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नक़दी फ़सल से कंगाल होते झाबुआ के भील | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नक़दी फ़सल से रातोंरात अमीर बनने की चाहत ने भीलांचल के भीलों-आदिवासियों को निन्यानबे के फेर में डाल दिया है और इसका प्रतिकूल प्रभाव उनकी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं पर पड़ रहा है. अब तक दलहन, तिलहन और गेहूँ-चावल की खेती करके अपना गुज़ारा करने वाले पश्चिमी मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले के आदिवासियों ने क्षेत्र में टमाटर, सोयाबीन और कपास की प्रमुखता के साथ खेती करना शुरू कर दिया है. इसका सीधा असर उनके जीवन स्तर पर पड़ा है और ग़ैर-भील जातियों की नकल करते ये भील आदिवासी अपनी मूल पहचान खोते जा रहे हैं. सादगी के सिद्धांत पर आधारित जीवन जीने वाले ये भील अपने खेतों में नक़दी फ़सल उपजाने के लिए बड़े काश्तकारों से पैसा उधार ले रहे हैं. लेकिन बाज़ार में इन फसलों के दामों के उतार-चढ़ाव के चलते इनके लिए मुनाफ़ा तो दूर, फसल की लागत भी निकाल पाना मुश्किल हो जाता है और अमीर बनने की चाह उन्हें कर्ज़दार बना रही है. इन लोगों पर फसल-दर-फसल यह कर्ज़ और बढ़ता जा रहा है और अगली फसल की आमदनी से हालात सुधरने की आस उन्हें और बुरी हालत में पहुँचाता जा रहा है. मालवा से लगे इस डूँगरप्रांत में भील समुदाय की आबादी 85 प्रतिशत तक है और इनमें अधिकतर ऐसे हैं जिनके पास थोड़ी सी खेती ही है. ज़िले की एक तहसील, पटलावत और उसके आसपास के क्षेत्र में जब हम पहुँचे तो पाया कि घरों के सामने दो-तीन मोटरसाइकिलें खड़ी थीं पर रुककर बातचीत की तो पता चला कि पेट्रोल के लिए जेब में पैसे नहीं हैं. हिलती बुनियादें पर समस्या इतनी भर नहीं है, पैसे की इस चाह ने लोगों के जीवन स्तर के साथ उनके उन बुनियादी ढाँचों को भी हिलाकर रख दिया है जिनके लिए ये भील जाने जाते रहे हैं.
लोगों ने अपने विवादों को निपटाने के लिए अब पंचायत और गाँव की सभाओं के बजाय कोर्ट कचहरी की ओर रुख़ करना शुरू कर दिया है. क्षेत्र के एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता, हरीश कुमार बताते हैं, “अपनी मूल संस्थाओं की जगह कोर्ट कचहरी का रुख़ करना और पिछले कुछ वर्षों में सरपंचों का राजनीतिक दलों के प्रभाव में आना इसकी एक बड़ी वजह है. आज सरपंच समुदाय के हितैषी की भूमिका में नहीं हैं.” वो बताते हैं, “भील समाज संक्रमण के दौर से गुज़र रहा है और ग़ैर आदिवासियों की नकल में तमाम पुरानी पारंपरिक वर्जनाएँ ध्वस्त हो रही हैं. सरकारी उपेक्षा इस हालत में और भी कष्टप्रद हो रही है.” हालांकि ज़िले की पटलावत तहसील के एसडीओ बीएल कुल्मी इससे सहमत नहीं हैं. वो कहते हैं, ''हमारे यहाँ कैश क्रोप से सबसे ज़्यादा आमदनी हो रही है. ज़िले की अन्य सात तहसीलों से हमारी स्थिति बेहतर है. अब विकास के साथ कर्ज़ तो आते ही है.'' पर इससे भील समुदाय पर पड़ रहे प्रभाव के बारे में पूछने पर वो बताते हैं, ''यह सही है कि भील तेज़ी से आधुनिकता के प्रभाव में आए हैं. उनमें आधुनिक संसाधनों का चलन बढ़ा है.'' स्थानीय लोगों से जब इस बारे में चर्चा की तो उन्होंने बताया कि क्षेत्र के आदिवासियों और उनकी पहचान को बचाने के लिए नक़दी फ़सल नहीं, रोज़गार लक्षित शिक्षा और रोज़गार के अवसरों की आवश्यकता है. |
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