| किसानों के लिए उम्मीद की किरण? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका और यूरोप में किसानों की ख़ुशहाली की एक बड़ी वजह विभिन्न समस्याओं को देखते हुए उनकी फ़सलों का बीमा कराने की उनकी क्षमता होती है. वहाँ किसान तूफ़ान या सूखे की वजह से फ़सल की बर्बादी की आशंकाओं के मद्देनज़र बीमा करा सकते हैं. इसके अलावा किसान फ़सल की उपज से पहले ही उसे बेच भी सकते हैं जिससे अगर पैदावार काफ़ी हो जाए और क़ीमतें गिर जाएँ तो भी वे कंगाली से बच सकते हैं. मगर वहीं दूसरी तरफ़ भारत जैसे विकासशील देशों में किसानों को इस तरह की सुविधाएँ शायद ही नसीब होती हैं और हर तरह के ख़तरे उनके सिर पर मँडराते रहते हैं. मगर अब विश्व बैंक इस कोशिश में है कि दुनिया के सबसे ग़रीब किसानों में से कुछ को अंतरराष्ट्रीय बीमा बाज़ार से जोड़ा जाए. मगर अभी कई ऐसी दिक़्क़तें हैं जिन्हें दूर करना ज़रूरी होगा. कुछ किसानों की ज़मीन इतनी कम है कि उस पर काम करने का ख़र्च ही काफ़ी होता है. इसके अलावा मौसम की सूचना भी इतनी अनिश्चितताओं वाली होती है कि किसानों के सामने मुश्किलें बनी ही रहती हैं. फिर भारत जैसे देशों में जब बड़े पैमाने पर बाढ़ आ जाए या सूखा पड़ जाए तो राजनीतिक नेता बीच में आ जाते हैं बैंकों पर दबाव डालते हैं कि किसानों से ज़बरदस्ती ऋण वसूल न किया जाए. लेकिन ऐसा करने पर बैंक ख़ुद कर्ज़दार हो जाते हैं.
मगर अब विश्व बैंक ख़ुद इस पूरे मामले में हस्तक्षेप कर रहा है और किसानों को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से जोड़ रहा है. उदाहरण के लिए, तंज़ानिया में कॉफ़ी और कपास से जुड़ी आठ सहकारी संस्थाओं का क़ीमतों में अचानक होने वाले परिवर्तन के मद्देनज़र बीमा कराया गया है. दरअसल इस पूरे मामले में स्थानीय बैंकों की मदद से कोशिश ये की जा रही है कि छोटे पैमाने पर खेती करने वाले किसानों को एकजुट किया जाए जिससे एक ऐसा सौदा किया जा सके जो अंतरराष्ट्रीय बीमा कंपनियों को आकर्षित करने में सफल हों. भारत के आंध्र प्रदेश में दो सौ से अधिक किसानों को ऐसी मदद मिली है जिससे उन्हें मौसम की अनिश्चितताओं से बचाया जा सके. यहाँ कोशिश हो रही है बहुत ही छोटे स्तर पर ऋण मुहैया कराने वाली संस्थाओं को बचाने की. ऋण देने वाली ये संस्थाएँ बाढ़ या सूखे की हालत में कंगाली की कगार पर आ जाती हैं. इसमें भी विश्व बैंक ने मदद की है जिससे इन संस्थाओं का अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से संपर्क हो और इस तरह के ख़तरे को बाँटा जा सके. ये कुछ जटिल व्यवस्थाएँ हैं मगर ये आख़िरकार छोटे किसानों को उन ख़तरों से बचा सकती हैं जिसे अमरीका या यूरोप में बड़े किसानों को अकेले ही नहीं झेलना होता. |
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