नहीं है. "सुशांत सिंह भाई-भतीजावाद के तर्क की काट हैं. उन्हें किसी करण जौहर की ज़रूरत नहीं थी. दरअसल शीर्ष पर अकेलापन होता है. यह किसी को भी पागल बना सकता है. हमें यह नहीं सिखाया जाता कि सफलता को कैसे हैंडल करना है. हमें पता ही नहीं कि सफलता का हम करें क्या?
दिबाकर बनर्जी ने एक इंटरव्यू में कहा कि बॉलीवुड के बाहर के लोगों को यहां जमने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है.
स्टार किड्स का स्ट्रगल

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'गली ब्वाय' के सिद्धांत चतुर्वेदी ने चंकी पांडे की बेटी अनन्या पांडे की इस बात पर दिलचस्प प्रतिक्रिया दी थी कि स्टार किड्स को भी स्ट्रगल करना पड़ता है. नए कलाकारों के साथ राजीव मसंद की राउंडटेबल में सिद्धांत ने कहा था कि "जहां से हमारे सपने सच होने शुरू होते हैं, वहां से आपका संघर्ष भी शुरू होता है."
जो लोग सुशांत को जानते हैं वो कहते हैं कि वह हमेशा से अलग क़िस्म के थे. तथाकथित आउटसाइडर बॉलीवुड में परिवारवाद के बारे में सब कुछ जानते हैं. उन्होंने इसके बीच काम किया है, इससे लड़े हैं और इससे तालमेल भी बिठाया है.
दस साल पहले बेंगलुरू से मुंबई एक्टर बनने आए गुलशन देवैया कहते हैं कि लोगों को अपनी बदक़िस्मती के लिए दूसरों को दोष देना अच्छा लगता है. कुछ मायनों में सुशांत सिंह राजपूत और देवैया की कहानी एक जैसी है. दोनों शर्मीले, शांत और अंतर्मुखी बच्चे रहे थे. देवैया कहते हैं कि स्कूल में 'क्यूट किड' कहकर उनका मज़ाक़ उड़ाया जाता था.
कुछ ऐसी कहानी नसीरुद्दीन शाह की भी थी, वे कुछ और होना पसंद करते थे. स्टेज उन्हें पसंद था जहां वह ख़ुद को खुलकर अभिव्यक्त कर सकें. वहां वो सब बोल सकते थे, जो उन्हें कहीं और बोलने नहीं दिया जाता. देवैया कहते हैं, "बॉलीवुड संगीत के प्रति मेरे पिता के प्रेम और उनके सैकड़ों टेप मुझे विरासत में मिले थे. बचपन की नासमझी में मैं हमेशा एक हिंदी फ़िल्म स्टार बनने का सपना देखता था."
लेकिन इसके बदले वह 1997 में बेंगलुरू के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ैशन टेक्नोलॉजी पहुंच गए, डिज़ाइनर बनने के लिए. 1998 में उन्होंने 'सत्या' देखी और सामान बांधकर 2008 में मुंबई आ गए, बॉलीवुड में क़िस्मत आज़माने.
देवैया की नज़र में बॉलीवुड एक ऐसी काल्पनिक दुनिया है, जो पूरी तरह भरमाती है. देवैया कहते हैं, "हमारे यहां होने का पूरा श्रेय रामगोपाल वर्मा और मनोज वाजपेयी को जाता है. मैं जानता हूं कि मैं अच्छा दिखता हूं लेकिन मैंने ख़ुद को कभी शानदार मूवी स्टार के तौर पर नहीं देखा."
'बॉलीवुड में अपमान बर्दाश्त करने की आदत हो जाती है'

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सुशांत की तरह ही देवैया ने थियेटर से शुरुआत की. उन्हें भी नोटिस किया गया और ऑडिशन के लिए बुलाए गए. उन्हें 'गर्ल इन येलो बूट्स' में रोल मिला, जिसमें कल्कि का बड़ा रोल था. उस दौरान उनसे जान-पहचान थी. गुलशन देवैया कहते हैं कि यहां आप इतनी बार नकारे जाते हैं कि इसे दिल पर लेना छोड़ देते हैं. आप इसके लिए किसी से व्यक्तिगत रंजिश नहीं रखते.
गुलशन बताते हैं कि इंडस्ट्री में कई ऐसे लोग हैं जो आज भी ऑडिशन ही दे रहे हैं. आर्मी से मेजर की नौकरी छोड़कर आए एक सज्जन तो एक साल में 200 से 300 ऑडिशन दे चुके थे.
वे कहते हैं, "बॉलीवुड में आपका ग़ुरूर जाता रहता है और आप अपमान बर्दाश्त करना सीख जाते हैं. मेरे अंदर यह क्षमता नहीं थी. मैं वहीं ऑडिशन देने जाता था, जहां मुझे लगता था कि जाना चाहिए. एक परफ़ॉरमेंस से आप किसी की क्षमता नहीं आंक सकते. आप सिर्फ़ एक धारणा बना सकते हैं. मेरिट पर यहां कोई ध्यान नहीं देता. न तो मैं ख़ुद को इनसाइडर मानता हूं और न आउटसाइडर."

