|
बीबीसी का कारवाँ नवादा में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जब बीबीसी कारवाँ के दौरान नवादा की बारी आई तो ‘विकास और हम’ पर विचार मंथन शुरु हुआ. अशिक्षा, कुशासन जैसे मुद्दे पर तो न जाने कितनी बार चर्चाएँ हो चुकी है. बहुत कुछ लिखा और कहा गया है. लेकिन नवादा में लोगों ने बात को आगे बढाया. चिलचिलाती धूप में सात किलोमीटर की दूरी तय करके आए ब्रजेश पटेल ने विकास योजनाओं के दुरुपयोग के लिए सरकार की खिंचाई की. वहीं एक छात्रा शबनम परवीन ने मानो तीर ठीक निशाने पर दागते हुए कहा कि अब वो समय आ गया है जब हम अपने क्षेत्र के विकास को अपना हक मानें. लेकिन एक सच ये भी साफ नज़र आया कि कई बार कहना तो आसान होता है लेकिन उसे कर पाना काफी मुश्किल. भय और भ्रष्टाचार के आतंक से भयभीत नवादा के कुछ लोगों ने गुमनाम होकर पर्चों के माध्यम से जब अपनी बात हम तक पहुँचाई तो मैं सोच में पड़ गया ...सच्चे का बोल बाला ...क्या वाक़ई. कथनी को करनी में बदल पाना कितना मुश्किल है. कितनी अड़चने हैं, क्या क्या मजबूरियाँ हैं वो हर बार सामने नहीं आ पातीं. कई बार आपके तमाम सवालों के जवाब में केवल खामोशी ही मिलती है. और शायद इसी खामोशी में लोगों के जवाब छिपे होते हैं.
|
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||