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क्या भारत में सफल होगी जैगुआर? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सर्कस में कलाकारों की तरह तेज़ी से ट्रैफ़िक में घुसते और बाहर निकलते फुर्तीले मोटरसाइकिल चालक अब देश में तेज़ी से बढ़ती कारों पर ज़ोर आज़माने जा रहे हैं. भारत का कार उद्योग अब यात्री कारों के उत्पादन के साथ तेज़ी से बढ़ रहा है. सरकारी अनुमान के अनुसार 2003-04 में दस लाख का यह कारोबार 2015 में तीस लाख यानि तीन गुना हो जाएगा. यह कारें देश की भीड़ भरी सड़कों पर जगह की कमी झेल रही बसों और जर्जर ट्रकों के साथ जूझ रही हैं. इसके बावजूद इस उद्योग की क़ीमत करीब 30 से 150 अरब डॉलर बढ़ने वाली है. घरेलू बाज़ार में विकास के ऐसे आशावादी अनुमानों ने भारत के कुछ मुख्य औद्योगिक समूहों को इस क्षेत्र में देश की सीमा के बाहर भी संभावनाएं तलाशने पर मजबूर कर दिया है. ऐसे दो समूह ब्रिटिश लग्ज़री कंपनियों 'जगुआर' और 'लैंड रोवर' का अधिग्रहण करने के इच्छुक हैं. मैरिल लिंच ने इनकी क़ीमत डेढ़ अरब डॉलर लगाई है जबकि इन्हें बिक्री के लिए रखा है इनकी मूल कंपनी 'फोर्ड मोटर्स' ने. यह सौदा विजेता को वैश्विक ऊँचाइयों पर ले जाएगा. फोर्ड मोटर्स के चीफ़ एक्ज़ीक्यूटिव एलेन मुलाली कहते हैं, “हो सकता है कि इस साल के अंत से अगले साल की शुरूआत के बीच हम कोई घोषणा करें.” प्रतिद्बंद्बी बोलीकर्ता इन ब्रिटिश कंपनियों का अधिग्रहण करने के इच्छुकों में एक तो भारत का पुराना और प्रसिद्ध नाम है- टाटा समूह. समूह की सहायक कंपनी टाटा मोटर्स कार और वाणिज्यिक वाहन बनाने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी और मध्यम और भारी बसें बनाने वाली दुनिया की दूसरी बड़ी कंपनी है. महत्वपूर्ण है कि टाटा पहले ही वैश्विक बाज़ार में पहचान क़ायम कर चुका है. यह इटली की कार उत्पादक कंपनी फ़िएट के साथ काम कर रहा है और भारत में भी कुछ मॉडल बना रहा है.
इसने वारविक विश्वविद्यालय में भी एक महत्वपूर्ण यूरोपीय वाहन विकास केंद्र स्थापित किया है. इससे कुछ ही मील की दूरी पर जगुआर और लैंड रोवर भी अपनी कार डिज़ाइन करते हैं. टाटा के बाद नाम आता है महिन्द्रा एंड महिन्द्रा (एमएंडएम) का जिसने ट्रैक्टर और सेना के ट्रक बनाने में ख़ासा नाम कमाया है. महिन्द्रा समूह की कंपनी एमएंडएम अब यात्री कार के क्षेत्र में आ गई है. साल की शुरूआत में इसने रीनॉल्ट और निसान के साथ मिलकर बजट कार डिज़ाइन की थीं जिन्हें ख़ासतौर पर विकासशील देशों के लिए बनाया जाना था. निजी इक्विटी कंपनी अपोलो के साथ एमएंडएम पहले ही भारत में स्पोर्ट्स वाहनों का उत्पादन कर रही है. मेड इन इंडिया जगुआर- लैंड रोवर का भारतीय ख़रीदार होने का यह अर्थ नहीं कि इनका उत्पादन भारत में होने लगेगा. अगर इसे भारत में बेचना है तो हो सकता है कि किट्स के रूप में इसे आयात किया जाए और भारत में इसे जोड़ने का प्लांट लगा दिया जाए. इससे क़रीब 122 फ़ीसदी आयात कर की बचत होगी. इसका अर्थ है कि टाटा हो या महिन्द्रा, भारत में जोड़े गए जगुआर या लैंड रोवर के मॉडल उन्हें आधी से भी कम कीमत पर पड़ेंगे. अगर यह कंपनियाँ टाटा या महिन्द्रा को मिलीं तो कल-पुर्ज़ों के भारतीय उत्पादकों को भी फ़ायदा हो सकता है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय कंपनियों के अधीन होने से जगुआर और लैंड रोवर की साख पर बट्टा तो नहीं लगेगा कारों का निर्यात उद्योग के जानकार कहते हैं कि जगुआर के ग्राहक चाहते हैं कि ब्रिटेन में ही इसका उत्पादन हो और यह भी कि वे भारतीय निर्यात से नाख़ुश होंगे. उधर, लैंड रोवर की रेंज रोवर और डिस्कवरी-3 जैसी लग्ज़री कारों के ख़रीदार भी कम संशयी नहीं हैं. उद्योग के जानकारों के अनुसार लैंड रोवर सेना को भी आपूर्ति करती है और दूसरी भी कई ऐसी एजेंसियाँ हैं जो इस मॉडल को ख़रीद कर तब भी ख़ुश होंगी जब यह भारत में बनेगी. लेकिन सिर्फ़ तब जब तक इनकी गुणवत्ता के मामले में समझौता नहीं किया जाता. दोनों ही मामलों में जानकार मानते हैं कि जगुआर और लैंड रोवर की सफ़लता के लिए ख़रीदार की जेब भारी होनी चाहिए क्योंकि इनमें मोटा पैसा लगाने की ज़रूरत होगी. | इससे जुड़ी ख़बरें बाज़ार में 'इस्लामी कार' उतारने की तैयारी 11 नवंबर, 2007 | कारोबार टाटा की नज़र लैंड रोवर पर25 अगस्त, 2007 | कारोबार शराबी ड्राइवर को रोकने वाली कार04 अगस्त, 2007 | कारोबार टोयोटा दुनिया की 'नंबर वन' कार कंपनी24 अप्रैल, 2007 | कारोबार भारत में कारों की रिकॉर्ड बिक्री12 फ़रवरी, 2007 | कारोबार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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