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'महिला स्वस्थ तो परिवार स्वस्थ' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबबीसी हिंदी का कारवाँ जब सीतामढ़ी पहुँचा तो विचार मंच के विषय- 'महिला स्वस्थ तो परिवार स्वस्थ' पर चर्चा करने के लिए लगभग 2000 श्रोता एकत्र हुए. एक श्रोता ने अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के वो शब्द याद दिलाए- "आप मुझे स्वस्थ और शिक्षित माँ दें, मैं आपको एक अच्छा राष्ट्र दूँगा." इस चर्चा में श्रोताओं के साथ-साथ भाग लेने वाले विशेष महमान थे- सदर हस्पताल के डॉक्टर नरेंद्र कुमार, अदिति सेवा संस्था नामक ग़ैरसरकारी संगठन की रेखा कर्ण और एक किसान अब्दुल क़य्यूम अंसारी. उर्दू की साहित्यकार आशा प्रभात का मानना था, "हमारे समाज में केवल दस प्रतिशत महिलाएँ ही अपना कोई निर्णय ले पाती हैं. " उनका कहना था, "सामाजिक ढाँचा इस तरह का है कि बच्चे पैदा करना या फिर कितने बच्चे पैदा करना, ऐसे फ़ैसले महिलाओं के बस में नहीं हैं. और यही समस्या है." लेकिन एक अन्य श्रोता मुन्ना मिश्रा उनसे सहमत नहीं थे. उनका कहना था, "महिलाओं को परिवार के बारे में निर्णय करने का अधिकार नहीं है ऐसा नहीं है. लड़का हो या लड़की पुरुष तो दो बच्चों से संतोष कर लेते हैं लेकिन महिला ही लड़की पैदा होने पर असंतुष्ट रहती है." स्वास्थ सेवाएँ स्वास्थ सेवाओं का अंदाज़ा तो इस बात से ही लगाया जा सकता है कि डॉक्टर नरेंद्र कुमार जब भी कुछ कहने लगते तो लोग श्रोता इतना शोर करते की वे कुछ कह ही नहीं पाते.
एक श्रोता अरुण का कहना था कि सरकारी हस्पताल में जो भी टेस्ट करवाना हो वहाँ नहीं हो पाता क्योंकि सरकारी हस्पताल की मशीनें काम नहीं करतीं. उनका कहना था कि इसके विपरीत प्राईवेट क्लिनिक और हस्पतालों में सब मशीनें काम करती हैं और टेस्ट वहीं करवाने पड़ते हैं. डाक्टर नरेंद्र कुमार का कहना था कि डॉक्टरों की परेशानी को कोई समझने को तैयार नहीं है और जनता केवल आरोप ही लगाना जानती है. उनका कहना था कि उन्हें पिछले दो साल से वेतन नहीं मिला और हस्पताल में पिछले एक साल से दवाएँ उपलब्ध नहीं हैं जिसकी ज़िम्मेदारी डॉक्टरों की नहीं होती. साक्षरता एक श्रोता भगवान यादव का मानना था, "साक्षरता ही समस्या है. स्कूल बारह में से नौ महीने बंद ही रहते हैं. कॉलिजों में 'कोचिंग क्लास' की प्रथा चल पड़ी है, तो पढ़ाई कैसे होगी?" और जहाँ तक रही बात परिवार नियोजन की, भगवान यादव का कहना था,"जब राज्य की मुख्यमंत्री के ही नौ बच्चे हों तो आम महिलाओं से कोई क्या कहेगा?"
लेकिन रेखा कर्ण का कहना था, "लड़कियों को बचपन से ही भेदभाव का सामना करना पड़ता है. ये केवल साक्षरता का सवाल नहीं है." उनका कहना था, "जब तक पुरुष महिलाओं को जानकारी, फ़ैसला लेने का अधिकार और उनके फ़ैसले को मान्यता नही देते तब तक स्थिति में बदलाव नहीं आएगा." भाग लेने वाली कई महिलाओं का मत था कि महिलाएँ ही महिलाओं की दुश्मन हैं क्योंकि वे उन्हें अधिकार देने से वंचित रखती हैं. किसान अब्दुल क़य्यूम अंसारी का कहना था कि बिहार एक ग़रीब राज्य है और ग़रीब जनता अपने बच्चों को इसलिए पढ़ा नहीं पाती क्योंकि वे छोटी उम्र में ही उन्हें रोज़ी-रोटी कमाने में लगा देते हैं. |
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