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पता चलेगा आटे-दाल का भाव

मुकेश अंबानी
मुकेश अंबानी के पास 48 हज़ार करोड़ रूपए का रिज़र्व है
हैदराबाद में ग्यारह रिटेल स्टोर खोलकर रिलायंस समूह ने उपभोक्ता साज-सामान के रिटेल कारोबार में कदम रख दिया है.

रिलायंस इंडस्ट्री के मुकेश अंबानी ने ऐलान कर दिया है कि 25,000 करोड़ रुपए का निवेश परचून के कारोबार में किया जाएगा.

करीब पाँच लाख लोगों को सीधे और करीब दस लाख लोगों को परोक्ष रुप से रोजगार दिया जाएगा. अगले पाँच सालों में रिलायंस रिटेल का कारोबार करीब 780 शहरों और 6000 गाँवों में होगा.

रिलायंस ऐसा कर पाएगी, इस बात में उन्हे संदेह नहीं है जो रिलायंस के अतीत से वाकिफ हैं. 2005-06 की रिलायंस की बैलेंस शीट के हिसाब से इस कंपनी के पास करीब 48 हज़ार करोड़ रुपए का रिजर्व है यानी संसाधनों की इस कंपनी के पास कोई कमी नहीं है.

दरअसल, परचून या रिटेल का काम भारत में इतना आकर्षक है कि इसमें हर कोई अपना हिस्सा चाहता है.

बदला दौर

1960 के दशक में पैसा था माल बनाने में. लाइसेंस परमिट राज था, कुछेक लोगों के पास ही चीजों को बनाने का लाइसेंस होता था. लाइसेंस राज में सीमित विकल्प थे, जो थे, सब चल जाते थे. यानी बनाने भर की देर थी, बिकना तो तय ही था, चाहे टूथपेस्ट हो या ब्रेड.

2006 तक आते-आते सीन बदल गया है. अब कमाई है बेचने में. बनाने वाले बहुत टहल रहे हैं. अब लाइसेंस की जरुरत नहीं है. उदार माहौल है, बनाना बहुत कलाकारी का काम नहीं है, बेचना कलाकारी का काम है.

रिलायंस को उत्पादन क्षेत्र से ज्यादा फ़ायदा खुदरा क्षेत्र में दिख रहा है

जो गेहूँ किसान बेचता है तो उसे करीब सात रुपए किलो मिलता है, वही परचून की दुकान पर ब्रांडेड पैकेट में आटे की शक्ल में सोलह –सत्रह रुपए किलो हो जाता है.

बनाने वाले, उगाने वाले नहीं कमा रहे है, बीच वाले कमा रहे हैं और सबसे ज्यादा बीच वाला वह कमा रहा है, जो सीधे ग्राहक के संपर्क में है.

दरअसल, वही शर्तें तय कर रहा है. उनका जो अर्थशास्त्र है, उसमें यह संभव है. थोक में खऱीदने वाला सस्ता खरीद सकता है. उसे उधार भी काफी समय के लिए मिल सकता है.

छोटे परचूनिए को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है. रिलायंस की यह क्षमता हो सकती है कि आलू की फ़सल की बहुतायत के समय बहुत से किसानों के आलू खऱीद ले और उन्हे अपने कोल्ड स्टोरेज में रखवा कर सस्ता बेचे. छोटा दुकानदार यह नहीं कर सकता.

खबर है कि हैदराबाद में रिलायंस रिटेल में तमाम आइटम आम बाजारों के मुकाबले करीब चालीस प्रतिशत सस्ते मिल रहे हैं.

देश के एक और कार्पोरेट परचूनिए–बिग बाज़ार का तो नारा है, इससे सस्ता और इससे अच्छा और कहाँ.

जून 2006 में खत्म हुए साल में बिग बाज़ार खुदरा समूह की मिल्कियत वाली कंपनी पैंटालून ने करीब 64 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया था, इसके पहले के साल के मुनाफे के मुकाबले यह करीब 70 प्रतिशत ज्यादा था. साइज के मामले में बिग बाज़ार रिलायंस के सामने कहीं नहीं ठहरता.

आप ख़ुद ही अंदाज़ा लगा लीजिए कि यह कारोबार कितना बड़ा है, और भविष्य में कितना बड़ा होने जा रहा है.

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