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कृषि के लिए ठोस रणनीति की ज़रूरत | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की चमक के बीच भारतीय कृषि का संकट काले धब्बे की तरह उभर रहा है, जिसे साफ़ करने के लिए ठोस रणनीति की ज़रूरत है. भारतीय अर्थव्यवस्था 'हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ' के दायरे को तोड़कर उच्च विकास दर के दौर में पहुँच गई है. पिछले चार साल में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में साढे आठ, साढे सात, नौ और 9.4 फ़ीसदी की विकास दर ने इसे बखूबी साबित कर दिया है. सालाना 10 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और 200 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की चमक और विश्वसनीयता के सबूत हैं. रणनीति की कमी लेकिन कृषि संकट को दूर करने के लिए सरकार के पास ठोस रणनीति या कार्ययोजना नहीं है. भारतीय अर्थव्यवस्था की तेज़ होती विकास दर के उलट कृषि क्षेत्र विकास के मोर्चे पर पिछड़ता गया. आठवीं योजना में 4.7 फ़ीसदी की कृषि विकास दर के बाद नौवीं योजना में यह 2.1 फ़ीसदी और 10वीं योजना में 2.3 फ़ीसदी पर अटक गई. ताज़ा आंकड़ों में जीडीपी विकास दर 9.4 प्रतिशत रही, लेकिन कृषि विकास दर 2.7 फीसदी रही. 11वीं योजना के लिए कृषि विकास दर का लक्ष्य चार प्रतिशत है.
असल में जिस तरह 2002 में केंद्रीय पूल में खाद्यान्न भंडार 630 लाख टन पर पहुँच गया और हमने 90 डॉलर प्रति टन पर गेहूँ का निर्यात किया उसने सरकार को कुछ ज़्यादा ही आत्मविश्वास से भर दिया. नतीजा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को समाप्त करने या स्थिर करने और किसानों को खाद्यान्नों की बजाय दूसरी फसलें उगाने के सुझाव दिए जाने लगे. लेकिन पिछले एक दशक में खाद्यान्न उत्पादन में एक फ़ीसदी से भी कम की बढ़ोत्तरी ने उत्पादन को 20 से 21 करोड़ टन के बीच ही स्थिर कर दिया, जबकि आबादी डेढ़ प्रतिशत की दर से बढ़ी. इसके चलते देश ने खाद्यान्न आत्मनिर्भरता को खो दिया और अब हम 250 डॉलर प्रति टन पर गेहूँ आयात के लिए तैयार हैं. कीमतों में उछाल खाद्य तेलों पर आयात निर्भरता 50 फ़ीसदी पर पहुँच गई है तो दालों की हालत और अधिक खराब है. इस बीच, विश्व बाज़ार में जैव ईंधन की बढ़ती माँग ने खाद्यान्नों के साथ ही खाद्य तेलों की क़ीमतों को भी आसमान पर पहुँचा दिया. इसका परिणाम बढ़ती महँगाई के रूप में सामने आया. इसकी राजनीतिक आँच जब चुनाव नतीजों में दिखने लगी तो सरकार को लगा कि कृषि संकट में है और इस पर काम शुरू हुआ. पिछले एक दशक से सरकार इस बात से बेख़बर थी कि किसान की आय नहीं बढ़ी है. उत्पादन लागत बढ़ी है और नतीजा किसान आत्महत्याओं के रूप में सामने आया है. जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी 19 फ़ीसदी पर आ गई है जबकि लगभग 11 करोड़ किसान परिवारों के साथ खेती पर अब भी 67 फ़ीसदी जनसंख्या निर्भर है. हरित क्रांति बनाम मौजूदा संकट असल में पहली हरित क्रांति और मौजूदा संकट के बीच कुछ समानता है. खाद्यान्न संकट ने भारत की पहली हरित क्रांति को जन्म दिया था. उस संकट ने सरकार को ऐसी नीतियाँ बनाने और क़दम उठाने को मजबूर किया था, जिसकी परिणति हरित क्रांति के रूप में हुई. कुछ इसी तरह के संकट ने एक बार फिर सरकार को कृषि के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया है. ख़ास बात यह है कि किसानों और ग्रामीण भारत की तस्वीर और तक़दीर बदलने के नारे के साथ सत्ता में आई संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने तीन साल गँवा दिए हैं और उसके पास अभी भी कोई ऐसी रणनीति नहीं है जो कृषि को पटरी पर ला सके.
