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शुक्रवार, 07 मार्च, 2008 को 13:54 GMT तक के समाचार
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अभी सिर्फ़ इश्तिहार है जेंडर बजटिंग

वित्त मंत्री
पिछले दो सालों में भारत में जेंडर बजटिंग पर ज़्यादा बात हो रही है
पिछले दो सालों में भारत में जब वित्त मंत्री ने बजट पेश किया है तो ये बात उठी है कि जेंडर बजटिंग होनी चाहिए यानी ऐसा बजट जिसमें महिलाओं की ज़रूरतों और संवेदनाओं का ध्यान रखा जाए.

लेकिन असल में जेंडर बजटिंग का हाल भी ठीक उन योजनाओं की तरह है, जिन्हें कागज़ों पर पूरा कर दिया जाता है, पर वास्तव में उनसे जुड़े लक्ष्य हासिल नहीं किये जाते.

बजट मूलत खर्च और आमदनी का दस्तावेज़ है.जेंडर बजटिंग के तहत उम्मीद की जाती है कि आधी आबादी के प्रति अर्थव्यवस्था के खर्च और आमदनी के प्रस्ताव संवेदनशील होंगे.

यूँ तो 2008-09 के बजट ने दो तरह के आँकड़ों की रिपोर्टिंग की है जेंडर बजटिंग के तहत. इसमें उन परियोजनाओ के बारे में जानकारी दी गई है, जिनका सौ प्रतिशत फ़ायदा महिलाओं को पहुंचेगा.

इसके अलावा उन परियोजनाओँ के बारे में भी जानकारी दी गई है, जिनमें तीस प्रतिशत फ़ायदा महिलाओं को पहुंचेगा.

महिलाओं के नाम पर

 बजट में पूरी कवायद इस तरह की हो गई है कि जो खर्च पहले ही बजट में हो रहा है, उसे किसी न किसी तरह से महिलाओं के खाते में डालकर साबित कर दिया जाये, ये महिलाओं को लाभ पहुंचाने वाला खर्च है

2008-09 में बजट ने कुल खर्च 750884 करोड़ रखा है. इसमें महिलाओं को सीधे या परोक्ष तौर पर लाभ पहुंचाने वाला खर्च है-27,662 करोड़ यानी कुल खर्च का करीब 3.68 प्रतिशत.

दरअसल ये पूरी कवायद इस तरह की हो गई है कि जो खर्च पहले ही बजट में हो रहा है, उसे किसी न किसी तरह से महिलाओं के खाते में डालकर साबित कर दिया जाये, ये महिलाओं को लाभ पहुंचाने वाला खर्च है.

उदाहरण के लिए 2007-08 के बजट में महिला पुलिस के लिए नेशनल कांफ्रेस के लिए दस लाख रुपये की रकम ऱखी गई थी. यह गृह मंत्रालय का रुटीन खर्च है. पर जेंडर बजटिंग के तहत यह महिलाओं के खाते में डाल दिया गया.

ऐसी और भी मदों की लंबी सूची बनाई जा सकती है. पर मसला सिर्फ़ यह नहीं है.

जेंडर बजटिंग का एक और नज़रिया यह हो सकता है कि ऐसे कार्यक्रमों के लिए ज़्यादा रकम दी जाए- जिनसे महिलाओं, बालिकाओं के लिए स्थितियां बेहतर हो सके.

जैसे कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओँ की माँग रही है कि घरेलू हिंसा को गंभीर समस्या मानते हुए इस मद के लिए ठीक-ठाक बजट रखा जाए.

ऐसे कई कदम हो सकते हैं, जिनसे जेंडर संवेदनशीलता के प्रमाण मिल सकते हैं. जैसे कन्या भ्रूण हत्या के कानून लगभग मज़ाक बन चुके हैं.

हज़ारों की संख्या में रोज़ कन्या भ्रूण परीक्षण के बाद हत्याएँ हो रही हैं. क़ानून बनाए जाने के बाद उनपर अमल कराने में किसी की दिलचस्पी नहीं है.

जेंडर बजटिंग के तहत अगर सिर्फ़ इस क़ानून के अमल के लिए ही पर्याप्त धनराशि रखी जाये, तो खासा भला हो सकता है.

सिर्फ़ लड़कियों के स्कूलों पर खर्च पक्के तौर पर ऐसा कदम होगा, जिसकी भारत जैसे देश में सख्त ज़रुरत है. पर इस तरह के कदमों के प्रति अभी किसी स्तर पर संवेदनशीलता नहीं है.

जेंडर बजटिंग के सिर्फ़ इश्तिहार से ही जब काम चल रहा है, तो वाकई ठोस कदम उठाने की ज़रुरत महसूस क्यों की जाए.

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