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सोमवार, 14 मार्च, 2005 को 16:20 GMT तक के समाचार
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ज़हरीले नशे में घुलता अनाथ बचपन

कटनी में बच्चे
इन बच्चों का घर कटनी स्टेशन का मुसाफ़िरख़ान ही है
कटनी के साधुराम स्कूल के सामनेवाली किताब की दुकान पर बैठे चश्मेवाले दुकानदार को आप नहीं जानते होंगे पर कटनी स्टेशन पर रहनेवाले सैकड़ों अनाथ बच्चों को यह दुकान अच्छी तरह से याद रहती है.

इस दुकान में उन्हें कापी-क़िताब की स्याही मिटानेवाला सॉल्यूशन मिलता है जिसे वो नशे के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.

कटनी रेलवे स्टेशन वैसे तो देश के कुछ बड़े रेलवे स्टेशनों में से एक है और यहाँ पाँच दिशाओं से गाड़ियाँ आती हैं पर यहाँ रह रहे अनाथ बच्चों के लिए ज़िंदगी के सभी रास्ते यहाँ बंद होते नज़र आ रहे हैं.

 हमारे सिर पर बहुत तकलीफ़ हैं. हम हज़ार-दो हज़ार रूपए कहाँ से लाएँ. हमें पीने का शौक नहीं है. वो दर्द देते हैं इसलिए हम पीते हैं
एक बच्चा

स्टेशन पर रहने वाले ये लावारिस बच्चे यहाँ पानी की ख़ाली बोतलें, गुटखा, सिगरेट और मूँगफली जैसी चीज़ें बेचकर कोई 100-150 रूपए तक की कमाई कर लेते हैं और उसी से इनका गुज़ारा चलता है.

कुछ बच्चे तो स्टेशन पर लाशों को उठाने का भी काम करते हैं.

कोई रोकनेवाला नहीं

इनमें से एक लड़के ने हमें बताया,"मैं रीवा का रहनेवाला हूँ पर पैदाइश कटनी की ही है. मेरे माँ-बाप नहीं हैं और यहाँ पास में बना मुसाफिरखाना ही मेरा घर है."

पूछने पर वो बेझिझक उस दुकान का पता भी बता देते हैं जहाँ से उन्हें यह नशीला पदार्थ मिलता है.

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नया नशा बहुत मँहगा नहीं है

एक बच्चा बताता है,"नशा करते हैं तो हमें चक्कर से आने लगते हैं.”

पर वो नशा क्यों करते हैं, यह पूछने पर उनमें से एक बच्चे ने बताया, "हमारे सिर पर बहुत तकलीफ़ हैं. हम हज़ार-दो हज़ार रूपए कहाँ से लाएँ. हमें पीने का शौक नहीं है. वो दर्द देते हैं इसलिए हम पीते हैं."

बच्चों को यह नए तरह का नशा काफ़ी कम दामों पर उपलब्ध है. एक बच्चे ने बताया,"इसकी एक ट्यूब 5 रूपए की है पर दुकानवाला हमें ज़्यादा दामों पर देता है. वो हमसे सात से 10 रूपए तक वसूल लेता है."

खुली आँखों पर पर्दा

और यह सबकुछ प्रशासन की आँखों के नीचे होता है.

जब स्टेशन पर तैनात पुलिसकर्मियों से पूछा गया कि वो बच्चों को ऐसा करने से क्यों नहीं रोकते तो उन्होंने बताया,"हमने कई बार रोकने की कोशिश की है. इन्हें समझाया तक है कि इससे शरीर ख़राब हो जाएगा और जान भी जा सकती है पर ये लोग नहीं मानते. सामने तो नहीं पर हमारे पीछे ये लोग नशा करते रहते हैं."

पुलिसवालों ने बताया,"हमने स्टेशन क्षेत्र की दुकानों को यह पदार्थ इन बच्चों को देने से मना किया है पर ये शहर के बाकी हिस्सों से यह नशा जुटा लेते हैं."

इन बच्चों में कुछ की उम्र तो महज छह साल ही है. नशे की यह लत मजबूरी के चलते है या इन बच्चों का अपना शौक, इसे समझने से ज़्यादा ज़रूरी है उन वजहों की पड़ताल, जिसके चलते इनकी ज़िंदगी नर्क बनती जा रही है.

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