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विदेशियों का मोहताज नहीं है विदिशा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अपने श्रोताओं से मिलने और उनसे जुड़े सवालों से रूबरू होने के लिए जब बीबीसी का कारँवा मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक नगर विदिशा पहुँचा तो श्रोताओं ने पूरी गर्मजोशी से स्वागत किया. कभी शुंग राजाओं की राजधानी और सातवाहन व गुप्तवंश के राजाओं के शासनकाल में बड़ा व्यापारिक केंद्र रहे विदिशा में जब बीबीसी के श्रोताओं का मंच लगा तो ‘क्यों घट रहा है विदिशा का महत्व’ चर्चा का विषय बनकर उभरा. कार्यक्रम का संचालन किया रेहान फ़ज़ल ने. कार्यक्रम में बीबीसी हिंदी सेवा की प्रमुख अचला शर्मा भी मौजूद थीं. कार्यक्रम में चर्चा शुरू हुई तो विषय अपना नया रूप लेने लगा और विदिशा की उपेक्षा का सवाल चर्चा का विषय बन गया. हालांकि बिजली और पानी की उपलब्धता के मामले में प्रदेश के बाक़ी क्षेत्रों से बेहतर हालत में रहने वाला विदिशा राजनीतिक दख़ल में भी कमज़ोर नहीं रहा है. उपेक्षा ख़ुद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी यहाँ से एक बार सांसद चुने गए थे. प्रदेश सरकार के मंत्रिमंडल में भी यहाँ से चुने गए जनप्रतिनिधियों को मंत्री पद दिए जाते रहे हैं पर विकास से लेकर उपेक्षा तक का सवाल हमारे सामने था. इसकी वजह जानने के लिए जब श्रोताओं से मुख़ातिब हुए तो विदिशा से सांसद रह चुके निरंजन वर्मा ने कहा, “विदिशा गेंहू की सर्वोत्तम उपज के लिए जाना जाता रहा है और मुंबई बाज़ार तक इसका बड़ा महत्व रहा है. ऐसे में कृषि प्रधान होने के कारण उद्योग यहाँ नहीं पनप पाए.” उन्होंने कहा, “जिस क्षेत्र में कृषि को प्राथमिकता मिलती है, वहाँ कारखाने और उद्योगों का अपेक्षित विकास नहीं होता.” अब सवाल उठा कि किस क्षेत्र में कृषि के बजाय उद्योगों को ज़्यादा महत्व दिया जाए तो इस पर एक श्रोता का कहना था, “यहाँ कीटनाशक बनाने वाले तमाम फ़र्म हैं पर यहाँ कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने की ज़रूरत है.” अब सवाल इस प्रचीन नगर में पर्यटन की स्थिति पर आ गया. चिंता लोग इस बात को लेकर ख़ासे चिंतित दिखे कि यहाँ आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में इजाफ़ा होता नज़र नहीं आ रहा है.
कुछ लोगों ने इसके लिए भारतीय पुरातत्व विभाग को तो कुछ ने पर्यटन विभाग को दोषी ठहराया पर एक श्रोता इस बाबत कुछ दूसरा तर्क देते हैं. उन्होंने कहा, “सभी लोग बार-बार विदेशी पर्यटकों की ही बात कर रहे हैं पर किसी भी देश की सांस्कृतिक धरोहर, किसी विदेशी पर्यटक की कैसे मोहताज हो सकती है.” और तालियाँ गूँज उठीं. इस गंभीर और सार्थक विमर्श ने हमें भारत की सांस्कृतिक समृद्धि का संकेत दे दिया था और अब बारी थी उस सांस्कृतिक रंग में डूबने की. कार्यक्रम के अंत में लोक संगीत का कार्यक्रम था. पारंपरिक वाद्यों ने रस घोला और ‘होरी खेलैं यदुबीरा, बिरज में होरी खेलैं यदुबीरा’ रंग में हम डूब गए. कार्यक्रम का संचालन बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल कर रहे थे. |
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