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मंगलवार, 27 फ़रवरी, 2007 को 07:24 GMT तक के समाचार
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किसानों की आय बढ़ाने पर होगा ज़ोर

खेती-किसानी
उदार नीतियों के बावजूद कर्ज़ के बोझ तले दबे किसानों का आत्महत्या का सिलसिला जारी है
किसानों को कर्ज़ के चंगुल से मुक्त कराना और उनकी आय में बढ़ोत्तरी दो ऐसे मोर्चे हैं जिन पर वित्त मंत्री पी चिदंबरम 2007-08 का बजट पेश करते समय सबसे अधिक ज़ोर देते दिखेंगे.

केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के लिए किसानों की आत्महत्या पर अंकुश लगाना सबसे बड़ी चुनौती है.

इसके साथ ही पिछले कुछ सप्ताहों में जिस तरह से महंगाई की दर में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है उसने भी सरकार को एक नए संकट में डाल दिया है.

चिंता

नौ फ़ीसदी की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) विकास दर के बीच खेती का दो फ़ीसदी पर अटकना सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है.

हालाँकि इस साल कृषि और सहयोग क्षेत्र के लिए विकास दर छह फ़ीसदी आंकी जा रही है, लेकिन इस आंकड़े को लेकर सवाल उठना लाजिमी है.

क्योंकि जहाँ देश का खाद्यान्न उत्पादन पिछले करीब एक दशक से स्थिर है. खाद्यान्नों, दालों और खाद्य तेलों पर आयात निर्भरता बढ़ती जा रही है.

इसका सीधा अर्थ है कि जो पैसा भारतीय किसान की जेब में जाना था वह व्यापारियों के माध्यम से दूसरे देशों के किसानों की जेब में जा रहा है.

ऐसी स्थिति में भारतीय किसानों की आय बढ़ाने का सीधा उपाय उनको बेहतर बाज़ार और फसल की उचित कीमत देने के साथ उत्पादकता बढ़ाने में मदद करना है.

खेती-किसानी
सिंचाई के पर्याप्त साधन नहीं होने से अब भी लाखों हेक्टेयर ज़मीन बंजर पड़ी है

इसके लिए बजट में अनुसंधान कार्यों पर आवंटन बढ़ाए जाने की संभावना है.

सिंचाई के मोर्चे पर सरकार ने राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (नेशनल रेनफैड एरिया अथारिटी) गठित की है.

इसके लिए बजट में भारी-भरकम राशि आवंटित होने की उम्मीद है.

भारत निर्माण कार्यक्रम के बाद फिर सिंचाई और दूसरी ढाँचागत सुविधाओं में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने पर ज़ोर होगा.

बाज़ार सुधार

एक बड़ा क़दम बाज़ार सुधारों पर अमल को लेकर उठाया जा सकता है.

केंद्र ने राज्यों को विपणन सुधारों के लिए मदद देने और कृषि उपज मंडी समिति (एपीएमसी) क़ानून में बदलाव कर काँट्रेक्ट खेती को बढ़ावा देने के लिए कहा है.

बाज़ार सुधारों को आगे बढ़ाने और रिटेल क्राँति का फायदा किसानों तक पहुँचाने के नाम पर इस बजट में सरकार खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को कुछ प्रोत्साहन दे सकती है

बजट में जिंसों के वायदा कारोबार जैसे सुधारों पर चिंता प्रकट की सकती है. इसके लिए जल्दी ही फारवर्ड काँट्रैक्ट रेगुलेशन एक्ट और वेयरहाउसिंग डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन एक्ट जल्दी पारित कराने की चर्चा भी वित्त मंत्री कर सकते हैं.

तीन साल में कृषि कर्ज़ को दोगुना करने का लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लिया गया है.

एक लाख रुपए तक के फसल कर्ज़ पर सात फ़ीसदी की ब्याज दर जारी रखना वित्त मंत्री की मजबूरी है.

इसके लिए बैंकों को वह ब्याज सब्सिडी बढ़ाएँगे. जो करीब 3000 करोड़ रुपए हो सकती है.

सहकारी बैंक

सहकारी बैंकों के तंत्र को पटरी पर लाने के लिए नाबार्ड को कुछ प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं.

किसान
किसानों की आम शिकायत है कि उन्हें उनकी उपज का उचित दाम नहीं मिलता

लेकिन कर्ज़ आवंटन बढ़ने के बावजूद अभी भी महाराष्ट्र के विदर्भ, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, केरल, उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड और पंजाब में किसानों की आत्महत्या का सिलसिला नहीं रुक रहा है.

सरकार ने प्रभावित इलाकों के लिए 16000 करोड़ रुपए के पैकेज का दावा किया है. लेकिन इसका अधिकांश हिस्सा इन किसानों की आय में बढ़ोत्तरी के रूप में न होकर दीर्घकालिक उपायों पर खर्च होगा.

किसानों की चिंता

कृषि जिंसों के दाम बढ़ने से किसानों की आय बढ़ने का मौक़ा बना था लेकिन यहाँ मध्य वर्ग की चिंता करने वाली सरकार के सामने मुद्रास्फीति पर अंकुश की चिंता सवार हो गई.

गेहूँ, चीनी, दालों और दूध पाउडर के निर्यात पर रोक लगाने के साथ गेहूँ और मक्का के शुल्क मुक्त आयात और खाद्य तेलों पर सीमा शुल्क में कटौती कर इस मौक़े को रोक दिया गया.

यह बात अलग है कि दाम घटने के बाद चीनी उद्योग और किसानों की बिगड़ती हालत के चलते चीनी निर्यात से रोक हटा ली गई.

यही हाल दूध किसानों का हो रहा है और काबली चना किसानों की आत्महत्या के बाद इसके निर्यात से रोक हटाई है. अब बजट में इस मोर्चे पर वित्त मंत्री क्या करेंगे यह देखना है.

सब्सिडी के मोर्चे पर वित्त मंत्री की मजबूरी होगी कि वह उर्वरक सब्सिडी के प्रावधान में बढोत्तरी करें.

चालू साल के लिए 17000 करोड़ के उर्वरक सब्सिडी प्रावधान से यह करीब दोगुना रहेगी. इसलिए अगले साल के लिए प्रावधान में भी बढ़ोत्तरी करनी होगी.

इसी तरह खाद्यान्न की खरीद के ज़रिए ग़रीबों की खाद्य सुरक्षा बरकरार रखने के लिए उन्हें खाद्य सब्सिडी बढ़ानी होगी जिसका एक हिस्सा गेहूं किसानों को अधिक कीमत के रूप में मिलेगा.

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