राजनीति पर खुलकर बात क्यों नहीं कर पाता है बॉलीवुड: ब्लॉग

रणवीर और आलिया

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    • Author, शिवप्रसाद जोशी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

अभिनेता रणवीर सिंह कहते हैं कि वो 'एपोलिटिक्ल' हैं यानी अ-राजनीतिक. उनकी हां में हां मिलाते हुए अभिनेत्री आलिया भट्ट का भी यही कहना है.

फ़िल्म समीक्षक और वेब प्रस्तोता अनुपमा चोपड़ा के साथ एक बातचीत में दोनों ने अपने ये विचार ज़ाहिर किए. रणवीर और आलिया अपनी आगामी फ़िल्म 'गली ब्वॉय' के प्रमोशन में व्यस्त हैं.

'एनर्जेटिक' कहलाने वाले रणवीर सार्वजनिक रूप से अपनी 'ऊर्जा' दिखाते भी रहते हैं. मंचों पर उछलते कूदते और खींसे निपोरते हैं, विभिन्न भाव भंगिमाओं और मुद्राओं से दर्शकों और सहकर्मियों को रिझाते, पुचकारते और लोटपोट करते हैं.

कहने का अर्थ ये कि हरदम एक्शन में रहते हैं- मस्त और बिंदास. गली ब्वॉय का एक रैप गाते हुए वो एक प्रमोशनल इवेंट में मंच से दर्शकों की भीड़ पर छलांग लगाते हुए भी देखे गए.

ख़ैर, इसी फ़िल्म के बारे में अनुपमा चोपड़ा ने रणवीर से पूछा- फ़िल्म के एक गाने में कन्हैया कुमार के आज़ादी के नारे, उस पर आधारित रैप और वास्तविक जीवन में पीएम मोदी को कसकर गले लगाए एक आत्मीय सा दिखते फ़ोटो के बीच वो ख़ुद कहां हैं यानी उनकी राजनीति क्या है? वो इस जटिल संतुलन को कैसे साध पाते हैं?

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ये सवाल आते ही रणवीर और आलिया के बेफ़िक्र और खिले हुए चेहरों पर सहसा ही दार्शनिकता का भाव आ गया. लंबा सा सवाल ख़त्म हुआ तो चेहरों पर हरकत लौटी.

रणवीर का कहना था कि इस गाने से उनका कोई सीधा लेना-देना नहीं है, ये एक मोंटाज है, अलग ढंग से फ़िल्माया गया है और इसके लिए और लोग बेहतर जवाब दे सकते हैं, जिनमें ज़ोया (इस फ़िल्म की निर्देशक) भी एक हैं.

कंधे हल्के से उचकाते हुए और मानो असहाय होकर रणवीर बोले कि वे तो असल में 'एपोलिटिकल' हैं. आलिया ने भी फ़ौरन हामी भरी और अनुपमा के पूरक प्रश्न का जवाब एक चतुर बौद्धिक उलझाव के साथ दिया. अंत में उन्होंने गहरी मुस्कान दिखाई जिसका आशय शायद यही रहा होगा कि बस करिए.

आलिया भट्ट

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बॉलीवुडीय लक्षण

अपने समय के सवालों पर कन्नी काट जाना, 'चुप रहने में ही भलाई है' के आलस्य में छिपे रहना, अपनी राजनीति पर या अपनी राजनीतिक समझ से सरेआम इनकार कर देना, ख़ुद को अराजनीतिक बता देना, पेशे और जीवन की विसंगतियों पर पारदर्शिता दिखाने में अटकने लगना, और सबसे बढ़कर खुलकर अपनी राय न ज़ाहिर कर पाने की कुलबुलाहट और आधी-अधूरी ग्लानि के भंवर में फंसे रहना; ये बॉलीवुडीय लक्षण हो सकते हैं.