इस मुद्दे पर गठित राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) की उपसमिति की रिपोर्ट के आधार पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले दिनों 25,000 करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा तो कर दी, लेकिन उनके पास इस पैसे के उपयोग की योजना का कोई खाका तक नहीं था. केंद्र और राज्य स्वीकार कर रहे हैं कि सार्वजनिक निवेश में आई कमी इस संकट का कारण है. पिछले दो दशक में कोई बड़ी सिंचाई परियोजना लागू नहीं हुई और केवल 40 फ़ीसदी खेती योग्य भूमि ही सिंचित है. पिछले पाँच साल में सरकार का ज़ोर किसानों को कर्ज़ मुहैया कराने पर रहा है. कृषि ऋण 1,75000 करोड़ रुपए को पार कर गया है, लेकिन इस कर्ज़ को चुकाने के लिए किसानों की आय बढ़ाने का कोई बड़ा क़दम नहीं उठाया जा सका है. किसानों के लिए फसल ऋण पर ब्याज की दर सात फ़ीसदी ज़रूर की गई, लेकिन अभी भी एक ट्रैक्टर के लिए किसान को आठ एकड़ सिंचित भूमि गिरवी रखनी पड़ती है. विपणन सुधार सरकार को लगता है कि विपणन सुधारों से कृषि की दशा सुधर सकती है. पिछले तीन साल में सबसे अधिक ज़ोर कृषि उत्पाद मंडी समिति (एपीएमसी) अधिनियम में संशोधन पर रहा है. इसके ज़रिए सरकार कॉंट्रैक्ट खेती का रास्ता खोलना चाहती है, लेकिन तीन साल पहले पंजाब में शुरू हुई कांट्रैक्ट खेती का अनुभव अच्छा नहीं रहा. कॉरपोरेट फार्मिंग को भी एक इलाज के रूप में पेश किया जा रहा है. इसके पीछे तर्क है कि छोटी जोत के किसानों के लिए खेती आर्थिक रूप में फायदेमंद नहीं है, लेकिन इस पर बसर करने वाले किसान के लिए वैकल्पिक रोज़गार के मुद्दे पर ये लोग चुप्पी साध लेते हैं. दरअसल, सरकार को किसान या खेती की चिंता नहीं है. उसकी चिंता उस मध्य वर्ग को खुश रखने की है जो इसके लिए राजनीतिक माहौल बनाता या बिगाड़ता है. इसलिए सारा ज़ोर आपूर्ति बढ़ाकर क़ीमतों पर नियंत्रण पाने पर है. उपाय अगर सरकार कृषि और किसानों के संकट को हल करने के लिए वाकई गंभीर है तो उसे बड़े पैमाने पर सिंचाई, ग्रामीण ढाँचागत सुविधाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश करना होगा. शोध तंत्र में भारी बदलाव कर नई तकनीक और प्रजातियाँ किसानों तक पहुँचाने का रास्ता छोटा करना होगा. खेती पर किसानों की संख्या घटाने के लिए वैकल्पिक रोज़गार के अवसर मुहैया कराने होंगे ताकि जोत का आकार बढ़े और मशीनीकरण को बढ़ावा मिल सके. साथ ही बिचौलियों को घटाकर किसानों की लोकतांत्रिक सहकारी संस्थाएँ खड़ी करनी होंगी. | इससे जुड़ी ख़बरें अर्थव्यवस्था में कहाँ खड़ा है कृषि क्षेत्र?24 अप्रैल, 2006 | कारोबार किसानों की आय बढ़ाने पर होगा ज़ोर27 फ़रवरी, 2007 | कारोबार 'कृषि क्षेत्र में न उठे क्रांतिकारी क़दम'28 फ़रवरी, 2007 | कारोबार 'विकास दर दस प्रतिशत हो सकती है'18 अप्रैल, 2006 | कारोबार खेती के बढ़ते संकट से एसईजेड पर उठे सवाल17 दिसंबर, 2006 | कारोबार भारतीय अर्थव्यवस्था: एक नज़र24 फ़रवरी, 2007 | कारोबार नक़दी फ़सल से कंगाल होते झाबुआ के भील14 अप्रैल, 2005 | कारोबार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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