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इलाहाबाद में बीबीसी हिंदी का कारवाँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मंगलवार को बीबीसी हिंदी का काफ़िला इलाहाबाद पहुँचा. सुबह-सुबह बीबीसी की टीम ने प्रयाग से अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया जहाँ बहुत सारे श्रोता जुटे. बीबीसी टीम ने श्रोताओं को शाम को मिलने का न्योता दिया मगर दोपहर से ही हमारे होटल के बाहर श्रोताओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया और शाम तक लगभग 600 युवा श्रोता उमड़ पड़े. श्रोताओं में अधिकतर छात्र थे जिनमें कुछ महिलाएँ भी थीं. हम जब आयोजन स्थल में दाखिल हुए तो इतनी तालियाँ बजीं कि हमने सोचा आख़िर हम कौन हैं..बीबीसी के प्रति इतना प्यार, इतना उत्साह देखकर हमारी आँखें भींग गई. मगर केवल तालियाँ ही नहीं, शिकायतें भी थीं. एक शिकायत तो ये थी कि हमने विचार मंच का आयोजन इलाहाबाद में क्यों नहीं किया और फिर कि हमने अपने कार्यक्रमों का समय कम क्यों कर दिया, हमारे कार्यक्रम साफ़ नहीं सुनाई देते वगैरह. कुछ ने कहा कि हमसे पूछिए जो तीन मिनट का है उसे वापस 15 मिनट का किया जाए, विवेचना और विज्ञान और विकास फिर शुरू किया जाए. एक अनुरोध ये था कि आप की बात बीबीसी के साथ कार्यक्रम में श्रोताओं को भी मेहमानों के साथ बहस करने का मौक़ा दिया जाए. एक श्रोता ने कहा,"मैं आपलोगों का पीछा करता हुआ नेपाल से यहाँ आ पहुँचा हूँ और इलाहाबाद में पकड़ा है आपको". इलाहाबाद विश्वविद्यालय में क़ानून की पढ़ाई कर रहे आशुतोष तिवारी ने कहा,"बीबीसी आकाश में नक्षत्र की भाँति है.मेरा कहना है कि आप की बात कार्यक्रम में फ़ोन न काटा जाए क्योंकि राजनेता अपनी बात से बदल जाते हैं. बात कुछ होती है और वे कहते कुछ और हैं." एक श्रोता ने कहा,"मैं जिस दिन बीबीसी ना सुनूँ उस दिन मूड ठीक नहीं रहता है." एक पुराने श्रोता ने कहा,"हम 1968 से बीबीसी सुन रहे हैं और बीबीसी हमारी दिनचर्या को इस तरह से भर देता है कि हमें और चीज़ों की आवश्यकता नहीं रहती." एक और श्रोता ने कहा,"मेरी शिकायत ये है कि कभी-कभी बीबीसी सुनाई देना इतना कठिन हो जाता है कि क्रोध में मैं तीन ट्रांजिस्टर तोड़ चुका हूँ और चौथे पर अभी सुन रहा हूँ." बीबीसी का कारवाँ बुधवार को मिर्ज़ापुर में होगा जहाँ एक परिचर्चा का आयोजन किया गया है. परिचर्चा का विषय है- मेरा वोट वापस करो.
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