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मधुबनी में लोक कलाओं की स्थिति पर चर्चा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मधुबनी की हवा गुलाल और फाग के रंग में रंगनी शुरू हो गई है. लोगों के चेहरों पर तो रंगों की लाली दिख ही रही है, दीवारों पर लगे पोस्टरों पर भी होली का असर दिख रहा है. होली के शुभ अवसर पर देखिये काँटा लगा– कहाँ और कैसे? ये मैं नहीं कह रहा हूँ, पोस्टर कह रहे हैं. और कुछ ऐसे ही मस्ती के माहौल में पहुँचा बीबीसी का कारवाँ मधुबनी. मैथिल संस्कृति, लोक कलाओं और लोक-गीतों की धरती मधुबनी में बीबीसी के श्रोताओं से बात हुई लोक कला की आज की स्थिति पर. मधुबनी पेंटिंग जैसी कला की शुरुआत कैसे हुई– ये बताया बहस में शामिल इतिहासकार, इज़हार अहमद ने– “ मधुबनी पेंटिंग के नाम से मशहूर है, ये उसी ज़माने की पैदावार है जब राजा जनक की लड़की, सीता जी की शादी हुई थी. तो उन्होंने अपने इस राज में, जो उत्तर से दक्षिण तक 96 कोस और पूर्व से पश्चिम तक 94 कोस की धरती थी, जो गंगा से मिलती थी– तमाम रहने वालों से कहा कि वे अपने घरों को सजाएँ.” लेकिन आज की स्थिति पर सीधे-सपाट शब्दों में बात की श्रोताओं ने. एक श्रोता का कहना था कि आज मधुबनी में लोक कला डायनासोर की तरह लुप्त होती जा रही है, जबकि एक अन्य श्रोता ने इसके लिए बदलते हुए पारिवारिक ताने-बाने को ज़िम्मेदार ठहराया. फ़ाग लेकिन माहौल तो फगुनी था और वो पूरी तरह से रंग में आ गया जब वहाँ आए कुछ फाग गाने वालों ने ढोल-मंजीरों के साथ लोगों को झमझमाना शुरू कर दिया. लेकिन ये लोक-गीत इतने प्रचलित क्यों नहीं हुए? जवाब दिया फाग-कलाकार रानी झा ने– “लोक-संगीत का अभी जो ह्रास हो रहा है, उसके पीछे हमारा आकाशवाणी भी है. शास्त्रीय संगीत के लिए आप समय देते हैं, तो लोक-संगीत के लिए भी समय दिया जाना चाहिए.” वहीं कुछ थे जिन्होंने बदलते हुए पारिवारिक माहौल को लोक कलाओं की बिगड़ती हुई स्थिति के लिए ज़िम्मेदार ठहराया, तो कुछ ने हर हालत में इस स्थिति को सुधारने का बीड़ा उठाया. फाग के गीतों और ढोल-मंजीरे की धुन पर, सभा में मौजूद सभी पर फागुनी रंग चढ़ चुका था और बीबीसी कारवाँ भी तैयार था इन रंगों के जादू से निकल कर, अपनी अगली मंज़िल की और बढ़ने को. |
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