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गुरुवार, 24 मार्च, 2005 को 15:50 GMT तक के समाचार
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ख़तरे में झारखंड के पहड़िया आदिवासी

आदिवासी
पहड़िया आदिवासियों की संख्या घटती जा रही है
झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र में आदिवासियों की एक जाति पाई जाती है जिसे पहड़िया कहते हैं.

आज से कोई ढाई सौ साल पहले अंग्रेजों ने संथाल परगना में बसने वाले जुझारू आदिवासियों के पैर उखाड़ने के लिए संथाल आदिवासियों को इस क्षेत्र में ला बसाया था.

इसके चलते यहाँ पहले से बसे आदिवासियों को आसपास की पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी और वे पहड़िया कहे जाने लगे.

पहड़िया जाति के आदिवासियों की जनसंख्या पिछले कुछ दशकों में घटी है और अब इनके विलुप्त होने की आशंका जताई जाने लगी है.

इसकी वजहें खोजने के लिए हम संथाल परगना के मुख्यालय दुमका के पास गाँदो गाँव की यात्रा की जो कभी पहड़िया राज्य, शंकरा की राजधानी हुआ करता था.

राजा दुर्विजय सिंह

 मैं राजा दुर्विजय सिंह का रिश्ते में पोता लगता हूँ और अभी मैं बेरोज़गार हूँ.
महेंद्र सिंह

पहड़िया गाँव में प्रवेश करते ही दाईं ओर एक खंडहर दिखाई देता है जो कभी पहड़िया सरदार दुर्विजय सिंह का महल हुआ करता था.

इस रियासत ने कभी अंग्रेज़ों को लोहे के चने चबवा दिए थे पर आजकल उसी पहड़िया रियासत के वारिस रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं.

जब इन वारिसों से हमने बात की तो उनमें से एक, महेंद्र सिंह ने हमें बताया, "मैं राजा दुर्विजय सिंह का रिश्ते में पोता लगता हूँ और अभी मैं बेरोज़गार हूँ. मैं पढ़ा-लिखा हूँ लेकिन मैट्रिक तक. इसके आगे नहीं पढ़ पाया क्योंकि पिताजी और दादा तो ज़िंदगीभर मुकदमे लड़ते-लड़ते ख़त्म हो गए. अब मैं अकेला हूँ."

अंग्रेज़ों की मदद से संथाली आदिवासियों ने पहड़िया आदिवासियों को मैदानी क्षेत्रों में से भगा दिया था लेकिन पहाड़ों पर वन विभाग के अधिकार के बाद पहड़िया जनजाति के पास न तो पहाड़ों पर ज़मीन बची है और न ही मैदानी इलाकों में.

संथालों से संकट

 संथालों की जनसंख्या काफ़ी अधिक है इसलिए उनका दबदबा ज़्यादा रहता है और हमारी उपेक्षा होती है
रामचरण सिंह

गाँदो के ही एक पहड़िया आदिवासी, रामचरण सिंह बताते हैं, "हम लोगों की जनसंख्या बहुत कम है और इसके चलते हमारा कोई भी जनप्रतिनिधि दिल्ली या राज्य विधानसभा तक नहीं पहुँच पाया है. संथालों की जनसंख्या काफ़ी अधिक है इसलिए उनका दबदबा ज़्यादा रहता है और हमारी उपेक्षा होती है."

गाँदो के सरपँच, मोहम्मद इदरीस मानते हैं कि पहड़िया आदिवासी ही संथाल परगना के सच्चे आदिवासी थे और संथालों की वजह से उनकी दशा बदतर हुई है.

इदरीस कहते हैं, "संथाल तो छोटा नागपुर से यहाँ आए और बसे पर इनका फैलाव इतना ज़्यादा हो गया कि पहड़िया अल्पमत में आ गए. पढ़ने-लिखने के मामले में भी ये लोग पिछड़े रहे पर आब धीरे-धीरे सुधार हो रहा है."

बेअसर योजनाएँ

लोग पढ़े-लिखे तो हैं पर इनकी तरक्की नहीं हो रही है. इन लोगों तक सुविधाएँ पहुँचाने के लिए जो लोग अफ़सर नियुक्त किए जाते हैं, वो ही सारा पैसा खा जाते हैं
परमेश्वर राय

झारखंड सरकार ने पहड़िया आदिवासियों की रक्षा और विकास के लिए अलग से एक विभाग भी बना रखा है और अब तरह-तरह की योजनाएँ भी शुरू की जा चुकी हैं पर गाँदो के ही एक युवा, परमेश्वर राय बताते हैं कि विकास का पैसा इन तक नहीं पहुँच रहा है.

वो बताते हैं, "ये लोग पढ़े-लिखे तो हैं पर इनकी तरक्की नहीं हो रही है. इन लोगों तक सुविधाएँ पहुँचाने के लिए जो लोग अफ़सर नियुक्त किए जाते हैं, वो ही सारा पैसा खा जाते हैं."

जब उनसे इसका हल पूछा तो वो बोले, “जब सरकार ही वैसी है तो कोई क्या कर सकता है.”

पर परमेश्वर की इस राय से जिला कल्याण अधिकारी अनिल कुमार पूरी तरह से सहमत नहीं हैं.

वो कहते हैं कि पहड़िया लोगों की समस्या केवल पैसा या रोज़गार नहीं है बल्कि योजनाएँ चल रही हैं, इन लोगों को इनका लाभ भी हो रहा है.

पर लोगों के बीच ऐसी धारणा क्यों है, पूछने पर वो बताते हैं, "इसका एक कारण उनकी भौगोलिक स्थिति भी है. वो लोग पहाड़ों पर ही रहना चाहते हैं. इन लोगों के यहाँ मलेरिया काफ़ी फैल रहा है और अब कालाज़ार की भी समस्या बढ़ गई है. उनके पास इतना पैसा नहीं है कि वो अपना ठीक ढंग से इलाज करा सकें."

अकर्मण्यता

 इन लोगों में नशाखोरी काफ़ी ज़्यादा है इसके चलते ये लोग अपने काम, नौकरी या उत्थान की ओर ध्यान नहीं देते हैं
इदरीस, सरपंच

अधिकारियों का कहना है कि पहड़िया जाति के लोगों को एक विचित्र प्रकार की अकर्मण्यता ने घेर लिया है जिसके चलते वो अपने विकास के लिए काम ही नहीं करना चाहते.

सरपंच इदरीस भी इसकी एक और वजह की तरफ़ इशारा करते हैं. वो कहते हैं,"इन लोगों में नशाखोरी काफ़ी ज़्यादा है इसके चलते ये लोग अपने काम, नौकरी या उत्थान की ओर ध्यान नहीं देते हैं."

हालांकि सरकार के शिक्षा, स्वास्थ्य और जागरूकता अभियान का असर अब दिखाई देने लगा है. दुमका के जिला कल्याण अधिकारी अनिल कुमार बताते हैं, "अब ये लोग धीरे-धीरे समझने लगे हैं. ये अब अपने अधिकारों की माँग भी उठा रहे हैं और योजनाओं में भी हिस्से ले रहे हैं. इससे पहले वो प्रशासन से थोड़ी दूरी बरतते थे."

झारखंड सरकार अब इन्हें रोज़गार में आरक्षण की बात भी कर रही है.

अगर इन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की सुविधाएँ मिलती हैं तो इन जुझारू आदिवासियों के अतीत का गौरव तो नहीं, पर इनका लुप्त होता अस्तित्व तो बचाया ही जा सकता है.

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