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देहरादूनी बासमती की महक खो रही है | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बासमती चावल का ज़िक्र आते ही ज़ेहन में पहाड़ी, मुग़लई और लखनवी खाने की महक तारी होने लगती है. लेकिन दुनिया भर में मशहूर बासमती चावल अब अपने घर देहरादून की घाटी से ही लुप्त होता जा रहा है. बासमती की खेती में अधिक लागत, मेहनत और कम उपज के कारण यहाँ के किसानों ने अब बासमती की जगह गन्ने जैसी नगदी फसलें उगाना शुरू कर दिया है. एक समय था जब देहरादून के सेवला, माजरा और मोथरावाली इलाकों में जब बयार चलती थी तो बासमती के खेतों से उठी महक हवा में घुल जाती और दूर से ही पता चल जाता कि यहाँ बासमती धान लगा है. पीढियों से बासमती की खेती करते आए बचन सिंह याद करते हुए कहते हैं, "क्या ख़ुश्बू होती थी, एक घर में पकता तो पूरे गाँव को पता चल जाता था. "बड़े-बड़े व्यापारी मुँह-माँगा दाम देकर सीधा खेतों से ही उठा ले जाते. लेकिन अब कौन लगाता है बासमती, न पानी रहा न मजदूर." राजस्व विभाग के दस्तावेजों के अनुसार आज़ादी के बाद तक देहरादून के 2200 एकड़ में बासमती बोया जाता था जो अब घटकर 190 एकड़ तक सीमित रह गया है. गन्ना फ़ायदेमंद ज़्यादातर जगहों में बासमती के खेत गन्ने के खेतों में बदल गए हैं क्योंकि गन्ने में लागत कम है और फ़ायदा ज़्यादा. किसान धर्मपाल सिंह कहते हैं, "धान के लिए पानी की समस्या हो जाती है, मज़दूरों की ज़रूरत होती है जबकि गन्ने की खेती में एक बार लगा बुआई कर दी तो फिर कोई झंझट ही नहीं है."
इसी इलाके के एक और किसान गुलाब चौहान कहते हैं, "बासमती तो दूर की बात है अब अन्य क़िस्म के धान की फ़सल भी कम ही लोग उगाते हैं. जो लगाते हैं वो अपने खाने के लिए, बेचने के लिए नहीं." कृषि विभाग के आँकड़े बताते हैं कि प्रति एकड़ बासमती का उत्पादन औसतन मात्र 15 क्विंटल है जबकि गन्ने की पैदावार प्रति एकड़ 320 क्विंटल होती है. किसान को धान से 3000 रुपए तो गन्ने खेती से दस हज़ार रुपए प्रति एकड़ का लाभ होता है. देहरादून में बासमती का इतिहास भी दिलचस्प है. दरअसल सौंधी महक और अनोखे ज़ायक़े वाला ये चमचमाता दाना अफग़ानिस्तान से यहाँ आया था. 1839 में ब्रिटिश-अफग़ान युद्द में अंग्रेज़ों ने वहाँ के शासक दोस्त मोहम्मद ख़ान को बंदी बना लिया और आधीनता स्वीकार करने वाले शाह शुज़ा को गद्दी सौंप दी थी. दोस्त मोहम्मद ख़ान और उसके परिवार को भारत लाकर देहरादून और मसूरी में रहने की जगह दे दी गई थी. ख़ान को यहाँ की आबोहवा तो रास आई लेकिन यहाँ का खानपान ख़ासकर चावल उन्हें नहीं भाया. तब उन्होंने ख़ासतौर पर अफग़ानिस्तान से चावल मंगवाया और फिर उसकी खेती यहाँ शुरू करवाई.
यही बासमती थी. कहते हैं कि देहरादून की जलवायु में बासमती का दाना अफग़ानिस्तान की अपेक्षा ज़्यादा बड़ा, ख़ुश्बूदार और ज़ायक़ेदार हो गया. देहरादून में अफग़ानिस्तान के शाही घराने के वंशज आज भी रह रहे हैं. इन्हीं में से एक अली विशाल बाग़ानो के मालिक हैं. अली कहते हैं, "अफसोस है कि बासमती के असली बीज ही अब ख़त्म हो गए हैं, हाईब्रिड बीज इतने ज़्यादा लगाए गए कि असली बासमती अब रह ही नहीं गया." "इतने दिन खाया लेकिन किसी ने उसे बचाए रखने की सुध नहीं ली." संकर बीजों के अलावा दून घाटी की बदली आबोहवा भी बासमती के लुप्त होने की एक वजह है. हक़ीक़त ये है कि देहरादूनी बासमती का नाम अब सिर्फ़ एक ब्रांड बनकर रह गया है. दूसरी जगह से आ रहे बारीक चावल को देहरादून बासमती का ठप्पा लगाकर बेचा जाता है. देहरादून के आढ़ती अंकुर मल्होत्रा कहते हैं, "पहले असली बासमती बाज़ार में आ जाया करता था लेकिन अब तो चावल बहादराबाद, उधमसिंहनगर और सहारनपुर वग़ैरा से आता है. यहाँ तो सिर्फ कटिंग होती है." "सबने लिख रखा है देहरादूनी बासमती और ये बस फैशन की बात हो गई है." अब आलम ये है कि दून घाटी में बासमती के रहे सहे खेतों का भी सरकार बड़े पैमाने पर अधिग्रहण करने की तैयारी कर रही है और वहाँ सरकारी प्रतिष्ठान और आवासीय इमारतें बनाने की योजना है. ग़ौर करने की बात ये है कि बासमती को देश के दूसरे भागों में भी बोकर परीक्षण किया गया लेकिन वहाँ की उपज में यहाँ की मिठास, महक और स्वाद नहीं पैदा हो पाया. |
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