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गुरुवार, 04 मार्च, 2004 को 11:43 GMT तक के समाचार
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बेतिया शहर की बहार न पूछ

बेतिया में गायक
बेतिया घराने का गायक आजकल विपन्नता का जीवन बिता रहे हैं
जब से पंडित फाल्गुनी मित्र का एक इंटरव्यू पढ़ा था तभी से बेतिया की उन गलियों को देखने के लिये बेचैनी सी हो रही थी, जहाँ तानसेन के गुरु हरिदास स्वामी की ध्रुपद गायकी आज भी अपने मौलिक रूप में ज़िन्दा है.

लेकिन बिहार की बदहाल सड़कों से बेहाल जब हम बेतिया के बानू छपरा गाँव की उस संकरी सी बेजान गली में पहुँचे जहाँ बेतिया घराने के गायक रहते हैं, तो दिल बैठ गया.

कुछ टूटे-फूटे अधबने से मकान, ईंटों के खड़ंजे से बनी टेढ़ी-मेढ़ी सी गली, मैले-कुचैले बच्चे और दो-चार कुत्ते. बेतिया घराने की शैली में ध्रुपद गाने वालों में बस एक ही नाम बचा है, पं इंद्रकिशोर मिश्र.

कोने के एक छोटे से मकान की अँधियारी सी कोठरी से एक सहमी सी आवाज़ आई – “पंडित जी तो बाहर किसी समारोह में गाने गए हैं.” ये थीं पंडित जी की पत्नी सोना देवी जिन्हें अपने पति की संगीत साधना पर गर्व भी था और घर की विपन्नता पर ग़ुस्सा भी.

बेतिया गायक
यह बच्ची भी ध्रुपद गायन शैली को जीवित रखने का काम कर रही है

गली में तीन-चार घर छोड़ कर पं रामनाथ मिश्र का मकान था जो बेतिया घराने के आख़िरी नामी गायक पं बिपिन बिहारी मलिक के जामाता हैं. रामनाथ जी ने समय की माँग को देखते हुए ध्रुपद छोड़कर ख़याल गाना और पढ़ाना शुरू कर दिया है.

लेकिन उनका कहना था कि “बनारस घराने में भी ध्रुपद गायकी बेतिया से ही गई है. बड़े रामदास बेतिया घराने के ही शिष्य थे जिन्होने रामदासी मल्हार की रचना की थी. लेकिन बनारस घराने ने तानसेन की ध्रुपद शैली अपना ली जबकि बेतिया घराना हरिदास स्वामी की शैली पर अडिग रहा.”

तानसेन की शैली के ध्रुपद गायन में लयकारी पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है. गायक आलाप और तरह-तरह के चमत्कारों से अपनी कला का लोहा मनवाता है.

जबकि बेतिया घराने की शैली में पदों में समाए भाव को गायन के द्वारा सजीव किया जाता है. हरिदास स्वामी इसी शैली में गाते थे, लेकिन लोकप्रियता तानसेन की शैली को हासिल हुई. इसीलिए आज बेतिया घराने को कम लोग जानते हैं,

बेतिया घराने की वर्तमान दशा का एक बड़ा कारण ये भी रहा कि इस घराने के ध्रुपद गायकों ने अपनी कला को शिष्य परंपरा की बजाए वंश परंपरा से जीवित रखने की कोशिश की.

आजकल इस घराने के एकमात्र गायक पं इंद्रकिशोर मिश्र की एक बालिका शिष्या एक बंदिश सुना ही रही थी कि पं जी लौट आए और उन्होंने स्वीकार किया कि “हरिदास स्वामी की इस अनमोल विरासत को जीवित रखने के लिए उन्हें एक समर्पित प्रतिभा की तलाश है.”

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