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मंगलवार, 07 अक्तूबर, 2008 को 23:22 GMT तक के समाचार
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अमरीकी बाज़ारों में गिरावट नहीं थम रही
शेयर बाज़ार
अंतरराष्ट्रीय शेयर बाज़ारों में गिरावट का दौर जारी है
अमरीका में वित्तीय संकट से जुड़ी चिंताओं के कारण मंगलवार को लगातार पाँचवे दिन शेयर बाज़ार में गिरावट देखी गई.

अमरीकी शेयर बाज़ार का जो सूचकांक 11 हज़ार के नीचे बड़ी मुश्किल से जाता था वो कल 500 अंक और गिरकर 9,500 के स्तर से कुछ नीचे बंद हुआ है.

अमरीका में ये पिछले पाँच साल का सबसे निचला स्तर है. बाज़ारों का बुरा हाल अमरीका तक सीमित नहीं है.

यूरोप में लोगों को चिंता सताने लगी थी कि बैंकों में उनका पैसा सुरक्षित है या नहीं जिसके बाद यूरोपीय देशों के वित्त मंत्रियों ने ताबड़तोड़ कुछ घोषणाएँ की हैं.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के मुताबिक वित्तीय संकट से उबरने के लिए अमरीका को ज़रूरत हो सकती है 1400 अरब डॉलर की यानि रुपए में देखा जाए तो 65 हज़ार अरब से ज़्यादा की.

आईएमएफ़ ने ये कहकर चिंता बढ़ा दी है कि अमरीका सरकार वित्तीय संकट से उबारने के लिए जो 700 अरब डॉलर का पैकेज दे रही है बात उससे भी बनेगी नहीं.

लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि आईएमएफ़ का आँकड़ा अमरीका सरकार के मुक़ाबले सच्चाई के ज़्यादा करीब नज़र आ रहा है.

विश्लेषकों का कहना है कि इस बात की गारंटी भी नहीं है कि इतना अधिक धन यानि 65 हज़ार अरब रुपए लगाने के बाद भी ये वित्तीय संकट टल जाएगा.

दुनिया के कई शेयर बाज़ार इस साल की शुरुआत से लगभग 40 से 50 फ़ीसदी गिर चुके हैं.

परेशान लोग

लोग परेशान हैं और पूछ रहे हैं कि ये वित्तीय संकट कितने दिन और चलेगा.

अगर अमरीका के केंद्रीय बैंक फ़ेडरल रिज़र्व के प्रमुख बेन बर्नांके की मानें तो वित्तीय संकट अगले साल तक जारी रह सकता है.

बेन बर्नांके का कहना है,“महंगाई कम होगी ये कह पाना मुश्किल है क्योंकि कमोडिटी या उपयोगी वस्तुओं के दामों में काफ़ी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है. हमें क़ीमतों पर नज़र रखनी होगी. अभी तक जो आँकड़े हमारे पास आ रहे हैं उनसे जो वित्तीय तस्वीर बन रही है उससे लगता है कि आर्थिक वृद्धि और थमेगी.”

 वित्तीय संकट से उबरने के लिए अमरीका को ज़रूरत हो सकती है 1400 अरब डॉलर यानि 65 हज़ार अरब रुपए की
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष

और जैसा कि आप जानते हैं अमरीका की तरह यूरोप भी परेशान है.

अगर लोगों को ये चिंता सताने लगे कि बैंकों में उनका पैसा सुरक्षित नहीं है तो ये तो बैंकिंग व्यवस्था की जड़ों पर सीधी चोट है.

इसी से घबरा कर कई यूरोपीय देश अब वादा कर रहे हैं कि वो लोगों का बैंकों में रखे पैसे की गैरंटी दे रहे हैं.

जर्मनी जैसे देश सारे पैसे की गारंटी दे रहे हैं तो यूरोपीय वित्त मंत्री इस पर सहमत हुए हैं कि कम से कम 50 हज़ार यूरो तक के पैसे की तो सरकार ज़रूर गारंटी दे.

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि इससे ज़्यादा पैसे अगर बैंक में हैं तो क्या वो डूब जाएँगे.

यहाँ ब्रिटेन में तो ख़बरें हैं कि आइसलैंड के एक बैंक ने लोगों को पैसे निकालने पर रोक लगा दी है.

ब्रिटेन में भी संकट

बीबीसी को जानकारी मिली है कि ब्रिटेन के भी कुछ बड़े बैंक संकट में हैं.

 महंगाई कम होगी ये कह पाना मुश्किल है क्योंकि कमोडिटी या उपयोगी वस्तुओं के दामों में काफ़ी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है. हमें क़ीमतों पर नज़र रखनी होगी. अभी तक जो आँकड़े हमारे पास आ रहे हैं उनसे जो वित्तीय तस्वीर बन रही है उससे लगता है कि आर्थिक वृद्धि और थमेगी
बेन बर्नाके, अमरीकी फ़ेडरल बैंक के प्रमुख

ऐसे में ब्रिटेन सरकार पर दबाव है कि वो जल्द से जल्द एक पैकेज की घोषणा करे.

बीबीसी के कारोबार मामलों के संपादक रॉबर्ट पेस्टन को जानकारी मिली है कि आज ब्रिटेन की सरकार ब्रिटेन के बैंकों को बचाने के लिए 50 अरब पाउंड यानि 4000 अरब रुपए से ज़्यादा के एक पैकेज की घोषणा कर सकती है.

लेकिन वित्तीय संकट अब अमरीका और यूरोप के बाहर बड़े रूप में दिखने लगा है.

मध्यपूर्व, जहाँ तेल के बढ़े हुए दामों ने अर्थव्यवस्था को उछाल दी थी वहाँ भी शेयर बाज़ारों में वित्तीय भूचाल आ रहा है.

मिस्र में शेयर बाज़ार का सूचकांक एक ही दिन में 16 फ़ीसदी गिर गया.

मिस्र के शेयर ब्रोकर एहमद सामी कहते हैं,“ स्थिति बहुत ख़राब है. दुनिया के शेयर बाज़ारों की गिरावट का हम पर असर साफ़ दिख रहा है. लोग इतने डरे हुए हैं कि शेयरों के दाम बहुत कम हैं फिर भी वो बेच रहे हैं, बड़े नुक़सान पर भी लोग शेयर बाज़ार से बस निकल जाना चाहते हैं.”

मिस्र के कुछ लोगों ने तो ये भी माँग की है कि सरकार उन्हें बचाने के लिए आगे आए.

लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि दुनिया भर में आए वित्तीय संकट के समय तो शेयर बाज़ार डूबेंगे ही, इसमें देशों की सरकारें क्या कर सकती हैं.

ये ज़रूर है कि वित्तीय व्यवस्था को संभालने के लिए ज़रूर सरकारों को क़दम उठाने होंगे और यही करने के लिए अमरीका के राष्ट्रपति बुश औद्योगिक रूप से विकसित देशों की एक बैठक जल्द करवाना चाहते हैं.

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