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सुशांत और गुलशन की दो बार थोड़े वक़्त के लिए मुलाक़ातें हुई हैं. दोनों में दुआ-सलाम भी हुई थी. गुलशन कहते हैं, "निश्चित तौर पर इंडस्ट्री में परिवारवाद है. इसका अपना पावर स्ट्रक्चर है. यहां लोग गलत लोगों पर ग़ुस्सा निकालते हैं और कुछ ऐसे हैं जो सोचते हैं कि कामयाबी तो उनका हक़ है, और फिर स्टार किड्स की जादुई दुनिया तो है ही. यहां केवल क़ाबिलियत से काम नहीं होता."
गुलशन याद करके बताते हैं कि जब वह गोवा में 'दम मारो दम' की शूटिंग कर रहे थे तो लोग उनके पास आकर पूछते थे कि क्या वे राज बब्बर के बेटे हैं. जब वे राजस्थान में शूटिंग कर रहे थे तो आमिर ख़ान की बेटी डायरेक्टर को असिस्ट कर रही थीं. गुलशन ने देखा कि भीड़ उन्हें देखने के लिए आती थी. उत्सुकता उन लोगों को वहां खींच लाई थी. यह एक ख़ास क़िस्म का फ़ायदा तो देता ही है.
लेकिन आख़िर में किसी भी एक्टर का भाग्य तो बाज़ार ही तय करता है. मसलन, शाहरुख़ ख़ान को ले लीजिए. वो तो बिल्कुल आउटसाइडर हैं. लेकिन उन्होंने बॉलीवुड में बड़ा नाम कमाया जबकि कई हीरो-हीरोइनों के बच्चे लॉन्च किए गए. उन्हें दूसरा, तीसरा मौक़ा भी मिला लेकिन वे चल नहीं पाए. अब सिर्फ़ भाई-भतीजावाद को दोष देना ठीक नहीं होगा. अब हमें आरोप लगाने से बचना होगा. अब हमें तार्किक आकलन करना होगा.
देवैया ने 2013 में रिलीज हुई 'काई पो चे' के लिए भी ऑडिशन दिया था. इस फ़िल्म को ठीक-ठाक कामयाबी मिली थी.
वे कहते हैं, "सुशांत को यह फ़िल्म मिल गई और उन्हें पंसद करने वालों का फ़ैन बेस भी बन गया. मुझे यह फ़िल्म नहीं मिली. यहां हर कोई चाहता है कि उसे यशराज फ़िल्म का कॉन्ट्रेक्ट मिले लेकिन ऐसा नहीं होता."
परिवारवाद के बावजूद कामयाब थे सुशांत