मुख्यधारा का हिन्दी सिनेमा अपने कमर्शियल इंद्रजाल में इतना दयनीय, इतना विस्मृत और इतना आत्ममुग्ध हो चुका है कि लगता है कि वो सेल्फ़ी और बैकसेल्फ़ी की वंदनीयता को अपना कौशल विकास मानने लगा है. सिने सितारे आख़िर किसके लिए जगमगाते हैं? अपनी रोशनियों का इतना कॉर्पोरेटीकरण और ध्रुवीकरण करने की उन्हें भला क्या ज़रूरत? वे क्यों कृपा-पात्र और कृपा-कातर हैं? क्या ये उनकी राजनीति नहीं? या ये भी उनकी उस कथित विडंबना का हिस्सा है जिसे वो कुछ शर्म और कुछ शान में 'अ-राजनीति' कहते हैं?

लेकिन भयंकर जगमगाहटों वाले गाढ़े अंधेरे में कुछ जीवंत रोशनियां अपनी जगह बनाए रहती हैं. वे विभूषित कृत्रिमताओं से अलग अपनी मौलिक संवेदना में दमकती हैं.

आलिया भट्ट ख़ुद को अराजनीतिक बता रही थीं तो उसी दौरान एक वीडियो दिखा. इस वीडियो में महेश भट्ट की बड़ी बेटी और अभिनेत्री पूजा भट्ट फ़िल्म वेटेरन नसीरुद्दीन शाह द्वारा अजमेर के एक समारोह में विरोध झेले जाने को लेकर किए गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं.

पूजा भट्ट

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पूजा ने कहा कि अगर ये देश लोकतांत्रिक है तो यहां हर किसी को अपनी राय रखने की आज़ादी होनी चाहिए. अपना हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि मैं अगर आपसे अलग कुछ कहूं या कोई राय दूं तो क्या आप मुझे मार देंगे? यानी क्या मेरे घरवाले ही मुझे मार देंगे.

देश को पूजा ने घर की संज्ञा देते हुए नसीरुद्दीन शाह के साथ हुए व्यवहार पर क्षोभ जताया.

पुराना है सिलसिला

रणबीर-आलिया प्रसंग में एक पहलू या संभावना या प्रोबेबिलिटी या बेनेफ़िट ऑफ़ डाउट तर्क में ये भी आता है कि आख़िर 'अराजनीतिक' कहकर दोनों अभिनेता अपनी उस राजनीति को सामने न लाने की कोशिश भी कर रहे हो सकते हैं, जो वे दबे-छिपे ढंग से असहिष्णुता और हिंसा के पीड़ितों के पक्ष में रखते हों.

लेकिन आज़ादी या संघर्ष या अधिकारों के नारे के कमोडिफ़िकेशन पर तो हमारा पूरा मुख्यधारा कमर्शियल सिनेमा ही बग़लें झांकने लगता है. और ये आज की तो बात नहीं, ये सिलसिला पिछली सदी के 70 के दशक से चला है.

एक सवाल फ़िल्मवाले ये पूछ सकते हैं कि भाई हम ही क्यों अपनी गर्दन फंसाएं. इसके जवाब में एक याददिहानी- 2017 में गोल्डन ग्लोब फ़िल्म समारोह में लाइफ़टाइम अचीवमेंट पुरस्कार लेने के बाद हॉलीवुड की मशहूर अदाकारा मेरिल स्ट्रीप ने अपने धन्यवाद भाषण में तब के राष्ट्रपति नॉमिनी डोनल्ड ट्रंप के दुर्व्यवहार की भर्त्सना करते हुए अपने सहकर्मियों की एकजुटता और प्रेस का साथ देने की अपील की थी.

मेरिल स्ट्रीप

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मेरिल ने कहा था, "बेक़द्री, बुलावा देती है बेक़द्री को. हिंसा, हिंसा को ही उकसाती है. जब शक्तिशाली लोग अपनी पोज़िशन का इस्तेमाल दूसरो को धौंस दिखाने के लिए करते हैं तो हम सब हारते हैं. ठीक है, यही ठीक है, ऐसा ही चलता रहने दो... ये हो जाता है. हमें सिद्धांतों वाले ऐसे प्रेस की दरकार है जो सत्ता से हिसाब मांग सके, हर उन्माद के लिए सत्ताधारियों से जवाब तलब कर सके, उन्हें फटकार लगा सके."

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