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एशियाई शेयर बाज़ारों से मिश्रित संकेत | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका में वित्तीय बाज़ार के संकट के असर से जूझ रहे पूर्वी एशिया के शेयर बाज़ारों में गुरुवार को कुछ मिश्रित संकेत देखने को मिले हैं. ग़ौरतलब है कि विश्व के कई देशों ने मंगलवार को एक साथ उठाए कदम में ब्याज दरों में कटौती की थी. उधर अमरीकी वित्तमंत्री हेनरी पॉलसन ने चेतावनी दी है कि सरकार के आर्थिक पैकेज के बावजूद कुछ और बैंकों का दिवालिया निकल सकता है. उन्होंने कहा है कि अमरीकी संसद ने 700 अरब डॉलर के जिस आर्थिक पैकेज को मंज़ूरी दी है उसे जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए. उन्होंने विश्व अर्थव्यवस्था में और तूफ़ान की चेतावनी देते हुए कहा कि वित्तीय संकट जल्दी ख़त्म होने वाला नहीं है और अभी कई कठिन चुनौतियाँ बची हुई हैं. इसी हफ़्ते वॉशिंगटन में इसी मुद्दे पर विचार करने के लिए दुनिया के सात अमीर देशों जी-7 के वित्त मंत्रियों की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के प्रतिनिधियों के साथ बैठक होने जा रही है. निक्केई संभला, ऑस्ट्रेलिया में गिरावट जहाँ जापान में टोक्यो शेयर बाज़ार में बुधवार की रिकॉर्ड बिकवाली के बाद गुरुवार को कुछ सुधार नज़र आया, वहीं ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया के शेयरों में कुछ गिरावट नज़र आई. जापान के केंद्रीय बैंक - बैंक ऑफ़ जापान ने बाज़ार में बीस अरब डॉलर का निवेश किया जिसके बाद गुरुवार को निक्केई में कुछ स्थिरता नज़र आई.
हालाँकि ऑस्ट्रेलिया में गुरुवार सुबह शेयरों की कीमतों में गिरावट जारी रही और कारोबार शुरु होने के बाद बाज़ार 1.2 प्रतिशत गिरा. उधर यूरोपीय केंद्रीय बैंक के अध्यक्ष जाँ-क्लौड त्रिशेट ने डीलरों से अपील की है कि वे पूरी स्थिति के बारे में ज़रूरत से ज़्यादा नकारात्मक रवैया न अपनाएँ. जी-7 की बैठक महत्वपूर्ण है कि इसी हफ़्ते वॉशिंगटन में दुनिया के सात अमीर देशों जी-7 के वित्त मंत्रियों की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के प्रतिनिधियों के साथ बैठक होनी है. हालांकि 1990 के दशक में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने विकासशील देशों - मैक्सिको, थाइलैंड और रूस को वित्तीय संकट से निकालने के लिए कर्ज़ दिया था लेकिन अब स्थिति कुछ अलग है. विकसित देशों से पैदा हुआ इस संकट को हल करने के लिए जितने पैसे की ज़रूरत है, वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास नहीं है. लेकिन यदि और विकासशील देश इस वित्तीय संकट की चपेट में आ जाते हैं तो हो सकता है उन्हें आईएमएफ़ के पैसे का सहारा लेना पड़े. |
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