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किनके हाथों में देश की बागडोर? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा का कारवाँ शुक्रवार को फ़ैजाबाद पहुँचा. वहाँ राजकीय महिला इंटर कॉलेज के मैदान पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया. विषय था- जिन लोगों को आप अपने बच्चों का अभिभावक बनाने के बारे में सोच भी नहीं सकते, क्या उन्हें देश की बागडोर सौंप दी गई? इस विचार मंथन में भाग लेने वाले स्थानीय श्रोता थे- वकील वीरेश्वर त्रिवेदी, अध्यापिका ज़रीन नज़र, साहित्यकार प्रेमशंकर मिश्र और समाजसेवक टीएन सिन्हा. घंटे भर की चर्चा कई रास्तों और मोड़ों से गुजरी, जैसे- सभी भ्रष्ट हैं तो वोट किसे दें? क्या वोटर ग़लत उम्मीदवारों को वोट देने के लिए बाध्य हैं? क्या शिक्षित वोटर ही बेहतर फ़ैसला कर सकता है? बीबीसी के श्रोता इंद्रजीत सिंह ने सवाल उठाया, "क्या बढ़ई से लोहार का काम लिया जा सकता है? बच्चे का अभिभावक बनना एक अलग कर्तव्य है और देश का अभिभावक बनना अलग. दोनों कर्तव्यों को अलग-अलग देखा जाना चाहिए." फैजाबाद के निवासी इंदुभूषण पांडेय तो नेताओं को देश का अभिभावक मानने को ही तैयार नहीं दिखे. उन्होंने कहा, "जब तक जनता ये नहीं मानती कि देश का अभिभावक वो स्वयं है और उसे देश का सेवक चुनना है, देश का कल्याण नहीं हो सकता." स्थानीय श्रोता आभा मिश्रा की शिकायत पढ़े-लिख मतदाताओं से थी जो 'मतदान के दिन चुनाव में भागीदारी के बजाय छुट्टियाँ मनाना पसंद करते हैं.' आभा ने आरोप लगाया कि भारत में एक भी नेता साफ-सुथरा नहीं है और जनता के पास एकमात्र विकल्प यही है कि वो ज़्यादा बुरे के बजाय कम बुरे लोगों को चुने. एक अन्य श्रोता विजय कुमार गुप्ता का ज़ोर देश में राजनीतिक जागृति लाए जाने पर था. विचार मंच में कुछ वक्ताओं ने राजनीतिक दलों को दोष दिया कि वे अच्छे लोगों को टिकट ही नहीं देतीं. शनिवार को बीबीसी का कारवाँ अकबरपुर पहुँच रहा है. वहाँ दोपहर एक बजे वीएन इंटर कॉलेज में आयोजित विचार मंच का विषय होगा- क्या महिलाएँ समर्थ हैं. |
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