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शुक्रवार, 20 जून, 2008 को 05:00 GMT तक के समाचार
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अमरीका ढूँढ़ रहा है आर्थिक मंदी की जड़ें
अमरीकी रियल स्टेट
अमरीकी आर्थिक मंदी का सबसे पहला शिकार हुआ है मकानों का कारोबार
दुनिया में आए वित्तीय संकट, “क्रेडिट क्रंच” के केंद्र में अमरीका है. लेकिन अमरीका में अब इस बात की खोज चल रही है कि इस संकट के लिए कौन ज़िम्मेदार है.

इस मामले की जाँच कर रही है वहाँ की केंद्रीय जाँच एजेंसी एफ़बीआई, जिसने अब तक 400 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया है.

इसी सिलसिले में अमरीका में गुरुवार को इंवेस्टमेंट बैंक बेयर स्टर्न्स के दो पूर्व मैनेजरों को गिरफ़्तार कर लिया गया.

संकट

इस साल मार्च के महीने में अमरीका का पाँचवा सबसे बड़ा बैंक संकट में आया और फिर उसे एक दूसरे बैंक जेपी मॉर्गन चेज़ ने ख़रीद लिया.

जिस दिन ये हुआ, अमरीका में बाज़ार गिरा और भारत में भी शेयर बाज़ारों में भारी गिरावट आई. महीनों से जारी अमरीकी सब प्राइम संकट भारत में भी सुर्ख़ियों में आया - सेंसेक्स 21,000 से लुढ़ककर 14,500 के स्तर तक पहुँच गया.

 जिन स्कीमों और धोखाधड़ी से बाज़ार के प्रति लोगों का विश्वास कम हुआ है और जहाँ आपराधिक गतिविधि का सबूत मिलेगा हम उन लोगों को सज़ा दिलाकर रहेंगे
ऱॉबर्ट मूलर, एफ़बीआई के निदेशक

ज़ाहिर है अमरीका की अर्थव्यवस्था में क्या हो रहा है उसमें भारत की भी गहरी रुचि है.

अमरीका में गुरुवार को इंवेस्टमेंट बैंक -बेयर स्टर्न्स के दो पूर्व मैनेजरों रैल्फ़ सियोफ़ी और मैथ्यू टैनिन को गिरफ़्तार कर लिया गया.

इनपर आरोप ये है कि इन्हें ये अंदाज़ा था कि संकट कितना बड़ा है लेकिन ये बातों पर पर्दा डालते रहे.

ये दोनों, बेयर स्टर्न्स के ऐसे हेज फ़ंड के प्रमुख थे जो बाज़ार में 20 अरब डॉलर लगाता था – दोनों प्रतिष्ठित थे, अमीर और प्रभावशाली.

दोनों अपने ऊपर लगे आरोपों से इंकार कर रहे हैं. जानकार कहते हैं कि वित्तीय संकट को रोक पाने में असमर्थ अमरीका सरकार जो बन पड़े करने की कोशिश कर रही है.

एफ़बीआई के निदेशक रॉबर्ट मूलर कहते हैं, “जिन स्कीमों और धोखाधड़ी से बाज़ार के प्रति लोगों का विश्वास कम हुआ है और जहाँ आपराधिक गतिविधि का सबूत मिलेगा हम उन लोगों को सज़ा दिलाकर रहेंगे.”

लेकिन सवाल ये है कि एफ़बीआई के इन क़दमों से क्या वाकई सरकार समस्या की जड़ तक पहुँचकर वित्तीय संकट को थाम सकती है?

जानकार कहते हैं शायद नहीं. क्योंकि ज़रूरत है इस पूरी वित्तीय व्यवस्था में बड़े बदलाव की.

साथ ही जानकार ये भी कहते हैं कि बेहतर होगा कि जल्द से जल्द बैंक अपने असली और पूरे नुक़सान को स्वीकार करें ताकि सभी लोग पारदर्शी तरीके से समझ सकें कि वास्तव में नुक़सान है कितना और फिर वहाँ से बेहतरी की ओर बढ़ें.

शायद इसी में अमरीका की भी भलाई है और बाक़ी दुनिया की भी.

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