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सोशल मीडिया पर बताए जा रहे तमाम वाक़यों और पेश किए जा रहे सबूतों से गुज़रने के बाद ऐसा लग सकता है कि सुशांत को किनारे किया गया. उनका मज़ाक़ उड़ाया गया और परेशानी झेलनी के लिए छोड़ दिया गया. यह सच है या नहीं पता नहीं. लेकिन उनके हाथ में जो प्रोजेक्ट थे और बॉक्स ऑफ़िस पर उनकी फ़िल्मों को जो सफलता मिली थी, उससे लगता है कि उनका करियर उठाने के लिए उन्हें किसी करन जौहर की ज़रूरत नहीं थी.
इंडस्ट्री में परिवारवाद के वर्चस्व के बावजूद उन्होंने कामयाबी हासिल कर दिखाया था. शाहरुख़ और इरफ़ान के अलावा ऐसी मिसालें कम ही हैं कि कोई एक्टर टीवी धारावाहिकों से शुरू करे और सुपरस्टार बन जाए लेकिन सुशांत यहां तक पहुंचे. और जैसा कि देवैया कहते हैं "उन्होंने बॉलीवुड में अपनी पारी अच्छे तरीक़े से खेली."
बॉलीवुड में जल्दी ही लोग परिवारवाद के बीच काम करना सीख जाते हैं. अगर यहां स्टार किड्स चमक रहे हैं तो ऐसे भी लोग हैं जो बग़ैर रिश्तेदारी के और पावर सेंटर्स और तमाम चीज़ों के बावजूद कामयाबी तक पहुंच रहे हैं.
डायरेक्टर अभिषेक कपूर ने मीडिया में सुशांत सिंह राजपूत के बारे में अपने बयान में कहा "एक कोमल मस्तिष्क को बड़े ही व्यवस्थित तरीक़े से चोट पहुंचाई गई." शायद यही इस त्रासद ख़ुदकुशी की वजह बनी. लेकिन सुशांत को जो मानसिक चोट पहुंचाई गई उसके लिए सिर्फ़ बॉलीवुड के परिवारवाद को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता.
शेखर कपूर के निर्देशन में बनने वाली फ़िल्म 'पानी' के लिए सुशांत ने 12 प्रोजेक्ट ठुकराए. सुशांत इस हैसियत में थे कि ऐसा कर सकते थे. 2019 में उन्होंने अकेले व्यावसायिक तौर पर सफल फ़िल्म दी. 'सोनचिरैया' में भी उनकी भूमिका को आलोचकों की ख़ूब सराहना मिली थी.
सुशांत की उपलब्धियों पर नज़रिया
इंडस्ट्री से बाहर का होना और परिवारवाद का शिकार होने जैसे तर्कों से हम सुशांत की उपलब्धियों पर अपना नज़रिया छोटा कर लेते हैं. तमाम कठिनाइयों के बावजूद उनकी सफलता को प्रति यह असम्मान प्रकट करने जैसा है.
सुशांत, नवाज़ुद्दीन सिद्दिक़ी को पसंद करते थे. लेकिन उन्हें नवाज़ुद्दीन की तरह संघर्ष नहीं करना पड़ा. उन्हें उस छवि को साथ लेकर संघर्ष नहीं करना पड़ा, जिन्हें स्थायी रूप से ग़रीब आदमी की भूमिका के लिए फ़िट माना जाने लगा.
कई साल पहले नवाज़ुद्दीन ने मुझसे एक इंटरव्यू में कहा था, "मुझे अपने संघर्षों पर ग़ुस्सा आता था. मुझे हर चीज़ पर ग़ुस्सा आने लगा था." एक वक़्त था जब कोई भी उन्हें गंभीरता से नहीं लेता था. जब वह कहते थे कि उन्हें लीड रोल चाहिए तो उनके दोस्त यह कहकर उन्हें ख़ारिज कर देते थे कि "तुम हीरो मैटेरियल नहीं हो."
उस इंटरव्यू के दौरान उन्होंने मुझसे कहा था कि "मैं एक दिन बॉलीवुड का सबसे ज़्यादा फ़ीस लेने वाला एक्टर बनना चाहता हूँ". बॉलीवुड में संघर्ष रहा है. कुछ इसे झेलने में नाकाम रहे, जैसे अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्धन कपूर लेकिन नवाज़ुद्दीन जैसे लोगों ने संघर्ष कर जगह बनाई. सुशांत सिंह राजपूत ने भी इसी संघर्ष से अपनी जगह बनाई.
नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ( NCRB) के मुताबिक़ 2018 में देश में ख़ुदकुशी के 1,34,516 मामले सामने आए. इसके पिछले साल के मुक़ाबले 3.6 फ़ीसदी अधिक.
ख़ुदकुशी करने वाले शख़्स के दिमाग़ में क्या चलता है

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डॉक्टरों के नज़रिए से देखें तो ख़ुदकुशी एक धुंधला-सा विषय है. इसे समझने के लिए हमें उन लेखकों की ज़िंदगी पर नज़र दौड़ानी पड़ती है जो बायोपोलर डिसऑर्डर और डिप्रेशन के शिकार हो गए. यह इसे समझने का एक तरीक़ा हो सकता है. इसके ज़रिए यह समझा जा सकता है कि ख़ुदकुशी करने वाले शख़्स के दिमाग़ में क्या चलता रहता है.
यह सच है कि जो लोग डिप्रेशन से जूझ रहे हैं वे दर्द झेल रहे होते हैं और जानते हैं कि इसकी कोई दवा नहीं है, उन्हें एक दर्द से दूसरे दर्द तक का सफ़र तय करते रहना होगा.
यही वजह है कि डिप्रेशन से जूझ रहे शख़स् को 'वाकिंग वुंडेड' कहा जाता है, यह लड़ाई में घायल ऐसे सैनिक को कहा जाता है जो ज़ख्मी तो है लेकिन अपने पैरों पर खड़ा है.
ख़ुशनुमा मुस्कान वाले सुशांत सिंह राजपूत अपरिचितों के साथ रहते थे. बाद में वह अपने अतीत के साथ रहने लगे थे.
अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर सुशांत की कविता के टुकड़े में हमें उनकी पहचान मिल सकती है. उन टुकड़ों में ही सही. उन्हें जोड़कर ही हम उन्हें पहचान सकते हैं. उस शख़्स को जिसने छोटे-छोटे टुकड़े में आकाश को एक साथ जितना हो सके, जोड़ने की कोशिश की थी.
सुशांत सफ़र करते रहे लेकिन उन्होंने अपनी ज़मीन नहीं छोड़ी थी. तीन जून को उन्होंने मां की तस्वीर पोस्ट की थी, जिसमें उन्होंने लिखा था-- 'आंसुओं से धुंधली होती आंखों से मां की इस तस्वीर को निहारा'.
हर ज़िंदगी का एक पूर्ण विराम होता है लेकिन कई बार यात्राएँ अनंत होती हैं, इसका मतलब यही होता है कि सफ़र आगे जारी रहेगा. जिस शख़्स ने सितारों और ग्रहों को देखा उसकी कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई है.
हमें इस कहानी के कई रूप और पात्र देखने को मिलेंगे. अगले कुछ सालों में दुनिया पूरी तरह बदल नहीं जाएगी, और न ही सपने देखने वाले पूरी तरह ग़ायब हो जाएंगे.
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