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बुधवार, 28 जनवरी, 2009 को 15:25 GMT तक के समाचार
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'पाँच करोड़ लोग बेरोज़गार हो जाएँगे'
बेरोज़गार लोगों की तादाद तेज़ी से बढ़ती जा रही है

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) का कहना है कि वैश्विक आर्थिक मंदी की वजह से इस वर्ष पाँच करोड़ से अधिक लोगों को नौकरी गँवानी पड़ सकती है.

संयुक्त राष्ट्र से जुड़े इस संगठन का कहना है कि इसकी वजह से दुनिया भर में बेरोज़गारी का आंकड़ा सात प्रतिशत तक पहुँच जाएगा जबकि इस समय यह छह प्रतिशत के करीब है.

आईएलओ का कहना है नौकरियों में होने वाली कटौतियों का सबसे बुरा असर विकासशील देशों पर पड़ेगा.

श्रम संगठन का कहना है, "अगर आशंका के अनुरूप मंदी की हालत और बुरी हुई तो दुनिया भर में बेरोज़गारी का संकट बहुत गंभीर हो जाएगा."

 यह एक विश्वव्यापी संकट है जिसके समाधान के लिए सबको काम करना होगा, दुनिया भर में ग़रीबी निवारण की दिशा में किए गए कामों पर पानी फिर रहा है, मध्यमवर्ग की दशा बिगड़ रही है
हुआन सोमाविया

आईएलओ के महानिदेशक हुआन सोमाविया ने कहा, "यह एक विश्वव्यापी संकट है जिसके समाधान के लिए सबको काम करना होगा, दुनिया भर में ग़रीबी निवारण की दिशा में किए गए कामों पर पानी फिर रहा है, मध्यमवर्ग की दशा बिगड़ रही है. "

हर सप्ताह दसियों कंपनियों में हज़ारों की तादाद में लोगों की छंटनी के समाचार आ रहे हैं, इस सप्ताह फ़िलिप्स, होमडिपो, आईएनजी और कैटरपिलर जैसी कंपनियों ने बड़ी छँटनियों की घोषणा की है.

पिछले वर्ष सबसे अधिक नई नौकरियों के अवसर एशिया में पैदा हुए, दुनिया भर की कुल नई नौकरियों का 57 प्रतिशत हिस्सा एशियाई देशों से आया.

आईएलओ का कहना है कि दुनिया भर में छाई आर्थिक मंदी की वजह से एशियाई देशों के नौकरी बाज़ार में बढ़ोतरी की जगह छँटनी का दौर शुरु हो चुका है.

'बहुत बुरी हालत'

दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) का कहना है कि दुनिया भर में आर्थिक विकास की दर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अब तक के सबसे निचले स्तर पर है.

आईएमएफ़ का कहना है कि इस वर्ष दुनिया भर में आर्थिक विकास की दर गिरकर 0.5 प्रतिशत रह जाएगी.

मुद्रा कोष के मुख्य अर्थशास्त्री ऑलिवर ब्लैंचर्ड ने कहा, "दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की वृद्धि बिल्कुल रुक जाएगी. अब तक जितने क़दम उठाए गए हैं उनका कोई ख़ास असर होता नहीं दिख रहा है."

आईएमएफ़ का कहना है कि यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था में तो दो प्रतिशत तक का संकुचन आएगा जबकि अमरीका में यह आंकड़ा 1.6 प्रतिशत होगा.

मुद्रा कोष का कहना है कि विकासशील देशों में थोड़ा-बहुत विकास होता रहेगा लेकिन भारत और चीन जैसे देश दुनिया भर से मिलने वाले ऑर्डरों की कमी की वजह से बुरी हालत में जा पहुँचेंगे.

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